सरकार की नई ड्रग्स नीति

ड्रग्स माफिया पर त्रि-स्तरीय वार: पहचान, प्रहार और सफाया

केंद्र सरकार ने ड्रग्स माफिया के खिलाफ नई रणनीति अपनाई। 'डिटेक्ट, डिसरप्ट, और डिस्ट्रॉय' मंत्र के साथ पूरे नेटवर्क का सफाया करने की योजना।

By : स्वदेश डेस्क
ड्रग्स माफिया पर त्रि-स्तरीय वार: पहचान, प्रहार और सफाया

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई केवल केंद्र सरकार नहीं जीत सकती। एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स को अधिक संसाधन, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, मजबूत चार्जशीट और जवाबदेह व्यवस्था पर जोर इस बात का संकेत देता है कि अब परिणाम-आधारित कार्यसंस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि राज्यों में यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो ड्रग्स नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाए रखना संभव होगा।

भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना तभी साकार हो सकता है, जब देश की युवा शक्ति सुरक्षित, स्वस्थ और उत्पादक बनी रहे। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने अब नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की पीढ़ियों की रक्षा का अभियान बना दिया है। इसी सोच के साथ जारी 'मादक पदार्थ नियंत्रण विजन डॉक्यूमेंट 2026-2029' यह संकेत देता है कि अब कार्रवाई का लक्ष्य पूरे नार्को इकोसिस्टम को जड़ से खत्म करना है।

पिछले कुछ वर्षों में यह साफ हुआ है कि ड्रग्स कारोबार के तार आतंकवाद, हवाला, संगठित अपराध, सीमा पार तस्करी और डिजिटल अपराधों से जुड़ चुके हैं। ऐसे में यदि कार्रवाई केवल छोटे तस्करों तक सीमित रहे, तो समस्या का समाधान संभव नहीं है। सरकार ने इसी कमजोरी को पहचानते हुए अब 'डिटेक्ट, डिसरप्ट और डिस्ट्रॉय' का नया मंत्र दिया है। मोदी सरकार की यह कार्यप्रणाली बताती है कि पहले पूरे नेटवर्क की पहचान होगी, फिर उसकी सप्लाई चेन और वित्तीय तंत्र को तोड़ा जाएगा और अंततः पूरे कार्टेल का स्थायी खात्मा किया जाएगा।

इस नई नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अपराधियों के साथ-साथ उनके आर्थिक ढांचे को भी निशाना बनाया गया है। वस्तुतः अब केवल मादक पदार्थ जब्त कर लेना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। हवाला नेटवर्क, क्रिप्टोकरेंसी के जरिए होने वाले लेन-देन, डार्कनेट पर संचालित कारोबार, बैंक खातों और अवैध संपत्तियों तक कार्रवाई का दायरा बढ़ाया गया है। स्पष्ट है कि सरकार ड्रग्स माफिया की आर्थिक रीढ़ तोड़कर इस कारोबार को असंभव बनाना चाहती है।

आज ड्रग्स तस्करी का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। ड्रोन के माध्यम से सीमा पार खेप पहुंचाना, समुद्री मार्गों का इस्तेमाल, कंटेनर तस्करी, ऑनलाइन नेटवर्क और डार्क वेब के जरिए अवैध व्यापार जैसी चुनौतियां पारंपरिक पुलिस व्यवस्था से नहीं सुलझ सकतीं। इसलिए विजन डॉक्यूमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग, तकनीकी खुफिया तंत्र, अपराध मानचित्रण और आधुनिक निगरानी प्रणाली को विशेष महत्व दिया गया है। यह बदलाव बताता है कि सरकार अब अपराधियों से एक कदम आगे रहने की रणनीति पर काम कर रही है।

इस अभियान की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें केवल सख्ती नहीं, बल्कि संवेदनशीलता भी दिखाई देती है। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि ड्रग्स माफिया के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह कठोर होगी, किंतु नशे की लत के शिकार युवाओं को अपराधी नहीं, बल्कि पीड़ित मानते हुए उनके पुनर्वास पर भी बराबर ध्यान दिया जाएगा। यह संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक भी है, क्योंकि नशे के खिलाफ स्थायी सफलता केवल गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि समाज को नशामुक्त बनाने से मिलेगी।

