Digital Age: Rising Loneliness & Communication Gap

 डिजिटल दुनिया: अकेले घर, दीवारों के बीच सिमटता संवाद

डिजिटल युग में बढ़ती दूरी और घटता पारिवारिक संवाद चिंता का विषय बन रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गैजेट्स के अधिक उपयोग से अकेलापन और मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है।

By : स्वदेश डेस्क
 डिजिटल दुनिया: अकेले घर, दीवारों के बीच सिमटता संवाद

प्रवीण कक्कड़

आज के दौर में जब हम ‘ग्लोबल विलेज’ और ‘हाई-स्पीड कनेक्टिविटी’ की बात करते हैं, तो एक विरोधाभासी सत्य हमारे सामने खड़ा होता है। तकनीक ने सात समंदर पार बैठे व्यक्ति को तो एक क्लिक की दूरी पर ला दिया है, लेकिन बगल के कमरे में बैठे अपने को कोसों दूर कर दिया है। हम एक ऐसे ‘डिजिटल टापू’ पर रहने लगे हैं, जहां शोर तो बहुत है, पर सुकून भरा संवाद गायब है। हम दुनिया से तो ‘जुड़े’ हैं, पर अपनों से ‘कटे’ हुए हैं।

बीते तीन दशकों में भारत के सामाजिक ढांचे में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह हमारे ‘बचपन’ के भूगोल में है। याद कीजिए 90 के दशक की वे गर्मियां, जब पारा चढ़ते ही नानी के घर जाने की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। वह समय केवल छुट्टियों का नहीं, बल्कि रिश्तों के नवीनीकरण का उत्सव होता था।दोपहर में दादी की कहानियों का तिलिस्म और रात को छत पर बिछी चारपाइयों की कतार यह केवल सोने का इंतजाम नहीं था, बल्कि एक सामूहिक संस्कार था। छत पर लेटकर तारों को निहारना, बिना घड़ी के समय का बहना ये सब हमें सहजता, धैर्य और अपनापन सिखाते थे। वहां संवाद सहज था, संबंध स्वाभाविक थे और ‘अकेलापन’ जैसा शब्द हमारी डिक्शनरी में था ही नहीं।

आज वही बचपन छतों से उतरकर स्क्रीन की दीवारों में कैद हो गया है। मोबाइल और टैबलेट ने बच्चों के हाथों में दुनिया तो दे दी है, पर उनसे उनकी अपनी जमीन छीन ली है। ‘डिजिटल लोनलीनेस’ अब केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई है जहां हजारों ऑनलाइन कनेक्शन होने के बावजूद व्यक्ति भीतर से रिक्त है।संवाद केवल शब्दों का लेन-देन नहीं, बल्कि भावनाओं का वह अदृश्य सेतु है, जिस पर रिश्तों का भरोसा चलता है। जब घरों में संवाद कम होता है, तो दीवारें ऊंची होने लगती हैं। भले ही वे ईंट की न हों, पर भावनात्मक दूरी उतनी ही कठोर हो जाती है।

आज की विडंबना यह है कि एक ही सोफे पर बैठे चार लोग चार अलग-अलग वर्चुअल दुनिया में खोए रहते हैं। यह ‘साथ होकर भी साथ न होने’ की स्थिति रिश्तों को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।न्यूक्लियर परिवारों (एकल परिवार) के बढ़ते चलन ने इस संकट को और गहरा किया है। पहले संयुक्त परिवारों में ‘इमोशनल कुशनिंग’ होती थी एक रिश्ता टूटता तो दूसरा संभाल लेता था। आज एकल परिवारों में संवाद का दायरा सीमित हो गया है। माता-पिता काम में व्यस्त हैं और बच्चे गैजेट्स के साये में बड़े हो रहे हैं।

ऐसे में जब संवाद की जगह केवल ‘निर्देश’ ले लेते हैं, तो रिश्तों की गर्माहट कम होने लगती है। दुनिया भर में हुए शोध यह संकेत दे रहे हैं कि डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से युवाओं में अकेलेपन, तनाव और अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत में भी किशोरों में बढ़ती चिड़चिड़ाहट और भावनात्मक असंतुलन का एक बड़ा कारण पारिवारिक संवाद की कमी माना जा रहा है। खेल के मैदान अब पहले जैसे गुलजार नहीं हैं, जबकि वर्चुअल गेम्स के सर्वर हमेशा व्यस्त रहते हैं। यह बदलाव केवल जीवनशैली का नहीं, बल्कि मानसिक संरचना का भी है।

हमें यह समझना होगा कि तकनीक जानकारी दे सकती है, लेकिन समझ, संवेदना और जीवन जीने की कला केवल संवाद से आती है। समस्या जितनी गहरी है, समाधान उतना ही सरल और मानवीय है संवाद को फिर से जीवन का केंद्र बनाना।

 

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