यूरोप में स्मार्टफोन कंपनियों पर सख्ती। अब 7 साल तक स्पेयर पार्ट्स और 5 साल अपडेट देना अनिवार्य होगा। जानिए नए नियम और भारत पर असर। swadesh news
स्मार्टफोन यूजर्स की एक आम शिकायत रही है कि नया फोन कुछ सालों बाद अचानक धीमा पड़ने लगता है। अब इस समस्या पर यूरोप में सख्त कदम उठाए गए हैं। यूरोपीय संघ (EU) ने ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ यानी जानबूझकर डिवाइस को जल्दी पुराना बनाने की रणनीति पर रोक लगाने की तैयारी की है।
क्या है ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ का मामला
विशेषज्ञों के अनुसार, कई टेक कंपनियां अपने डिवाइस को इस तरह डिजाइन करती हैं कि कुछ वर्षों बाद उनकी परफॉर्मेंस गिरने लगे। इससे यूजर नया स्मार्टफोन खरीदने के लिए मजबूर होता है। 2017 में Apple Inc. ने स्वीकार किया था कि उसने पुराने iPhone मॉडल्स की परफॉर्मेंस को बैटरी सुरक्षा के नाम पर धीमा किया था। इस खुलासे के बाद वैश्विक स्तर पर बहस तेज हुई थी।
EU के नए नियम: ग्राहकों को मिलेगा अधिक अधिकार
यूरोपीय संघ 2027 से ‘इकोडिजाइन’ के तहत नए नियम लागू करेगा। इनका उद्देश्य स्मार्टफोन की लाइफ बढ़ाना और रिपेयर को आसान बनाना है।
1. बैटरी पर सख्त मानक
अब हर स्मार्टफोन बैटरी को कम से कम 800 चार्ज साइकल के बाद भी 80% क्षमता बनाए रखनी होगी। इससे फोन की बैटरी अचानक कमजोर नहीं होगी।
2. 7 साल तक स्पेयर पार्ट्स की गारंटी
कंपनियों को किसी मॉडल के बंद होने के बाद भी 7 साल तक उसके स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही 5 से 10 दिनों में डिलीवरी सुनिश्चित करनी होगी।
3. रिपेयर रेटिंग अनिवार्य
अब स्मार्टफोन पर ‘रिपेयर रेटिंग’ दी जाएगी, जिससे ग्राहक जान सकेंगे कि फोन को ठीक करना कितना आसान है।
4. 5 साल तक सॉफ्टवेयर अपडेट
कंपनियों को कम से कम 5 साल तक सॉफ्टवेयर और सिक्योरिटी अपडेट देना अनिवार्य होगा। इससे पुराने फोन भी सुरक्षित और उपयोगी बने रहेंगे।
यूजर्स को होगा सीधा फायदा
इन नियमों के लागू होने के बाद एक औसत स्मार्टफोन की उम्र बढ़कर 3 साल से 4 साल से अधिक हो सकती है। इससे यूजर्स को बार-बार नया फोन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी और खर्च में भी कमी आएगी।
रिपेयर मुश्किल क्यों हुआ?
पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने पतले और वाटरप्रूफ फोन बनाने के लिए ‘सील्ड डिजाइन’ अपनाया। इससे बैटरी बदलना और रिपेयर कराना मुश्किल हो गया। कई मामलों में थर्ड-पार्टी रिपेयर पर भी तकनीकी सीमाएं लगा दी गईं।
भारत पर क्या असर पड़ेगा
हालांकि ये नियम यूरोप के लिए हैं, लेकिन Apple Inc. जैसी वैश्विक कंपनियां अलग-अलग बाजारों के लिए अलग डिजाइन नहीं बनातीं। ऐसे में इन बदलावों का फायदा भारतीय ग्राहकों को भी मिलने की संभावना है।
फोन की लाइफ कौन तय करेगा?
यह मुद्दा सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों का भी है। अब तक कंपनियां तय करती थीं कि फोन कब तक चलेगा, लेकिन नए नियम इस नियंत्रण को यूजर्स की ओर वापस लाने की कोशिश हैं। अगर ये मॉडल सफल होता है, तो आने वाले समय में दुनियाभर में स्मार्टफोन इंडस्ट्री में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।