हरियाली अमावस्या पर पूर्वजों द्वारा दिए गए प्राकृतिक संरक्षण के मंत्रों का अनुसरण करते हुए वृक्षारोपण की परंपरा को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
वर्षा ऋतु में चहुँओर बिखरी नयनाभिराम हरियाली को निहारते हुए कभी हमारे मन में आया कि ये पचास, सौ, दो सौ वर्ष पुराने वृक्ष किसने लगाए होंगे? धरती का ये अनमोल श्रृंगार निश्चित ही हमारे पूर्वजों की थाती है। अगर हमारे पूर्वजों का प्रकृति की ओर देखने का दृष्टिकोण हमारी तरह लालची होता, तो ये जंगल, नदियाँ, पहाड़ कब के समाप्त हो चुके होते।हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हैं कि उन्होंने न केवल जंगल लगाए, अपितु उन्हें संरक्षित और संवर्धित करने के उपाय और मंत्र अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंप गए तथा प्रकृति संरक्षण के लिए वे हमें परंपराओं की लंबी श्रृंखला दे गए।
यूँ तो सभी हिंदू त्योहार प्रकृति को ही समर्पित हैं। किंतु वट सावित्री, आंवला नवमी, तुलसी विवाह, पीपल पूर्णिमा, छठ पूजा, गोवर्धन पूजा, हरियाली तीज, गंगा दशहरा, हरियाली अमावस्या, नागपंचमी आदि तो पूर्णतः प्रकृति संरक्षण और संवर्धन के पर्व हैं।ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वं शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥शास्त्रों में पृथ्वी, आकाश, जल, वनस्पति एवं औषधि को शांत रखने को कहा गया है। इसका आशय यह है कि इन्हें प्रदूषण से बचाया जाए। यदि ये सब संरक्षित व सुरक्षित होंगे, तभी हमारा जीवन भी सुरक्षित व सुखी रह सकेगा।
हमारे पूर्वज ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है
'वृक्षाद् वर्षति पर्जन्यः पर्जन्यादन्न सम्भवः'
अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं।
'अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु'
यही कारण है कि हिंदू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। महाभारत का अनुशासन पर्व तो प्रकृति संरक्षण से भरा हुआ है।
तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा। पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः।।
(कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को तालाब के पास अच्छे पेड़ लगाने चाहिए और पुत्र की तरह उनकी देखभाल करनी चाहिए। वास्तव में धर्म के अनुसार वृक्षों को ही पुत्र माना गया है।)
तडागकृत् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः। एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः॥
(तालाब बनवाने, वृक्षारोपण करने और यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले द्विज को स्वर्ग में महत्ता दी जाती है। इसके अतिरिक्त सत्य बोलने वालों को भी महत्व मिलता है।)
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥
(फलों और फूलों वाले वृक्ष मनुष्यों को तृप्त करते हैं। वृक्ष देने वाले अर्थात् समाजहित में वृक्षारोपण करने वाले व्यक्ति का परलोक में तारण भी वृक्ष करते हैं।)
दशकूपसमा वापी दशवापीसमो हृदः। दशहृदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥
अर्थात्- दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब या सरोवर, दस तालाबों के समान एक गुणवान पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्व होता है।हरियाली अमावस्या भगवान शिव और प्रकृति को समर्पित पर्व है। भगवान शिव को प्रकृति का साक्षात स्वरूप माना गया है, क्योंकि उनका पूरा जीवन और श्रृंगार प्रकृति के तत्वों से जुड़ा है।
अतः इस दिन संपूर्ण चराचर जगत के देव भगवान शिव का पूजन-अर्चन करने के बाद शुभ मुहूर्त में वृक्षों को रोपा जाता है। इसके तहत शास्त्रों में विशेषकर आम, आंवला, पीपल, वटवृक्ष और नीम के पौधों को रोपने का विशेष महत्व है।हरियाली अमावस्या देश के सभी प्रांतों में अलग-अलग नाम और स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाई जाती है। पर्व की परंपरा कुछ भिन्न हो सकती है, किंतु मूल भावना प्रकृति, पितरों और देवताओं के प्रति आभार की ही होती है।
तो आइए! अपने पूर्वजों के मार्ग का अनुसरण करते हुए प्रकृति संरक्षण के इस महापर्व हरियाली अमावस्या पर अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार पौधारोपण कर उन्हें वृक्ष बनाने का संकल्प लेकर हरियाली के विस्तार में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

मोहन नागर
(लेखक पद्मश्री सम्मानित व मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं)