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डिजिटल युग और स्मार्ट टाइम

डिजिटल युग में स्क्रीन टाइम नहीं, स्मार्ट टाइम की आवश्यकता

डिजिटल युग में, युवाओं को स्क्रीन टाइम को स्मार्ट टाइम में बदलने की आवश्यकता है, जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास सुनिश्चित हो सके।


डिजिटल युग में स्क्रीन टाइम नहीं स्मार्ट टाइम की आवश्यकता

माखन शर्मा

आज हम सभी डिजिटल युग में सांस ले रहे हैं- मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। लेकिन यही तकनीक, जो सुविधा और ज्ञान का द्वार खोलती है, धीरे-धीरे युवाओं के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। स्क्रीन टाइम सुविधाएं तो बढ़ा रहा है लेकिन सबसे पहले, इसका असर स्वास्थ्य पर स्पष्ट दिखाई देता है। घंटों स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सिरदर्द और नींद की समस्या आम हो गई है। स्क्रीन की नीली रौशनी नींद के चक्र को बिगाड़ती है, साथ ही, शारीरिक गतिविधि में कमी के कारण अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

मानसिक स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। लगातार सोशल मीडिया उपयोग से युवाओं में अवसाद, चिंता और आत्म-संतोष की कमी देखी जा रही है। “लाइक” और “फॉलो” की दुनिया में वे वास्तविक खुशी को भूलते जा रहे हैं। इससे ध्यान और एकाग्रता में भी गिरावट आती है।

सामाजिक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। परिवार और मित्रों के साथ समय बिताने के बजाय युवा स्क्रीन में खोए रहते हैं, जिससे रिश्तों में दूरी और संवाद की कमी बढ़ती है।

इसलिए आवश्यक है कि युवा स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करें। सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग ही तकनीक को वरदान बना सकता है, यह समझना जरूरी है कि डिजिटल दुनिया में रहना ठीक है, लेकिन उसमें खो जाना नहीं।

आज के डिजिटल युग में “स्क्रीन टाइम कम करो” एक आम सलाह बन चुकी है, लेकिन यह हर परिस्थिति पर समान रूप से लागू नहीं होती। हजारों युवा आज वर्क फ्रॉम होम, फ्रीलांसिंग और ऑनलाइन काम के माध्यम से न केवल अपना करियर बना रहे हैं, बल्कि अपने परिवार का भरण-पोषण भी कर रहे हैं। ऐसे में स्क्रीन उनके लिए कोई लत नहीं, बल्कि रोज़गार का आधार है।

इसलिए आवश्यक है कि हम स्क्रीन टाइम को एक ही नजर से देखने के बजाय उसे दो हिस्सों में समझें उत्पादक (प्रोडक्टिव) और अनुत्पादक(अनप्रोडक्टिव) स्क्रीन टाइम। काम, पढ़ाई और कौशल विकास के लिए किया गया स्क्रीन उपयोग लाभकारी और आवश्यक है। वहीं बिना उद्देश्य के घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, गेम्स खेलना या निरर्थक कंटेंट देखना ही असली समस्या है।

वर्क फ्रॉम होम करने वाले युवाओं के लिए चुनौती स्क्रीन से दूर भागने की नहीं, बल्कि उसे संतुलित करने की है।

जो युवा स्क्रीन के माध्यम से अपने सपनों को साकार कर रहे हैं, वे निश्चित रूप से सही दिशा में हैं, लेकिन उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि वही स्क्रीन उनके स्वास्थ्य और जीवन पर हावी न हो जाए।

हाल के शोध संकेत देते हैं कि वर्तमान समय में 15 से 27 वर्ष के युवा जिन्हें हम Gen-Z कहते हैं उनकी IQ, स्मरणशक्ति और एकाग्रता में गिरावट दर्ज की जा रही है।

एक शोध में बताया गया है कि सन 1800 के बाद पहली बार ऐसा देखा गया है कि किसी नई पीढ़ी की बुद्धि क्षमता पिछली पीढ़ी से कम आंकी जा रही है। एक औसत व्यक्ति दिन में लगभग 58 बार अपना मोबाइल चेक करता है। भारत में औसतन स्क्रीन टाइम 6 घंटे के आसपास है। यदि हम बच्चों और किशोरों की बात करें, तो किशोर करीब 7.5 घंटे प्रतिदिन स्क्रीन पर बिताते हैं।

स्क्रीन टाइम का प्रभाव केवल आंखों तक सीमित नहीं है, यह मन और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। अधिक स्क्रीन टाइम से स्मरणशक्ति कमजोर होती है, सीखने की क्षमता घटती है और एकाग्रता में कमी आती है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 4 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम वाले युवाओं में अवसाद (डिप्रेशन) का खतरा 26% तक बढ़ जाता है, जबकि कम स्क्रीन टाइम वाले युवाओं में यह लगभग 9.5% है। इसके साथ ही सामाजिक दूरी, संवादहीनता और भावनात्मक अस्थिरता भी तेजी से बढ़ रही है, युवा ‘कनेक्टेड’ तो हैं, पर ‘जुड़े’ नहीं हैं।

इस चिंता के निवारण की दिशा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा  “स्क्रीन टाइम से एक्टिविटी टाइम” जैसा अभियान एक सकारात्मक शुरुआत हैं। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सार्थक अभियान बनकर उभर रहा है, इस अभियान के माध्यम से परिषद के कार्यकर्ता परिसरों में जाकर युवाओं से डिजिटल अनुशासन अपनाने, सप्ताह का एक दिन स्क्रीन-मुक्त रखने, पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित करने, योग-ध्यान और खेलकूद में भाग लेने, प्रकृति के साथ समय बिताने और परिवार के साथ संवाद बढ़ाने जैसे विषयों पर चर्चा,संगोष्ठी एवं व्याख्यान आयोजित कर रहे हैं, समय की मांग है कि हम तकनीक के उपयोग में संतुलन बनाएं।

अंततः,युवा केवल देश का भविष्य नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि हम तकनीक के दुष्प्रभाव में उलझ गए, तो विकास की गति रुक सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हम स्क्रीन की इस चमक से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन की रोशनी को भी अपनाएं और एक सशक्त, जागरूक और स्वस्थ भारत का निर्माण करें।

माखन शर्मा, केंद्रीय कार्यसमिति सदस्य, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

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