बंगाल जहां पर ममता बनर्जी के शासनकाल में महिलाओं पर अंतहीन अत्याचार किये गए थे। यदि बलात्कारों के मामलों की सूची बनाई जाए तो शायद वह कई दिनों में समाप्त हो और या कहें कि समाप्त हो भी न क्योंकि असंख्य मामले तो चर्चा में आ ही नहीं पाए थे। उस खौफ की क्या हद होगी जो तृणमूल कार्यकर्ताओं ने आम महिला के मन में भर दिया था।
आज ही सोशल मीडिया पर एक वीडियो था, जिसमें मछली बेचने वाली वृद्ध महिलाएं यह बता रही थीं कि कैसे उन्हें रोज टीएमसी के कार्यकर्ताओं को कट मनी देना होता था। वहीं सोशल मीडिया पर उषा उत्थुप का एक वीडियो वायरल है, जिसमें वे ममता के जाने पर गाना गा रही हैं। बंगाल से सैकड़ों वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें लड़कियां रात को सुरक्षित जाने की बात कर रही हैं और जश्न मना रही हैं कि अब वे आजादी से घूम सकती हैं। मगर एक वर्ग है जिसे इन महिलाओं की यह आजादी पसंद नहीं आ रही है। इन औरतों को इन स्वतंत्र महिलाओं की मुस्कान भा नहीं रही है और ये औरतें अब इन महिलाओं को ही खलनायिका ठहरा रही हैं।
लेख लिखे जा रहे हैं और यह बताया जा रहा है कि कैसे ये साड़ी और बिंदी वाली महिलाएं दरअसल उत्पीड़कों का हथियार हैं। एक लेख मैंने पढ़ा उसमें किसी पुस्तक के हवाले से लिखा गया है कि ““What we need now is a bestiary of enemy feminisms, to jolt us into understanding that a woman’s cry for women’s power is sometimes part and parcel of the oppressor’s program.“
अर्थात इस पुस्तक में लिखा है कि ““अब हमें दुश्मन नारीवादों की एक ऐसी सूची की ज़रूरत है, जो हमें यह समझने के लिए झकझोर दे कि महिलाओं की शक्ति के लिए किसी महिला की पुकार, कभी-कभी खुद उत्पीड़क के ही एजेंडे का एक अभिन्न हिस्सा होती है।”
यह सोफिया लूइस की पुस्तक एनिमी फेमिनिज़्म से लिखा गया है। और इस लेख की लेखिका दुश्मन फेमिनिज़्म को हिन्दू नेशनलिस्ट फेमिनिज़्म के रूप में बताती हैं। यह घोषित करती हैं हिन्दू नेशनलिस्ट फेमिनिज़्म दरअसल दुश्मन फेमिनिज़्म है।
इस पुस्तक में एक और शब्द दिया है और वह है “femonationalism” अब इसका अर्थ हुआ, “फेमोनेशनलिज़्म का तात्पर्य दो बातों से है: पहला, इस्लाम-विरोधी (और साथ ही आप्रवासन-विरोधी) अभियानों में राष्ट्रवादियों और नव-उदारवादियों द्वारा नारीवादी विषयों का अपने हित के लिए इस्तेमाल; और दूसरा, लैंगिक समानता की आड़ में मुस्लिम पुरुषों को कलंकित करने में कुछ नारीवादियों और 'फेमोक्रेट्स' (नारीवादी नौकरशाहों) की भागीदारी।“
यह परिभाषा बहुत ही घातक है। आज जहां विश्व में महिलाएं ग्रूमिंग गैंग्स, लवर बॉय्ज़ जैसे संगठित अपराधों से पीड़ित हो रही हैं, उनकी पीड़ा को सुना नहीं जाता है और न ही उनकी पीड़ा को विमर्श में स्थान मिलता है और अब उन्हें एक नए शब्दों में खलनायिका भी ठहरा दिया है। और वह भी महिलाओं द्वारा!
यह बंगाल की महिलाओं के साथ कितना बड़ा अन्याय है कि जहां एक तरफ ममता के शासनकाल में उनके साथ हुए अत्याचारों को नहीं सुना गया और न ही विमर्श में लाया गया, तो वहीं भाजपा की जीत के बाद वही पीड़ित और साहसी महिलाएं खलनायिका ठहराई जा रही हैं।

सोनाली मिश्रा