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7 Inspiring Women Icons of Madhya Pradesh

नारी शक्ति के सप्तदीप : सेवा, संस्कृति और सृजन से आलोकित प्रदेश की विभूतियां

मध्यप्रदेश की 7 प्रेरणादायी महिलाओं की कहानी, जिन्होंने सेवा, संस्कृति और कला के जरिए समाज में नई पहचान और बदलाव की मिसाल पेश की।


नारी शक्ति के सप्तदीप  सेवा संस्कृति और सृजन से आलोकित प्रदेश की विभूतियां

भारतीय संस्कृति में नारी को केवल जीवनदायिनी नहीं, बल्कि सृजन, संवेदना और शक्ति की आधारशिला माना गया है। जब यह शक्ति समाजोपयोगी संकल्प के साथ जुड़ती है, तब वह केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज को नई दिशा देने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेती है।

मध्यप्रदेश की सात ऐसी ही प्रेरणादायी महिलाओं ने अपने कर्म, संघर्ष और समर्पण से यह सिद्ध किया है कि नारी शक्ति जब संस्कृति, सेवा और सृजन से जुड़ती है, तो वह समय की धारा को भी नया मोड़ दे सकती है। इनमें किसी ने तीन सौ वर्ष पुरानी हथकरघा परंपरा को पुनर्जीवित किया, किसी ने आदिवासी जीवन की स्मृतियों को रंगों में संजोकर कला को वैश्विक पहचान दिलाई। कोई लोककथाओं और देवगाथाओं को चित्रों में रूपायित करती है, तो कोई चिकित्सा सेवा के माध्यम से दूरस्थ अंचलों की पीड़ित महिलाओं के जीवन में स्वास्थ्य और आशा का प्रकाश भरती है।

लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं की संरक्षिका एक सशक्त राजनीतिक व्यक्तित्व भी इस श्रृंखला में शामिल है, तो जंगल और जनजातीय जीवन की सहज अभिव्यक्ति को रंगों में ढालने वाली कलाकार भी। इसी क्रम में एक साधारण हस्तशिल्पकार अपनी गुड़ियों के माध्यम से लोकसंस्कृति को देश-दुनिया तक पहुँचा रही है।इन सभी महिलाओं की जीवन यात्राएँ अलग-अलग पृष्ठभूमियों से प्रारंभ होकर एक ही संदेश देती हैं.  समर्पण, श्रम और संवेदनशीलता से ही संस्कृति और समाज का वास्तविक उत्थान संभव है। पद्म सम्मान से अलंकृत ये विभूतियाँ नारी शक्ति के उस उज्ज्वल स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो परंपरा को संरक्षित करते हुए भविष्य की राह भी प्रकाशित करती हैं।

परंपरा के ताने-बाने की संरक्षिका

शैली होल्कर मालवा की ऐतिहासिक नगरी महेश्वर में नर्मदा के शांत प्रवाह के साथ एक और ध्वनि सदियों से सुनाई देती रही है करघों की मधुर लय। किंतु समय के साथ यह ध्वनि धीमी पड़ने लगी थी। ऐसे समय में एक महिला ने इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। यह नाम है शैली होल्कर का।अमेरिका में जन्मी शैली होल्कर ने विवाह के बाद महेश्वर को अपना जीवनस्थल बनाया। उन्होंने जब यहाँ की माहेश्वरी साड़ियों की समृद्ध परंपरा और उसके संकट को देखा, तो इसे पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया।तीन सौ वर्ष पुरानी यह कला कभी मालवा की शान हुआ करती थी, किंतु आधुनिक औद्योगिक उत्पादन के कारण धीरे-धीरे बुनकरों की आजीविका संकट में पड़ गई थी। शैली होल्कर ने बुनकरों के साथ मिलकर इस शिल्प को नया आयाम दिया। उन्होंने पारंपरिक तकनीकों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक रंग संयोजन और डिज़ाइन का समावेश किया।इससे माहेश्वरी साड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। उन्होंने महेश्वर में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित कर नई पीढ़ी को हथकरघा बुनाई की बारीकियाँ सिखाईं। उनके प्रयासों से सैकड़ों बुनकर परिवारों को रोजगार मिला और अनेक महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं। उनका कार्य यह सिद्ध करता है कि जब परंपरा को दूरदर्शिता और संवेदनशीलता का साथ मिलता है, तो वह समय की धूल से निकलकर फिर से चमक उठती है।

लोकतांत्रिक मर्यादाओं की संरक्षिका

भारतीय राजनीति में सादगी, मर्यादा और अनुशासन का जो उदाहरण सुमित्रा महाजन ने प्रस्तुत किया है, वह अत्यंत प्रेरणादायी है। मध्यप्रदेश के इंदौर से लगातार आठ बार लोकसभा के लिए निर्वाचित होना उनके प्रति जनता के विश्वास का प्रमाण है।एक साधारण शिक्षिका के रूप में अपने जीवन की शुरुआत करने वाली सुमित्रा महाजन ने राजनीति में अपने समर्पण और अनुशासन से विशिष्ट स्थान बनाया। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला। बाद में देश की लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल उल्लेखनीय रहा.उन्होंने सदन का संचालन अत्यंत संतुलित और मातृत्वपूर्ण दृष्टि से किया। अनुशासन और संवाद की परंपरा को मजबूत करना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व यह दर्शाता है कि राजनीति में भी संवेदनशीलता, सादगी और मर्यादा के साथ नेतृत्व किया जा सकता है।

