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भारत में मिलावट की समस्या

खाने में मिलावट की समस्या से लड़ता भारत

भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट बड़ी समस्या बन गई है, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। सरकार और एफएसएसएआई इससे निपटने के लिए प्रयास कर रहे हैं।


खाने में मिलावट की समस्या से लड़ता भारत

AI |

विवेक शुक्ला

जरा कल्पना कीजिए कि सुबह आप चाय में दूध डालते हैं, लेकिन वह दूध पानी और कुछ केमिकल से मिला हुआ है। या फिर सब्जी बाजार से लाया गया मिर्च पाउडर सिंथेटिक रंग से मिला हुआ है। अफसोस की बात है कि यह भारत में रोजमर्रा की हकीकत है। खाने-पीने की चीजों में मिलावट आज देश की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यह सिर्फ पैसे बचाने का लालच नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सेहत से खिलवाड़ है।

भारत में खाद्य मिलावट की जड़ें काफी गहरी हैं। एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026 में जांचे गए हर छह खाद्य नमूनों में से एक फेल हो गया। यानी करीब 16-17 प्रतिशत सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। दूध, घी, मसाले, पनीर, तेल और चाय पाउडर जैसे उत्पाद मिलावट के सबसे आम शिकार हैं।महाराष्ट्र में हाल ही में एफडीए की कार्रवाई के दौरान ट्रक चालक दूध फेंकने लगे, क्योंकि उन्हें डर था कि वह मिलावटी पाया जाएगा। शोलापुर में 37,000 लीटर से अधिक मिलावटी दूध जब्त कर नष्ट किया गया। अब तक 359 गिरफ्तारियां, 235 एफआईआर और करोड़ों रुपये का सामान जब्त किया जा चुका है। दूध संग्रहण में 20-25 प्रतिशत तक की गिरावट आई है, जो बताती है कि पहले कितना बड़ा घोटाला चल रहा था।

दिल्ली और उत्तर प्रदेश में पनीर की स्थिति और भी खराब है। 83 प्रतिशत सैंपल फेल पाए गए, जिनमें से 40 प्रतिशत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक थे। पाम ऑयल, यूरिया और अन्य रसायनों से नकली पनीर तैयार किया जाता है। मसालों में सिंथेटिक रंग, मछली में फॉर्मेलिन और घी में वनस्पति तेल की मिलावट जैसी समस्याएं भी आम हैं। यह सूची काफी लंबी है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक, छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े सप्लाई चेन तक यह समस्या फैली हुई है। गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होता है, क्योंकि वे अपेक्षाकृत सस्ता सामान खरीदते हैं।दिल्ली में नवरात्रि के दौरान मिलावटी आटा खाने से सैकड़ों लोग अस्पताल पहुंच गए। पंजाब में घी और मिठाइयों पर छापेमारी के दौरान हजारों किलो मिलावटी सामान जब्त किया गया।

दुष्परिणाम क्या हैं?

खाद्य मिलावट के दुष्परिणाम दो तरह के होते हैं। पहला, तत्काल प्रभाव  पेट दर्द, उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याएं। दूसरा, लंबे समय में लीवर और किडनी को नुकसान, कैंसर, हार्मोन संबंधी विकार और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में मिलावटी खाद्य पदार्थों के कारण हर साल लगभग 60 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं या अपनी जान गंवाते हैं। भारत में यह स्थिति और भी गंभीर है। सिंथेटिक रंग वाली मिर्च पेट संबंधी बीमारियां बढ़ा रही है। डिटर्जेंट मिले दूध से बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है और उनकी हड्डियां कमजोर हो रही हैं। लंबे समय तक ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

सरकार की कोशिशें

अब सरकार इस समस्या से निपटने के लिए गंभीरता से प्रयास कर रही है। एफएसएसएआई की ओर से नियमित सैंपलिंग, छापेमारी और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह भारत सरकार का प्रमुख संगठन है, जो पूरे देश में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा, गुणवत्ता और मानकों की निगरानी करता है।राज्यों में एफडीए और स्वास्थ्य विभाग लगातार कार्रवाई कर रहे हैं। दोषियों पर जुर्माना लगाया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है और मिलावटी सामान नष्ट किया जा रहा है। स्कूलों में भी फूड सेफ्टी एजुकेशन के अभियान चलाए जा रहे हैं। हालांकि, संसाधनों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन प्रयास लगातार जारी हैं।

