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संघ कार्य के 100 वर्ष: दीप से दीप जलाने वाला व्यक्तित्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता बाबा साहब नातू के जीवन, त्याग और संगठन निर्माण की प्रेरक कहानी। जानें कैसे उन्होंने कार्यकर्ताओं के जीवन को दिशा दी।

By : स्वदेश डेस्क
संघ कार्य के 100 वर्ष: दीप से दीप जलाने वाला व्यक्तित्व

सुबह की पहली किरण अभी क्षितिज पर पूरी तरह फैली भी नहीं थी। उज्जैन की संकरी गलियों में मंदिरों की घंटियां एक शांत लय रच रही थीं। एक साधारण से घर के आंगन में, तुलसी के चौरे के पास, बाचा साहब नातू चुपचाप बैठे थे। सामने एक युवा कार्यकर्ता - लल्लाजी, संकोच और श्रद्धा के बीच झूलते हुए अपनी बात कह रहा था। बोला 'बाबा साहब, इस बार भी मैंने एक हजार रुपए गुरुदक्षिणा में दिए है...' बाबा साहब ने उसकी ओर गहराई से देखा। वह दृष्टि केवल सुनने की नहीं, समझने की थी। कुछ क्षणों का मौन और फिर एक सरल प्रश्न 'घर तो ठीक से चल रहा है न?' युवक की आंखें झुक गई, बोला 'जैसे-तैसे चल जाता है बाबा साहब...' यही वह क्षण था, जहां एक संगठनकर्ता नहीं, एक जीवन-निर्माता बोल रहा था। बाबा साहब ने धीमे स्वर में कहा- 'सेवा का अर्थ स्वयं को जलाकर समाप्त कर देना नहीं, दीपक बनकर प्रकाश देना है।' उन्होंने स्पष्ट कहा- 'अब तुम केवल 101 रुपए ही गुरुदक्षिणा दोगे।' यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं था, यह एक परिवार को टूटने से बचाने का निर्णय था। यही बाबा साहब की पहचान थी कि कार्यकर्ता के जीवन की रक्षा करते हुए संगठन का विस्तार करना।

कार्यकर्ता ही कार्य का केंद्रः समय के साथ उन्हें बड़े दायित्व मिले प्रांत और क्षेत्र स्तर तक। पर उनके लिए पद नहीं, व्यक्ति महत्वपूर्ण था। उनका मूल सिद्धांत स्पष्ट था 'कार्य का आधार कार्यकर्ता है। 'वे केवल कार्य नहीं बाँटते थे, बल्कि कार्यकर्ता को समझते थे - उसके परिवार, उसकी आर्थिक स्थिति और उसको मानसिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए ही दायित्व सौंपते थे।

एक कार्यकर्ता, जो आगे चलकर मुख्यमंत्री बनाः इसी दृष्टि का एक अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग उस समय का है, जब एक युवा ऊर्जावान स्वयंसेवक संगठन कार्य में दिन-रात जुटा रहता था यह युवा आगे चलकर मध्यप्रदेश का नेतृत्व करने वाला बना। यह वही समय था, जब वह छात्र जीवन से निकलकर संगठन के कार्य में पूरी तरह रमा हुआ था। घर पर माता-पिता को चिंता होती थी 'दिन भर बाहर रहता है, प्रवास में रहता है... इसका जीवन कैसे व्यवस्थित होगा?' परिवार ने अपनी चिंता बाबा साहब के सामने रखी।