जंगल की रंगरेखा

उमरिया जिले के लौरहा गाँव की जोधईया बाई बैगा की कला जंगल की सहज सुंदरता की अभिव्यक्ति है। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, किंतु इसी संघर्ष ने उनकी कला को जन्म दिया.पति के निधन के बाद जीवन में आए शून्य ने उन्हें भीतर से बदल दिया। उन्होंने कागज और कैनवास पर जंगल, पेड़-पौधे और बैगा जीवन के दृश्य उकेरने शुरू किए। उनकी कला में प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम दिखाई देता है.महुआ का वृक्ष, पशु-पक्षी और जनजातीय आस्थाएँ उनकी कला के प्रमुख विषय हैं। धीरे-धीरे उनकी कला ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान बनाई और अनेक देशों में उनकी प्रदर्शनी आयोजित हुई। उनकी कला यह सिद्ध करती है कि प्रतिभा किसी औपचारिक शिक्षा की मोहताज नहीं होती।

रंगों में जीवित भील संस्कृति

झाबुआ जिले की धरती से उठी भूरी बाई की कला रंगों में रची-बसी एक जीवंत लोककथा है। भील जनजाति की पारंपरिक संस्कृति में पली-बढ़ी भूरी बाई ने बचपन से ही दीवारों पर बनने वाले पिथोरा चित्रों के बीच अपना कलात्मक संसार खोज लिया था।उनका जीवन तब बदला जब उन्हें भोपाल के भारत भवन में काम करने का अवसर मिला। यहाँ उन्हें आधुनिक कला जगत से परिचय प्राप्त हुआ और उन्होंने कागज तथा कैनवास पर चित्र बनाना प्रारंभ किया।

भूरी बाई की चित्रकला की सबसे बड़ी विशेषता है चटख रंगों का साहसिक प्रयोग और बिंदुओं की लयात्मक संरचना। उनके चित्रों में जंगल, पशु-पक्षी, लोकदेवता, त्योहार, हाट-बाजार और ग्रामीण जीवन की विविध गतिविधियाँ सजीव रूप में दिखाई देती हैं।समय के साथ उन्होंने आधुनिक जीवन के प्रतीकोंबस, विमान और टेलीविजन को भी अपने चित्रों में स्थान दिया। इससे उनकी कला परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सुंदर सेतु बन गई। आज उनकी चित्रकृतियाँ देश-विदेश की कला दीर्घाओं में प्रदर्शित हो चुकी हैं।भूरी बाई की कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भील संस्कृति की स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज है।

सेवा की अजस्र धारा

रतलाम की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. लीला जोशी का जीवन सेवा और करुणा की एक निरंतर बहती धारा है। रेलवे के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम का मार्ग नहीं चुना।उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य को अपनी सेवा का केंद्र बनाया। विशेष रूप से एनीमिया जैसी गंभीर समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए वे वर्षों से कार्य कर रही हैं।गाँव-गाँव जाकर स्वास्थ्य शिविर आयोजित करना, महिलाओं को पोषण और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना और नि:शुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करना उनके कार्य का प्रमुख हिस्सा रहा है। उनकी सेवा भावना को प्रेरणा उन्हें मदर टेरेसा से मिली, जिनसे प्रभावित होकर उन्होंने समाज सेवा को जीवन का व्रत बना लिया।मालवा क्षेत्र में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक “मालवा की मदर टेरेसा” कहते हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि चिकित्सा का वास्तविक अर्थ केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि मानव जीवन को स्वस्थ और सम्मानजनक बनाना है।

लोककथाओं की रंगरेखा

मंडला जिले की दुर्गाबाई व्याम की चित्रकला गोंड जनजातीय परंपरा की एक अनूठी अभिव्यक्ति है। उनका बचपन लोककथाओं, देवगाथाओं और प्रकृति की कहानियों के बीच बीता।दादी से सुनी कथाएँ और घर की दीवारों पर बने पारंपरिक अलंकरण उनके कलात्मक संस्कार का आधार बने। प्रारंभिक दिनों में उन्होंने मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से घर की दीवारों पर चित्र बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यही अभ्यास उनकी विशिष्ट कला शैली में विकसित हो गया।

दुर्गाबाई की कला की सबसे बड़ी विशेषता है कथा कहने की क्षमता। उनके प्रत्येक चित्र में एक कहानी छिपी होती है। जंगल, पशु-पक्षी, लोकदेवता और प्रकृति से जुड़े प्रतीक उनके चित्रों में बार-बार दिखाई देते हैं।उनकी कला में रंगों और रेखाओं का ऐसा संयोजन दिखाई देता है, जो दर्शक को सीधे लोकजीवन की दुनिया में ले जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी चित्रकृतियों को सराहना मिली है। उनकी कला यह सिद्ध करती है कि लोककथाएँ केवल शब्दों में ही नहीं, बल्कि रंगों और रेखाओं में भी जीवित रह सकती हैं।

गुड़ियों में जीवित लोकसंस्कृति

झाबुआ की हस्तशिल्प कलाकार शांति परमार ने जनजातीय संस्कृति को गुड़ियों के माध्यम से दुनिया तक पहुँचाया है। पिछले तीन दशकों से वे पारंपरिक आदिवासी गुड़ियों का निर्माण कर रही हैं।उनकी बनाई गुड़ियाँ केवल खिलौने नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवंत प्रतिमाएँ हैं। इनमें आदिवासी समाज की वेशभूषा, आभूषण और जीवन शैली का सजीव चित्रण दिखाई देता है।देश भर के हस्तशिल्प मेलों में भाग लेकर उन्होंने इस कला को व्यापक पहचान दिलाई। उनके कार्य ने झाबुआ की जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया।शांति परमार की यह उपलब्धि यह दर्शाती है कि लोककला का एक छोटा-सा रूप भी पूरी संस्कृति की पहचान बन सकता है।

 

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