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बाल कैंसर की बढ़ती चुनौती

भारत में बढ़ते बाल कैंसर के मामले : क्या हम समय रहते चेतेंगे?

भारत में बाल कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इस गंभीर स्थिति का सामना करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण और जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।


भारत में बढ़ते बाल कैंसर के मामले  क्या हम समय रहते चेतेंगे

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी युवा पीढ़ी और उसका बचपन होता है। यदि वही बचपन किसी गंभीर और जानलेवा बीमारी की गिरफ्त में आने लगे, तो यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का भी संकट बन जाता है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट में प्रकाशित हालिया अध्ययन ने भारत में बाल कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यदि यह प्रवृत्ति इसी गति से आगे बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में यह देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकती है।

भारत विश्व की सर्वाधिक आबादी वाले देशों में है और कैंसर रोगियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। चिंताजनक तथ्य यह है कि अब यह बीमारी केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बड़ी संख्या में बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। बचपन में कैंसर का होना किसी भी परिवार के लिए असहनीय मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा का कारण बन जाता है। ऐसे में यह विषय केवल चिकित्सा विज्ञान का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है।

निस्संदेह, पिछले दो दशकों में भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आधुनिक जाँच तकनीकों का विस्तार महानगरों से निकलकर जिला और ग्रामीण स्तर तक पहुँचा है। इसी कारण पहले जिन रोगों का पता नहीं चल पाता था, आज उनका समय पर निदान संभव हो रहा है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आज भी अनेक जिलों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की जाँच और उपचार की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। लाखों मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, जिससे उपचार में देरी होती है और आर्थिक बोझ कई गुना बढ़ जाता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में कैंसर के कई कारण आनुवंशिक परिवर्तन, जीन म्यूटेशन अथवा जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े हो सकते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ बदलती जीवनशैली, प्रदूषित पर्यावरण, रासायनिक पदार्थों का बढ़ता उपयोग, कीटनाशकों से प्रभावित खाद्य पदार्थ, जंक फूड की बढ़ती प्रवृत्ति तथा तंबाकू और अन्य मादक पदार्थों का बढ़ता प्रभाव भी स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इन कारणों की अनदेखी करना भविष्य के साथ अन्याय होगा।कैंसर जैसी बीमारी में समय पर पहचान ही सबसे बड़ा उपचार सिद्ध होती है। यदि प्रत्येक जिले में आधुनिक कैंसर जाँच केंद्र, प्रशिक्षित विशेषज्ञ, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी तथा आवश्यक दवाओं की समुचित व्यवस्था उपलब्ध हो, तो हजारों बच्चों और लाखों मरीजों का जीवन बचाया जा सकता है। स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ बड़ी आबादी सीमित आय पर जीवनयापन करती है, वहाँ कैंसर का महंगा उपचार अधिकांश परिवारों की सामर्थ्य से बाहर होता है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संचालित स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाएँ अनेक परिवारों के लिए जीवनदायिनी सिद्ध हुई हैं। फिर भी आवश्यकता इस बात की है कि इन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक सरलता और पारदर्शिता के साथ पहुँचे तथा कैंसर उपचार की सुविधाओं का दायरा और अधिक विस्तृत किया जाए।साथ ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा अन्य वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं को कैंसर की रोकथाम, शीघ्र जाँच, सस्ती दवाओं और आधुनिक उपचार तकनीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विश्वव्यापी अभियान चलाना चाहिए। कैंसर अब किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा चुनौती बन चुका है। इसलिए इसका समाधान भी वैश्विक सहयोग से ही संभव है।

सरकारों की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन समाज और परिवारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। माता-पिता को बच्चों के खान-पान, दिनचर्या और स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग होना होगा। संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, नियमित व्यायाम, योग, स्वच्छ वातावरण और नशामुक्त जीवनशैली ही अनेक गंभीर बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। बीमारी का इलाज अस्पताल में होता है, लेकिन उसके विरुद्ध सबसे पहली लड़ाई घर से शुरू होती है।आज आवश्यकता भय फैलाने की नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाने की है। यदि सरकार, चिकित्सा जगत, सामाजिक संस्थाएँ और नागरिक मिलकर समय रहते ठोस प्रयास करें, तो कैंसर के बढ़ते खतरे पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। स्वस्थ बचपन ही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव है। यदि हमें वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना साकार करना है, तो अपने बच्चों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से सुरक्षित रखना हमारी सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।


अरविन्द रावल
(लेखक स्तंभकार हैं)

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