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Women Reservation Bill Debate in India

सामाजिक न्याय एवं महिला आरक्षण का प्रश्न

महिला आरक्षण बिल ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ पर सियासी बहस तेज है। सामाजिक न्याय, ओबीसी आरक्षण और राजनीतिक हितों को लेकर उठे सवालों ने इसे फिर विवाद के केंद्र में ला दिया है।


सामाजिक न्याय एवं महिला आरक्षण का प्रश्न

मंजर सरस् त्रिपाठी

महिला आरक्षण का प्रश्न भारत की लोकतांत्रिक न राजनीति में लम्बे समय से चर्चा का विषय रहा है। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से जिस विधेयक को आमतौर पर 'महिला आरक्षण बिल' कहा जाता है, उसका औपचारिक नाम 'नारी शक्ति वन्दन अधिनियम 2023 रखा गया था।महिला आरक्षण विधेयक कई बार संसद में पेश हुआ, बहसों का केंद्र बना, लेकिन लम्बे समय तक पारित नहीं हो सका। अभी पिछले सप्ताह सरकार इसे दो तिहाई बहुमत से पारित नहीं करा सकी और बिल पुनः गिर गया। इस बार इस बिल को एक अलंकारित नाम देकर प्रस्तुत किया गया था- 'नारी शक्ति वन्दन अधिनियम 2023"।

प्रमुख प्रावधान

इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना था। इसके प्रमुख प्रावधान निम्न थेः

1. 33 प्रतिशत आरक्षणः विधेयक के अनुसार लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों में से एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी थीं।

2. एससी/एसटी आरक्षण में भी प्रावधानः अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जो सीटें पहले से आरक्षित है, उनमें भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव था।

3. रोटेशन प्रणालीः आरक्षित सीटों को हर चुनाव में घुमाया जाना था, ताकि एक ही क्षेत्र में लगातार आरक्षण न बना रहे।

4. समयसीमाः प्रारंभिक प्रस्ताव के अनुसार यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू किया जाना था, जिसे बाद में बढ़ाया भी जा सकता था।

स्पष्ट रूप से देखा जाए तो इस विधेयक में आरक्षण की ठोस व्यवस्था थी, और वह भी केवल सामान्य महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि एससी/एसटी महिलाओं के लिए भी। हालांकि, इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं था-यही एक बड़ा विवाद का कारण बना।

विपक्ष की आपत्तियाँः

विपक्ष की आपत्तियों के अनेक कारण थे। इसमें कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष कारण थे। विधेयक के विरोध में कई राजनीतिक दल सामने आए, जिनमें प्रमुख रूप से समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थे। ये दोनों दल प्रारंभ से ही महिला आरक्षण के विरुद्ध रहे हैं। वाजपेई सरकार के समय लालू प्रसाद यादव ने इस आरक्षण की प्रति प्रधानमंत्री के हाथ से छीनकर फाड़ दी थी। इस बार दक्षिण के राज्यों के राजनैतिक दलों ने भी विरोध किया। महिला आरक्षण के विरोध में उनके मुख्य तर्क इस प्रकार है:

प्रत्यक्ष कारण

1. विपक्ष, प्रमुखतः समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल, का सबसे बड़ा विरोध यह था कि अगर महिलाओं को 33% आरक्षण दिया जा रहा है, तो उसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए। उनके अनुसार, बिना ओबीसी आरक्षण के यह बिल 'सवर्ण महिलाओं को अधिक लाभ पहुंचाएगा। मतलब ये क्षैतिज और लम्बवत दोनों तरह का आरक्षण चाहते हैं।

2. कुछ दलों का मानना था कि यह विधेयक सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है, क्योंकि यह केवल लैंगिक समानता पर ध्यान देता है, सामाजिक विविधता को नजरअंदाज करता है।

