मध्य पूर्व युद्ध के कारण वैश्विक संकट गहराया। UN रिपोर्ट के मुताबिक 4.5 करोड़ लोग भूख के खतरे में, ऊर्जा और खाद्य कीमतों में तेज उछाल।
अनुराग तागड़े, इंदौर
समुद्री व्यापार ठप, एशिया में खाद्य और ऊर्जा संकट की बन रही स्थिति
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और जनजीवन पर साफ दिखाई देने लगा है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध के कारण प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने मध्य पूर्व के लिए सेवाएं आंशिक रूप से रोक दी हैं, जिससे बंदरगाहों पर कंटेनर फंस गए हैं और कम से कम 20 हजार नाविक प्रभावित हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एशिया-प्रशांत आर्थिक एवं सामाजिक आयोग के अनुसार, समुद्री मार्गों में व्यवधान के शुरुआती संकेत स्पष्ट हैं और इसका असर कई प्रमुख उद्योगों पर पड़ने लगा है। खाड़ी क्षेत्र से आने वाली हीलियम और विशेष गैसों की आपूर्ति बाधित होने से सेमीकंडक्टर और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में तत्काल संकट की स्थिति बन रही है। वहीं, पेट्रोकेमिकल कच्चे माल की कमी एशियाई देशों के विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव बढ़ा रही है।
ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल की आशंका
युद्ध के कारण खाद की आपूर्ति पर भी असर पड़ा है, जिससे दक्षिण एशिया में कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है। यह क्षेत्र लगभग दो अरब लोगों की आबादी का घर है और यहां खाद की कमी भविष्य में फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, फरवरी के अंत से अब तक तेल की कीमतों में लगभग 45 प्रतिशत और गैस की कीमतों में 55 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जबकि खाद की कीमतें भी 35 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। इसके परिणामस्वरूप 2026 में क्षेत्रीय महंगाई दर 4.6 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है, जो 2025 में 3.5 प्रतिशत थी। ऊंची ईंधन कीमतों के कारण परिवहन, उत्पादन और खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा
कई देशों में इसका सीधा असर दिखाई देने लगा है। श्रीलंका में पेट्रोलियम आयात कुल आयात का लगभग एक चौथाई है, जिसके कारण वहां ईंधन राशनिंग लागू की गई है। स्कूलों को चार दिन का कर दिया गया है और सरकारी गतिविधियों में कटौती की गई है।
पाकिस्तान में ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अचानक उछाल आया है। पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं और सरकार ने ईंधन बचत के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह, स्कूल बंद करने और वर्क फ्रॉम होम जैसे कदम उठाए हैं।
म्यांमार में पहले से संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था पर इस स्थिति ने अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। ईंधन की कमी के कारण परिवहन और व्यापार गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता कम हो गई है। नेपाल में भी संकट केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी गहराता जा रहा है।
खाड़ी देशों में काम करने वाले नेपाली प्रवासियों पर इसका असर पड़ा है। लाखों कामगार प्रभावित हुए हैं और कई लोग अपने काम पर लौट नहीं पा रहे हैं।
भारत पर विशेष प्रभाव
इस पूरे संकट का भारत पर भी गहरा असर पड़ सकता है। भारत दुनिया में सबसे अधिक प्रवासी भेजने वाला देश है और लगभग 1.8 करोड़ भारतीय विदेशों में काम करते हैं। इनमें से लगभग 55 प्रतिशत खाड़ी देशों में रहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में लगभग 22 प्रतिशत, सऊदी अरब में 15 प्रतिशत और अन्य खाड़ी देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीय कामगार मौजूद हैं।
यह क्षेत्र भारत के लिए रोजगार और विदेशी मुद्रा का एक प्रमुख स्रोत है। यदि क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है, तो भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और रोजगार पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अपनी प्रवासन नीति में विविधता लाने की आवश्यकता है और यूरोप, एशिया तथा अन्य क्षेत्रों के साथ नए श्रम समझौते करने चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के अनुसार, यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर 2026 में घटकर लगभग 4 प्रतिशत रह सकती है, जो 2025 में 4.6 प्रतिशत थी। इसके साथ ही गरीबी, खाद्य असुरक्षा और बेरोजगारी में वृद्धि की आशंका भी जताई गई है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि यदि ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो लगभग 4.5 करोड़ लोग गंभीर भूख संकट का सामना कर सकते हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार युद्ध के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन शुरू हो चुका है और हजारों लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं।