विश्व निद्रा दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अनिद्रा तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या बन रही है। पर्याप्त नींद न मिलने से मानसिक अवसाद, तनाव और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
अरविंद जयतिलक
आज विश्व निद्रा दिवस है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में नींद के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। मानव स्वास्थ्य और सेहत के लिए पर्याप्त नींद बेहद आवश्यक है।याद होगा कि गत वर्ष पहले फिलिप्स के वार्षिक वैश्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि दुनियाभर में तकरीबन 10 करोड़ लोग अनिद्रा की बीमारी से ग्रसित हैं। दुनिया के 13 देशों संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैंड, फ्रांस, भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया, कोलंबिया, अर्जेंटीना, मैक्सिको, ब्राजील और जापान के 15 हजार से अधिक वयस्कों पर किए गए इस सर्वेक्षण में कहा गया कि 40 प्रतिशत से अधिक लोग अनिद्रा की बीमारी से अनभिज्ञ हैं, जबकि 30 प्रतिशत लोग नींद लेने और उसे बनाए रखने में दिक्कत महसूस करते हैं।
इस रिपोर्ट से यह भी उद्घाटित हुआ था कि देश की राजधानी दिल्ली में 67 प्रतिशत, कोलकाता में 60 प्रतिशत, बेंगलुरु में 59 प्रतिशत तथा चेन्नई में 58 प्रतिशत लोग अनिद्रा के शिकार हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 19 प्रतिशत वयस्कों ने स्वीकार किया कि सामान्य नींद के समय के साथ काम के घंटों का अतिव्यापन अनिद्रा का एक प्रमुख कारण है। इसी तरह 32 प्रतिशत वयस्कों ने स्वीकार किया कि प्रौद्योगिकी भी नींद में बाधा बनने वाला एक प्रमुख कारण है।अमेरिका की राष्ट्रीय निद्रा फाउंडेशन के मुताबिक 30-40 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों का कहना है कि उनमें अनिद्रा के लक्षण हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अनिद्रा के कारण कई तरह की बीमारियां पनपती हैं और जीवन प्रत्याशा कम होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
16 अध्ययनों के एक विश्लेषण में 10 लाख से अधिक प्रतिभागियों और 1,12,566 मौतों के आंकड़ों के आधार पर नींद की अवधि और मृत्युदर के बीच संबंधों की जांच में पाया गया कि जो लोग रात में सात से आठ घंटे सोते थे, उनकी तुलना में कम सोने वाले व्यक्तियों में मृत्यु का खतरा 12 प्रतिशत अधिक होता है। हाल ही में एक अन्य अध्ययन में 38 वर्षों तक सतत नींद और मृत्युदर के प्रभावों की जांच में पाया गया कि लगातार अनिद्रा से ग्रसित लोगों में मृत्यु का जोखिम 97 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।अनिद्रा का दुष्परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में हीन भावना बढ़ती है और उसकी याददाश्त कमजोर पड़ने लगती है। उसमें चिड़चिड़ापन इस हद तक बढ़ जाता है कि वह सामाजिक रूप से मिलना-जुलना बंद कर देता है। साथ ही थकान और पर्याप्त नींद न लेने के कारण वाहन दुर्घटनाओं की संभावना भी काफी बढ़ जाती है।
भारत की बात करें तो यहां 66 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि अनिद्रा के कारण उनका स्वास्थ्य और तंदरुस्ती प्रभावित होने के साथ-साथ मानसिक अवसाद भी बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही खुलासा कर चुका है कि भारत में मानसिक अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनके कई कारणों में से एक कारण अनिद्रा भी है।गत वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी ‘डिप्रेशन एंड अदर कॉमन मेंटल डिसऑर्डर्स: ग्लोबल हेल्थ एस्टिमेट्स’ रिपोर्ट में कहा गया था कि अन्य देशों की तुलना में भारत और चीन अवसाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या सबसे अधिक है।
आंकड़ों के अनुसार भारत में 5.7 करोड़, चीन में 5.5 करोड़, बांग्लादेश में 63.9 लाख, इंडोनेशिया में 91.6 लाख, म्यांमार में 19.1 लाख, श्रीलंका में 8 लाख, थाईलैंड में 28.8 लाख तथा ऑस्ट्रेलिया में 13.1 लाख लोग अवसाद से ग्रसित हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में अवसाद से प्रभावित लोगों की कुल संख्या 32.2 करोड़ है, जिसमें लगभग 50 प्रतिशत सिर्फ भारत और चीन में ही हैं।रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि अवसाद के अलावा भारत और चीन में चिंता भी एक बड़ी समस्या है। भारत सहित अन्य मध्य आय वाले देशों में आत्महत्या के प्रमुख कारणों में चिंता भी शामिल है।देश में बढ़ते अवसाद को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने संसद में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक को मंजूरी दी है, जिसमें मानसिक अवसाद से ग्रसित व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने और उनके अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान है।
चूंकि भारत अशक्त व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संधि का हस्ताक्षरकर्ता है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी थी कि वह इस प्रकार के प्रभावी कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़े। भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए सामुदायिक स्तर पर अधिकतम स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की पहल को गति दी है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अवसाद मनोभावों से जुड़ा दुख है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को लाचार और निराश महसूस करता है। इस स्थिति से प्रभावित व्यक्ति के लिए सुख, शांति, प्रसन्नता और सफलता के मायने कम हो जाते हैं और वह निराशा, तनाव तथा अशांति के भंवर में फंस जाता है।अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश समय अवसाद छिपा हुआ रहता है, क्योंकि इससे ग्रसित व्यक्ति इस विषय पर खुलकर बात करने से हिचकता है। अवसाद से जुड़ी शर्म की भावना ही इसके उपचार में सबसे बड़ी बाधा है।अवसाद के उपचार में कई प्रकार की साइकोथेरेपी भी मददगार सिद्ध हो रही हैं। लेकिन सबसे अधिक आवश्यकता अवसादग्रस्त लोगों के साथ संवाद और सहयोग बढ़ाने की है, ताकि उनमें आत्मविश्वास पैदा किया जा सके।
यदि अवसाद की गंभीरता पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो 2030 तक यह दुनिया की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी का रूप ले सकता है। अच्छी बात यह है कि दुनियाभर में 77 प्रतिशत लोगों ने अवसाद और बिगड़ते स्वास्थ्य से उबरने के लिए अपनी नींद में सुधार की कोशिश की है। भारत में 45 प्रतिशत वयस्कों ने ध्यान और योग अपनाने की कोशिश की है, जबकि 24 प्रतिशत लोगों ने बेहतर नींद के लिए विशेष बिस्तरों का उपयोग शुरू किया है।उचित होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसे कार्यक्रम तैयार करें, जिनसे लोगों में अच्छी नींद के प्रति जागरूकता बढ़े और वे संतुलित दिनचर्या अपनाने के लिए प्रेरित हों।