3. कई नेताओं ने कहा कि सीटों के लगातार रोटेशन से सांसदों और विधायकों का अपने क्षेत्र से जुड़ाव कमजोर होगा, और विकास कार्यों में बाधा आएगी।

परोक्ष कारण

1. विरोध के पीछे केवल वैचारिक कारण ही नहीं थे, बल्कि कुछ राजनीतिक और व्यावहारिक चिंताएँ भी है। जैसे विपक्ष यह समझता है कि यह आरक्षण लागू होने से पुरुष प्रत्याशियों के राजनीतिक अवसरों में कमी हो जाएगी। पुरुष नेताओं को यह डर था कि आरक्षण लागू होने से उनकी सीटें कम हो जाएंगी, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य पर असर पड़ेगा।

2. कई दलों में महिला नेतृत्व उतना मजबूत नहीं था, इसलिए यह आशंका थी कि आरक्षण लागू होने पर परिवारवाद बढ़ेगा यानी नेताओं की पत्नियां या रिश्तेदार ही टिकट पाएंगे।

3. कुछ दलों को लगा कि इस मुद्दे पर समर्थन देने से उन्हें तत्काल चुनावी लाभ नहीं मिलेगा, इसलिए उन्होंने इसे टालना ही बेहतर समझा।

अब एक बहुत बड़ा प्रश्न उठाया गया है कि क्या भाजपा स्वयं इस विषय पर गम्भीर है?

यह प्रश्न भी अक्सर उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी स्वयं ऐसा आरक्षण चाहती या यह वोटबैंक की राजनीति है? इसका उत्तर सरल नहीं है।

भाजपा ने कई मौकों पर इस विधेयक का समर्थन किया और इसे पारित कराने की कोशिश भी की। 2010 में यह

विधेयक राज्यसभा से पारित हो गया था, जिसमें भाजपा ने समर्थन दिया। लेकिन लोकसभा में इसे पास नहीं कराया जा सका।

आलोचकों का तर्क है कि अगर भाजपा वास्तव में गंभीर होती, तो वह अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर इसे लोकसभा में भी पारित करवा सकती थी। वहीं समर्थकों का कहना है कि गठबंधन राजनीति और विपक्ष के तीव्र विरोध के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया।

इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य है कि बाद के वर्षों में भाजपा ने इसे सजावटी नाम 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' नाम दिया जिसे विपक्ष एक आकर्षक जुमला मानता है। बिल में जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तें जोड़ी गई, जिससे दक्षिण के राज्यों में समर्थन नहीं मिल सका। इन शों के कारण, यदि बिल पारित हो जाता तो भी, इसके क्रियान्वयन में देरी की आशंका बनी रहती।

महिला आरक्षण बिल भी अन्य आरक्षणों की तरह एक विवादास्पद बिल है। आरक्षण का प्रावधान करना तो आसान है परन्तु इसे हटाना बहुत कठिन है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में हम यह देख रहे हैं। प्रारम्भिक आरक्षण मात्र 10 वर्षों के लिए था परंतु समाप्त होने की बजाय 75 वर्ष बाद यह मात्रा और विविधता दोनों में अति विस्तारित हुआ है। तमाम विसंगतियों के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ है।

विपक्ष की आपत्तियाँ भी जातीय और वर्गीय विरोध के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आरक्षण पर समग्र चिन्तन का भारतीय राजनीति में पूरी तरह अभाव है। यह जाति, वर्ग और लिंग विशेष का वोट पाने का एक उपकरण बन कर रह गया है। न विपक्ष न ही सत्तारूढ़ दलों की भूमिका पूरी तरह निर्विवाद है। अंततः, यह मुद्दा केवल कानून बनाने का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधिक बनाने का है। महिला आरक्षण पर बहस यह दिखाती है कि सामाजिक न्याय के विभिन्न आयाम लिंग, जाति और राजनीति-एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए है, और किसी एक पहलू को संबोधित करना अक्सर जटिल राजनीतिक चुनौतियों को जन्म देता है।

 

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