विश्व पृथ्वी दिवस पर भारतीय चिंतन में प्रकृति संरक्षण का संदेश। पंचतत्व से पर्यावरण संतुलन तक, संसाधनों के संरक्षण और सतत विकास पर जोर।
प्रो. आरसी. कुहाड़
विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर यह स्मरण करना आवश्यक है कि भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृक्ति को पूजनीय माना है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई इस सत्य को अत्यंत सरल और गहन रूप में अभिव्यक्त करती
'क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंचतत्व रचित अधम शरीरा।'
इस चौपाई में महाकवि तुलसीदास जी ने पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु जैसे पाँच मूल तत्वों का उल्लेख किया है, जिनसे समस्त सृष्टि और मानव शरीर की रचना मानी गई है। महर्षि कपिल के सांख्य दर्शन में भी सृष्टि निर्माण के 25 तत्वों का वर्णन मिलता है, जिनमें पंचमहाभूतों को आधार स्वरूप स्वीकार किया गया है। पृथ्वी को 'गंधवती' कहा गया है, क्योंकि यह जीवन के पोषण हेतु आवश्यक समस्त संपदाओं से परिपूर्ण है। पृथ्वी पर मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जल, वन, खनिज, ऊर्जा और जैव विविधता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। किन्तु आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक विस्तार और असीमित उपभोग की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आज भूमि, जल, वायु और अंतरिक्ष तक प्रदूषण की चपेट में हैं। प्लास्टिक, पॉलीबैग, रासायनिक अपशिष्ट, ई-वेस्ट, वाहनों का धुआँ, औद्योगिक प्रदूषण और अनियंत्रित शहरीकरण ने पृथ्वी के स्वास्थ्य को चुनौती दी है। समुद्रों में बढ़ता कचरा और अंतरिक्ष में जमा उपग्रहों का मलबा आधुनिक विकास के दुष्परिणामों का प्रमाण है। हम समस्याओं से परिचित हैं, किंतु समाधान के प्रति अपेक्षित गंभीरता अब भी दिखाई नहीं देती। हम प्रायः प्रतीक्षा करते हैं कि कोई व्यवस्था, कोई सरकार या कोई मसीहा आकर इस संकट का समाधान करेगा, जबकि वास्तविक परिवर्तन समाज के सामूहिक संकल्प से ही संभव है।
हमारे देश में नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और जीवन की आधारशिला हैं। हरियाणा और राजस्थान से होकर बहने वाली सरस्वती नदी का उल्लेख वेदों, उपनिषदों और पुराणों में मिलता है। आज वह इतिहास और शोध का विषय बन चुकी है। यही स्थिति विश्व की अनेक नदियों के साथ हो रही है। अनेक नदियाँ प्रदूषण के कारण नालों में परिवर्तित होती जा रही हैं। भारत की पवित्र नदियाँ गंगा और यमुना भी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं। यदि नदियों अस्वस्थ होगी, तो मानव जीवन और कृषि व्यवस्था दोनों संकट में पढ़ेंगे। सृष्टिकर्ता ने मनुष्ण को बुद्धि विवेक और सूजन क्षमता से संपन्न बनाया है। यह स्वाभाविक अपेक्षा है कि मनुष्य पृथ्वी को अधिक सुंदर बनाए, न कि उसका विनाश करे। श्रेष्ठ प्राणी होने के नाते हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम केवल अपने हित तक सीमित न रहें, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के हित में चिंतन करें। भारतीय दर्शन में ईश्वर को कण-कण में व्याप्त माना गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृक्ति का प्रत्येक अंश सम्मान और संरक्षण का अधिकारी है।
हमारे चिंतन में कहा गया है-'शिव भावे जीव सेवा, अर्थात शिव भाव से समस्त जीवों की सेवा करो, तथा 'सर्वभूत हिते रताः अर्थात सभी प्राणियों के हित में निरंतर संलग्न रहो। यही भावना पृथ्वी संरक्षण का वास्तविक आधार बन सकती है। आज आवश्यकता केवल विमर्श की नहीं, बल्कि ठोस कार्य की है। वर्षा जल संरक्षण के लिए 'कैच द रेन'
जैसे अभियानों को जनआंदोलन बनाना होगा। व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण और वृक्ष संरक्षण करना होगा। पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा पर निर्भरता कम कर सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। जल, बिजली और ईंधन का संयमित उपयोग करना होगा। प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण तथा पुनर्चक्रण की संस्कृति विकसित करनी होगी। दीर्घकालिक दृष्टि से जल प्रबंधन की योजनाओं को वैज्ञानिक आधार पर लागू करना होगा, ताकि सूखा और बाढ़ दोनों स्थितियों से संतुलित रूप से निपटा जा सके। खनन के पुराने और विनाशकारी तरीकों को बदलकर सुरक्षित एवं पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाना होगा। शहरी विकास में हरित क्षेत्र, स्वच्छ परिवहन, जल पुनर्चक्रण और प्रदूषण नियंत्रण को
प्राथमिकता देनी होगी। हमारी शिक्षा प्रणाली में पर्यावरणीय संस्कारों को स्थान देना भी समय की मांग है। भारतीय चिंतन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्द है-अपरिग्रह, अर्थात आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। आज है। इच्छाएँ अनंत हैं, किंतु आवश्यकताएँ सीमित। यदि मनुष्य केवल उतना ही उपयोग करे जितनी आवश्यकता है, तो संसाधनों पर दबाव स्वतः कम हो उपभोक्तावाद ने मनुष्य को संग्रह की दौड़ में खड़ा कर दिया जाएगा और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। यदि हम अपने बच्चों को समृद्ध भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें केवल धन संपत्ति नहीं, बल्कि स्वच्छ जल, शुद्ध वायु, हरित वन और संतुलित पर्यावरण देना होगा। हमारे पूर्वजों ने प्राकृक्तिक धरोहर को सहेजकर हमें सौंपा है, अब उसे सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। संत कालीदास का प्रसंग आज भी उतना प्रसांगित है.'कबिरा बड़े जतन ते ओड़ी, ज्यों की त्यों धर दोन्ही चदरिया।'
अर्थात जो धरोहर हमें मिली है, उसे उसी पवित्रता और संरक्षण के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।
आज विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का दिन है। यदि हम भारतीय संस्कृति के प्रकृक्ति-समन्वित दृष्टिकोण को आधुनिक विज्ञान, नीति और जनभागीदारी से जोड़ दें, तो पृथ्वी का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। आइए संकल्प लें कि हम उतना ही उपभोग करेंगे जितनी आवश्यकता है, प्रकृति का सम्मान करेंगे, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, संतुलित और समृद्ध पृथ्वी छोड़कर जाएँगे। जय हिंद जय भारत! जय धरती माँ।