एएसआई की खुदाइयों में भोजशाला और राजस्थान के रीढ़ का टीला जैसे स्थलों से सनातन संस्कृति की प्राचीनता के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट वैज्ञानिक आधार पर तैयार, मामला अदालत में विचाराधीन
हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों से यह संकेत मिला है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यही निरंतरता सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाइयों में राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक कई ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे यह साबित होता है कि हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला परिसर में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। हालांकि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन खुदाई के दौरान जिस तरह के चिन्ह सामने आ रहे हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि इन स्थानों पर पहले हिंदू मंदिर मौजूद थे, जिन्हें तोड़कर कहीं मस्जिद तो कहीं मजारें बनाई गईं। इससे यह भी पता चलता है कि हिंदू संस्कृति एक हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।
मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। यह रिपोर्ट 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण लगभग 1265 ईस्वी के आसपास बताया गया है। इससे यह साफ होता है कि पहले भोजशाला का निर्माण किया गया और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के चिन्ह पाए गए हैं। इन प्रतीकों को देखने मात्र से ही स्पष्ट होता है कि वे सनातन परंपरा से जुड़े हुए हैं। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड की मंदिर निर्माण परंपराओं से मेल खाती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं रही, बल्कि वैज्ञानिक पद्धतियों पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने में यह पद्धति निर्णायक साबित हो रही है।
झुंझुनू जिले की खेतड़ी तहसील के त्योंदा गांव में स्थित ‘रीढ़ का टीला’ भी इतिहास के नए पन्ने खोल रहा है। यहां जनवरी से जारी खुदाई में लगभग एक हजार वर्ष पुराने अवशेष सामने आए हैं। सतह से ढाई से छह मीटर नीचे मंदिर संरचना, स्तंभों के आधार तथा भगवान विष्णु, गणेश और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों के अवशेष मिले हैं। यह संकेत देता है कि यहां कभी एक समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि कई मूर्तियां इस तरह मिली हैं, जैसे उन्हें सुरक्षित रूप से दबाकर रखा गया हो। पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे की कीलों का प्रयोग उस काल के उच्च स्थापत्य कौशल को दर्शाता है। मिट्टी के बर्तन, कुछ हाथ से बने और कुछ चाक पर बने हुए, उस समय की स्थानीय जीवनशैली और सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थल केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रहा होगा।
पुरातत्व अधिकारियों के अनुसार, यह प्राचीन नगर दौहान नदी के किनारे बसा था और संभवतः ‘पाटन’ नाम से जाना जाता था। भारतीय सभ्यता में नदियों के किनारे नगर बसाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। नदियां केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवनरेखा भी मानी जाती थीं। इससे सनातन परंपरा की वह विशेषता उजागर होती है, जिसमें प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।रीढ़ के टीले से मिले अवशेष फिलहाल मध्यकालीन प्रतीत होते हैं, लेकिन आगे की खुदाई इन्हें और भी प्राचीन कालखंडों से जोड़ सकती है।