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World Radio Day 2026: Radio, AI and Changing Media

विश्व रेडियो दिवस आज:  रेडियो, मीडिया इकोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता

विश्व रेडियो दिवस 2026 पर जानिए AI के दौर में रेडियो की बदलती भूमिका, मीडिया इकोलॉजी और भारत में इसकी प्रासंगिकता

विश्व रेडियो दिवस आज  रेडियो मीडिया इकोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता

दिनेश पाठक

मीडिया इकोलॉजी यह समझने का प्रयास है कि किसी समय विशेष में सक्रिय प्रमुख मीडिया, उस काल के सांस्कृतिक वातावरण को कैसे आकार देते हैं और किन परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जिनके तहत वह वातावरण विकसित होता है।संपूर्ण विश्व की तरह पिछले डेढ़-दो दशकों से भारत में भी मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र (मीडिया इकोलॉजी) में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आम भारतीय लोग एंटरटेनमेंट और म्यूजिक ऐप्स के जरिए अपने समय का लगभग 82 प्रतिशत मोबाइल पर व्यतीत कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार इनमें 91 करोड़ से अधिक युवा आबादी शामिल है, जिसमें मिलेनियल (जेन वाई) और जेन जेड प्रमुख हैं। यह वह युवा आबादी है जिसकी औसत आयु 27 वर्ष है और जो मोबाइल की प्राथमिक उपयोगकर्ता है।

रेडियो के लिए इस बदलते चलन का अर्थ है मोबाइल-फर्स्ट और डिजिटल-फर्स्ट वातावरण में अपनी आंतरिक विशेषता ऑडियो-फर्स्ट प्रकृति का लाभ उठाना, तथा प्रतिस्पर्धात्मक और प्रासंगिक बने रहने के लिए कंटेंट और डिस्ट्रीब्यूशन की नई रणनीतियां बनाना। वैश्विक रुझानों को देखते हुए यूनेस्को ने इस वर्ष विश्व रेडियो दिवस का मुख्य विषय ‘रेडियो और कृत्रिम मेधा’ (रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) रखा है।सन् 1946 में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय स्थित संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति में 13 फरवरी को प्रति वर्ष मनाया जाने वाला विश्व रेडियो दिवस, सार्वजनिक, वाणिज्यिक और सामुदायिक प्रसारकों के साथ-साथ पॉडकास्ट और डिजिटल ऑडियो निर्माताओं के लिए रेडियो की बदलती भूमिका का विश्लेषण करने का एक वैश्विक अवसर बन गया है।

यूनेस्को के अनुसार, विश्व रेडियो दिवस 2026 के लिए कृत्रिम मेधा (एआई) पर जोर देना, रोजमर्रा के ऑडियो कार्यों में इन तकनीकों के तेजी से एकीकरण को दर्शाता है। यह थीम इस बात पर बल देती है कि रेडियो, जो अपनी मानवीय और विश्वसनीय गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, नई तकनीकी प्रगति को अपनाते हुए भी अपनी विश्वसनीयता कैसे बनाए रख सकता है।यूनेस्को का मानना है कि कृत्रिम मेधा का उपयोग अब रेडियो संचालन में प्रसारण सामग्री निर्माण और श्रोता विश्लेषण से लेकर एक्सेसिबिलिटी टूल्स और ऑटोमेशन तक, कई चरणों में किया जा रहा है। इससे इस क्षेत्र में अवसर और चुनौतियां दोनों उत्पन्न हो रही हैं। इसी कारण 2026 का विषय इस नवाचार पर जानकारीपूर्ण चर्चा को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ कार्यकारी जिम्मेदारी, पारदर्शिता और नैतिकता जैसे मुद्दों को संबोधित करने के दृष्टिकोण से तय किया गया है।

इस अवसर पर यूनेस्को ने विश्वभर के प्रसारकों और ऑडियो निर्माताओं को इस बात पर विचार करने के लिए आमंत्रित किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता रेडियो प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और कार्यकारी प्रक्रियाओं को कैसे नया रूप दे सकती है। लेकिन इस माध्यम की सर्वोच्च शक्ति आवाज की केंद्रीयता को स्वीकार करते हुए विश्व रेडियो दिवस 2026 का स्लोगन रखा गया है ‘कृत्रिम मेधा एक उपकरण है, आवाज नहीं।’भारत के तेजी से विकसित हो रहे मीडिया परिदृश्य में, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रभुत्व के बावजूद रेडियो की प्रासंगिकता एक जटिल और बहुआयामी वास्तविकता बनी हुई है। पिछले दो-ढाई दशकों में एफएम चैनलों के माध्यम से रेडियो को प्रासंगिक बनाने के प्रयासों से न केवल निजी क्षेत्र के स्तरीय रेडियो स्टेशनों की संख्या बढ़ी है, बल्कि ऑल इंडिया रेडियो की विभिन्न सेवाओं और केंद्रों के प्रसारण भी ‘न्यूज़ ऑन एयर’ तथा ‘ऑल इंडिया रेडियो लाइव’ एप्लिकेशन के जरिए आम जनता तक स्पष्ट और सहज तरीके से पहुंच रहे हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो रेडियो अप्रचलित नहीं हो रहा, बल्कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल रहा है और अपनी अद्वितीय क्षमताओं का लाभ उठा रहा है।रेडियो की बेजोड़ पहुंच, विशेष रूप से भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां डिजिटल विभाजन अभी भी मौजूद है, इसे एक अपरिहार्य जनसंचार माध्यम बनाती है। ऑल इंडिया रेडियो का विशाल नेटवर्क, निजी एफएम चैनलों का बढ़ता प्रभाव और सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की महत्वपूर्ण भूमिका यह सुनिश्चित करती है कि रेडियो देश की लगभग पूरी आबादी तक पहुंच बना सके। यही पहुंच इसे संकट के समय एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा बनाती है, जो बिजली कटौती या इंटरनेट बंद होने की स्थिति में भी विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है।

डीपफेक और गलत डिजिटल सूचनाओं के इस दौर में रेडियो एक भरोसेमंद और जनोपयोगी माध्यम बना हुआ है। हालांकि रेडियो उद्योग को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से तीव्र प्रतिस्पर्धा, विज्ञापन राजस्व पर दबाव और नियामक बाधाओं जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इन चुनौतियों से निपटने के लिए यह माध्यम डिजिटल एकीकरण, कंटेंट विविधीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों को सक्रिय रूप से अपना रहा है। डिजिटल-फर्स्ट रणनीतियां, पॉडकास्टिंग, हाईपर-पर्सनलाइजेशन और क्षेत्रीय कंटेंट पर फोकस, इसकी समसामयिकता के प्रमुख आधार हैं।

इस आधार पर कहा जा सकता है कि रेडियो भारत के विविध और गतिशील मीडिया परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक माध्यम है और आगे भी बना रहेगा। रणनीतिक अनुकूलन, नीतिगत समर्थन और तकनीकी एकीकरण के जरिए रेडियो न केवल जीवित रहेगा, बल्कि अपनी विशिष्ट उपयोगिता और सामाजिक मूल्य को पुनः परिभाषित करते हुए सूचना, मनोरंजन और विकास के पारिस्थितिकी तंत्र का एक अनिवार्य घटक बनेगा।

 

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