भारत की आर्थिक नेतृत्व की दिशा

वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में भारत की सशक्त पहल

आगरा में आयोजित ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में भारत ने वैश्विक आर्थिक नेतृत्व के लिए नई दिशाएँ प्रस्तुत कीं, जिसमें सहयोग, नवाचार और समावेशिता पर जोर दिया गया।

By : स्वदेश डेस्क
वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में भारत की सशक्त पहल

प्रतिभा झा

आगरा में संपन्न हुआ प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं था, बल्कि यह उस बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण संकेत भी था, जिसमें भारत अब केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि विकासशील देशों की आकांक्षाओं को दिशा देने वाली नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में स्थापित होता दिखाई दे रहा है। विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं और उद्यमियों की उपस्थिति में आयोजित यह मंच भारत की बढ़ती आर्थिक विश्वसनीयता, नीतिगत परिपक्वता और वैश्विक स्वीकार्यता का सशक्त प्रमाण बनकर उभरा है।

ऐसे समय में, जब विश्व अर्थव्यवस्था अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है, ब्रिक्स एमएसएमई फोरम ने यह स्पष्ट किया है कि भविष्य की आर्थिक स्थिरता और समावेशी विकास का आधार बड़े औद्योगिक समूहों से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में निहित है। रोजगार सृजन, नवाचार, स्थानीय उत्पादन और सामाजिक-आर्थिक संतुलन के क्षेत्र में एमएसएमई की भूमिका को अब वैश्विक स्तर पर नई गंभीरता से स्वीकार किया जा रहा है। भारत लंबे समय से इस तथ्य को अपनी नीतियों का आधार बनाता रहा है और आगरा में आयोजित सम्मेलन ने इस दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्रदान किया है।

फोरम के दौरान हुई चर्चाओं ने यह रेखांकित किया कि वैश्विक दक्षिण के देशों के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियाँ काफी हद तक समान हैं। पूंजी तक सीमित पहुँच, तकनीकी अंतर, वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा तथा आपूर्ति श्रृंखला संबंधी बाधाएँ ऐसे मुद्दे हैं, जिनका समाधान केवल सहयोगात्मक प्रयासों से ही संभव है। इस संदर्भ में भारत ने संवाद, साझेदारी और क्षमता निर्माण पर आधारित जिस दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया, उसने व्यापक सराहना प्राप्त की। यह भारत की कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति की सफलता का भी संकेत है कि वह विभिन्न देशों के बीच विश्वास और सहयोग का सेतु बनने में सफल रहा है।

पिछले एक दशक में भारत सरकार ने एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए जिस प्रकार बहुआयामी प्रयास किए हैं, उनकी प्रतिध्वनि इस सम्मेलन में स्पष्ट रूप से सुनाई दी। आत्मनिर्भर भारत अभियान, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ, डिजिटलीकरण तथा वित्तीय समावेशन की पहलों ने छोटे उद्यमों के लिए नए अवसरों का निर्माण किया है। विशेष रूप से डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में भारत ने जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, वे आज विश्व के अनेक देशों के लिए अध्ययन और अनुकरण का विषय बन चुकी हैं।

फोरम में भारत के डिजिटल मॉडल को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण है कि तकनीक का लोकतंत्रीकरण आर्थिक विकास का प्रभावी माध्यम बन सकता है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई), ऑनलाइन पंजीकरण प्रणालियाँ और डिजिटल सेवाओं तक व्यापक पहुँच ने भारतीय उद्यमियों के लिए व्यापारिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और कम लागत वाला बनाया है। इससे छोटे उद्यमों की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीति-निर्माण का परिणाम भी है।

ब्रिक्स एमएसएमई फोरम ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में शक्ति संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है। लंबे समय तक आर्थिक नीतियों और व्यापारिक मानकों को निर्धारित करने का अधिकार सीमित देशों के हाथों में केंद्रित रहा, किंतु अब विकासशील राष्ट्र अपनी प्राथमिकताओं को लेकर अधिक मुखर और संगठित दिखाई दे रहे हैं। भारत ने इस परिवर्तन को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान 'वैश्विक दक्षिण की आवाज' को प्रमुखता देने के बाद, ब्रिक्स मंच पर भी भारत ने समावेशी और संतुलित आर्थिक विकास की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया।

आगरा सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी रहा कि आर्थिक प्रगति केवल विकास दर के आँकड़ों तक सीमित नहीं हो सकती। यदि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँचता, तो उसकी स्थिरता और उपयोगिता दोनों ही प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं। एमएसएमई क्षेत्र इस चुनौती का सबसे प्रभावी उत्तर प्रस्तुत करता है, क्योंकि यह स्थानीय स्तर पर अवसरों का निर्माण करता है और विकास को अधिक व्यापक आधार प्रदान करता है। भारत की नीतियों में इस क्षेत्र को निरंतर प्राथमिकता मिलना इसी समझ का परिणाम है।निस्संदेह, चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। भारतीय एमएसएमई क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप और अधिक तकनीकी दक्ष, नवाचारी तथा निर्यातोन्मुख बनाने की आवश्यकता है। वित्तीय संसाधनों तक पहुँच और कौशल विकास के क्षेत्र में भी निरंतर सुधार अपेक्षित हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि जिस दिशा में प्रयास किए गए हैं, उसने एक मजबूत आधार तैयार किया है। आगरा में आयोजित फोरम ने इस तथ्य को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की है।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि संभवतः यह रही कि इसने भारत को केवल मेजबान राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि विचार और समाधान प्रस्तुत करने वाले देश के रूप में स्थापित किया। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारत ने सहयोग, नवाचार और समावेशिता पर आधारित जिस आर्थिक दृष्टि को सामने रखा, वह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रतीत होती है। यही कारण है कि आज विश्व भारत को केवल एक विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि संभावनाओं और नेतृत्व के केंद्र के रूप में देखने लगा है।ब्रिक्स एमएसएमई फोरम के समापन के साथ एक सम्मेलन अवश्य समाप्त हुआ है, किंतु उससे उत्पन्न संभावनाओं की यात्रा अभी प्रारंभ हुई है। यदि इस मंच पर हुई चर्चाएँ ठोस साझेदारियों, निवेश, तकनीकी सहयोग और बाजार विस्तार की योजनाओं में परिवर्तित होती हैं, तो इसका लाभ करोड़ों उद्यमियों तक पहुँचेगा। इससे न केवल भारत की आर्थिक शक्ति और सुदृढ़ होगी, बल्कि विकासशील देशों के बीच सहयोग का एक नया मॉडल भी स्थापित होगा।

भारत के लिए यह अवसर आत्मसंतोष का नहीं, बल्कि आगे बढ़ने के संकल्प का है। आगरा ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि नया भारत केवल अपने विकास की कहानी नहीं लिख रहा, बल्कि वैश्विक विकास के नए अध्याय की प्रस्तावना भी तैयार कर रहा है। ब्रिक्स एमएसएमई फोरम उसी प्रस्तावना का महत्वपूर्ण पृष्ठ है, जो आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक नेतृत्व क्षमता को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकता है।

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