बाबासाहब ने इसे केवल एक सामाजिक औपचारिकता नहीं माना। उन्होंने उस कार्यकर्ता के स्वभाव, उसके जीवन की दिशा और उसके दायित्वों को ध्यान में रखते हुए, उसके लिए ऐसा परिवार खोजने का निर्णय लिया, जो उसके जीवन-पथ को समझ सके। उन्होंने स्वयं पहल की, संवाद किए, और अंततः रीवा के एक संस्कारित परिवार में उसका विवाह सुनिश्चित कराया। वर्षों बाद, वही कार्यकर्ता जब प्रदेश के सर्वोच्च दायित्व पर पहुँचा, तब उसने स्मरण करते हुए भावुक स्वर में कहा कि 'मेरे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में बाबा साहब का मार्गदर्शन हमेशा रहा। उन्होंने केवल संगठन नहीं बनाया, कार्यकर्ताओं का जीवन भी सँवारा।' आज वे कार्यकर्ता हैं मोहन यादव, पर उनके जीवन में वह संस्कार-बीज बाबा साहब ने ही रोपा था। यह प्रसंग बताता है कि बाबा साहब केवल संगठन खड़ा नहीं करते थे, वे जीवन गढ़ते थे, ऐसे जीवन, जो आगे चलकर समाज और राज्य की दिशा तय करते हैं।

अंतिम वर्षों का धैर्य और त्यागः जीवन के अंतिम वर्षों में वे 'मायस्थेनिया ग्रेविस' जैसे गंभीर रोग से ग्रस्त हुए, जिससे उनका प्रवास कठिन हो गया। तब उन्होंने स्वयं ही दायित्वों से अलग होने का निर्णय लिया। यह त्याग भी उतना ही प्रेरक था, जितना उनका कर्म।

प्रकाश जो भीतर जगता है: उस सुबह उज्जैन के छोटे-से आँगन में जो हुआ, वह केवल एक संवाद नहीं था बल्कि वह एक जीवन-दर्शन था। बाबासाहब ने उस दिन केवल एक कार्यकर्ता को नहीं, एक परिवार को संभाला, केवल एक निर्णय नहीं लिया, बल्कि संतुलित जीवन की राह दिखा दी। सूर्य अब पूरी तरह उग आया था। गलियों में जीवन चहल-पहल से भर गया था। पर उस आँगन में जो प्रकाश फैला था, वह बाहरी नहीं, भीतर का उजाला था वही उजाला, जिसे बाबा साहब नातू अपने हर स्पर्श, हर निर्णय और हर कार्यकर्ता के जीवन में प्रज्वलित करते रहे दीप से दीप जलाने की अनवरत परंपरा बनकर।

त्याग, संघर्ष और समर्पण की यात्रा

स्नातक की शिक्षा के लिए वे पुनः ग्वालियर गए और महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय से अध्ययन पूर्ण किया। कुछ समय तक उन्होंने नौकरी भी की यहा तक कि लिप्टन के विक्रय प्रतिनिधि के रूप में

भोपाल में कार्यरत रहे। परंतु समाज की परिस्थितियों ने उन्हें भीतर तक उद्वेलित किया और उन्होंने अपना जीवन पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में समर्पित कर दिया। उज्जैन, रतलाम और व्यापक मध्यभारत उनका कार्यक्षेत्र बना। प्रतिबंध के कठिन समय में भी, जब अनेक लोग पीछे हट गए, वे अडिग रहे। सोनकच्छ में 'संतोष उपहार गृह' चलाते हुए भी उनका मन संगठन के कार्य में ही लगा रहा। प्रतिबंध हटते ही वे पुनः उसी ऊर्जा के साथ कार्य में जुट गए।

संस्कारों की जड़ें और जीवन का मोड़

बाबा साहब का वास्तविक नाम अनंत शंकर नातू था। मूलतः महाराष्ट्र के वाई क्षेत्र से जुड़े उनके परिवार ने परिस्थितिवश ग्वालियर और अन्य नगरों में अपना ठिकाना बनाया। उनके पिता प्रशासनिक सेवा में थे. और इसी क्रम में उनका जन्म सरदारपुर में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई, जहाँ का धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण उनके व्यक्तित्व को भीतर ही भीतर आकार दे रहा था। युवावस्था में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में केवल शंख बजाना सीखने के उद्देश्य से गए थे, पर वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। अनुशासन, राष्ट्रभाव और संगठन की भावना ने उन्हें भीतर से परिवर्तित कर दिया।



 

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