उदाहरण के तौर पर, दिल्ली-हरियाणा सीमा पर भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय का संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट (निफ्टेम) खाद्य अनुसंधान और विश्लेषण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। यहां खाद्य मिलावट की पहचान, खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता पर निरंतर अनुसंधान किया जाता है।

यहां रैपिड टेस्टिंग किट, आधुनिक विश्लेषण तकनीकों और खाद्य सुरक्षा मानकों पर शोध किया जाता है। निफ्टेम के निदेशक एवं प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय कहते हैं कि हम 'थोड़ा कम, ईट राइट' के विचार को आगे बढ़ा रहे हैं। हमारे वैज्ञानिक उद्योगों के साथ मिलकर नई तकनीकें विकसित करते हैं और उन्हें साझा भी करते हैं। नई मशीनें और तकनीकें फैक्टरियों तक पहुंचाई जाती हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक अपने शोध कार्यों को पुस्तकों और शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित करते हैं, जिससे दूसरे लोग भी उनसे सीख सकें। निफ्टेम नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित करता है, जिनमें लोगों को खाद्य सुरक्षा के बारे में जानकारी दी जाती है।

सीएफआरए (खाद्य अनुसंधान एवं विश्लेषण केंद्र) में आधुनिक परीक्षण मशीनें स्थापित हैं। इनकी सहायता से मिलावट की पहचान बहुत तेजी से की जा सकती है। पहले जहां जांच में एक-दो दिन लग जाते थे, वहीं अब कुछ घंटों या मिनटों में ही रिपोर्ट मिल जाती है।फोर्टिफिकेशन, यानी खाद्य पदार्थों में आवश्यक पोषक तत्वों को शामिल करने का कार्य भी तेजी से किया जा रहा है। इससे भोजन अधिक पौष्टिक और सुरक्षित बनता है।विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर निफ्टेम विशेष कार्यक्रम आयोजित करता है। इनमें सड़क किनारे खाद्य सामग्री बेचने वाले विक्रेताओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें स्वच्छता, खाद्य पदार्थों के सुरक्षित भंडारण और मिलावट से बचने के तरीकों की जानकारी दी जाती है।

डॉ. ओबेरॉय कहते हैं कि हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा मिलती है। हमारा लक्ष्य भारत को ऐसा देश बनाना है, जहां खाने-पीने की वस्तुओं में किसी भी प्रकार की मिलावट न हो।खाद्य मिलावट से निपटने के लिए सस्ती और तेज परीक्षण किट विकसित की जा रही हैं, जिनकी मदद से गांव और शहर, दोनों जगह आसानी से जांच की जा सकेगी। ये शोध एफएसएसएआई को बेहतर नियम बनाने में भी सहायता करते हैं। साथ ही, फैक्टरियों को स्वच्छ और आधुनिक प्रोसेसिंग तकनीक उपलब्ध कराई जाती है, जिससे मिलावट की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

जागरूकता कार्यक्रमों और प्रशिक्षण के माध्यम से पूरे सप्लाई चेन को मजबूत बनाया जा रहा है। इससे किसान से लेकर दुकानदार तक सभी अधिक सतर्क रहेंगे। लंबे समय में लोगों की बीमारियां कम होंगी, स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च घटेगा और भारत के खाद्य उत्पादों की विदेशों में मांग भी बढ़ेगी।उदाहरण के तौर पर, यदि निफ्टेम की तकनीक से मसालों या दूध की जांच मात्र 10 मिनट में हो जाए, तो अधिकारी तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे। वहीं, प्रशिक्षित ठेला विक्रेता स्वच्छ और शुद्ध भोजन बेचेंगे, जिससे ग्राहकों का भरोसा भी बढ़ेगा।

खाने में मिलावट की समस्या भले ही गंभीर हो, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे। सरकार के प्रयास, निफ्टेम जैसे संस्थानों का अनुसंधान और डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय जैसे विशेषज्ञों का नेतृत्व मिलकर बड़ा बदलाव ला रहे हैं। अब हम सभी को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। खाद्य पदार्थ खरीदते समय लेबल ध्यान से पढ़ें, एफएसएसएआई का लोगो देखें और यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी दिखाई दे तो उसकी शिकायत अवश्य करें।

यदि हर स्तर पर ईमानदारी और जागरूकता आए, तो स्वस्थ भारत का सपना निश्चित रूप से साकार हो सकता है। इस लक्ष्य को हासिल करने में निफ्टेम जैसे संस्थानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। याद रखें, खाना केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन बनाने के लिए होता है। आइए, मिलकर 'ईट राइट' अभियान को आगे बढ़ाएं।

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