कहना होगा कि सरकार की चार स्तंभों वाली कार्ययोजना इसी व्यापक सोच को दर्शाती है। प्रभावी प्रवर्तन, सिंथेटिक ड्रग्स और रसायनों पर नियंत्रण, नशे की मांग कम करना तथा पुनर्वास और संस्थागत क्षमता निर्माण—इन सभी पहलुओं को समान महत्व दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि सरकार समस्या के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष पर भी काम करना चाहती है।

राज्यों की भूमिका को लेकर भी सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है। ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई केवल केंद्र सरकार नहीं जीत सकती। एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स को अधिक संसाधन, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, मजबूत चार्जशीट और जवाबदेह व्यवस्था पर जोर इस बात का संकेत देता है कि अब परिणाम-आधारित कार्यसंस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि राज्यों में यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो ड्रग्स नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाए रखना संभव होगा।

विशेष एनडीपीएस अदालतों के गठन पर दिया गया जोर भी स्वागत योग्य है। अक्सर वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने से अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। यदि जांच के साथ त्वरित सुनवाई और शीघ्र सजा सुनिश्चित होती है, तो इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी व्यापक होगा और ड्रग्स कारोबार में शामिल लोगों के मन में कानून का भय बढ़ेगा।

सरकार ने सीमाओं से लेकर गांवों तक निगरानी मजबूत करने की जो योजना बनाई है, वह भी महत्वपूर्ण है। सीमावर्ती गांवों, बंदरगाहों, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों और संवेदनशील जिलों में तकनीकी निगरानी तथा कम्युनिटी पुलिसिंग का विस्तार इस बात का संकेत है कि अब तस्करी के हर संभावित मार्ग पर नजर रखी जाएगी। साथ ही अवैध अफीम और अन्य मादक फसलों की खेती के खिलाफ बढ़ती कार्रवाई यह दर्शाती है कि सरकार उत्पादन के स्रोत पर भी समान सख्ती बरत रही है।

ड्रग्स के खिलाफ समाज की भागीदारी को अभियान का आधार बनाना भी दूरदर्शी कदम है। माता-पिता, शिक्षक, शिक्षण संस्थान, युवा संगठन और सामाजिक संस्थाएं यदि इस लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो नशे की मांग स्वतः घटेगी। आखिर किसी भी अवैध कारोबार का सबसे बड़ा आधार उसकी मांग होती है। जब समाज ही नशे के प्रति जागरूक होगा, तो तस्करी के नेटवर्क भी कमजोर पड़ेंगे।

इस संबंध में पिछले वर्षों के आंकड़े भी बताते हैं कि कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ा है। रिकॉर्ड मात्रा में मादक पदार्थों की जब्ती, लाखों मामलों का पंजीकरण, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां, अवैध खेती का विनाश और हजारों करोड़ रुपए मूल्य के ड्रग्स का नष्ट किया जाना इस बात का संकेत देता है कि सरकार ने इस चुनौती को प्राथमिकता दी है। अब 6,000 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के मादक पदार्थों के विनष्टीकरण का नया अभियान इस प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।

निस्संदेह, नशामुक्त भारत का लक्ष्य सिर्फ सरकारी योजनाओं के भरोसे हासिल नहीं हो सकता। इसके लिए कानून, तकनीक, न्याय व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता और जनसहभागिता सहित वे सभी उपाय एक साथ हर मोर्चे पर करने होंगे, जो इस समस्या को रोकने के लिए आवश्यक हैं। 'डिटेक्ट, डिसरप्ट और डिस्ट्रॉय' की नई रणनीति इसी समग्र सोच का परिचायक है। यदि इस रोडमैप को पूरी प्रतिबद्धता और समन्वय के साथ लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत ड्रग्स माफिया के खिलाफ निर्णायक बढ़त हासिल करेगा। तभी हम सही मायनों में विकसित भारत के संकल्प को भी एक मजबूत सामाजिक आधार प्रदान कर पाएंगे।

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