नारीत्व और नारीवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर यह विचार लेख। महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक समानता के संदर्भ में समकालीन बहस का विश्लेषण।
डॉ. समीक्षा नायक
वर्तमान समय में महिला सशक्तिकरण पर होने वाली बहस अक्सर एक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत की जाती है नारीत्व बनाम नारीवाद, परंपरा बनाम प्रगति, संस्कृति बनाम अधिकार। सार्वजनिक विमर्श, विशेषकर सोशल मीडिया के युग में, इन द्वंद्वों को और अधिक तीव्र कर देता है। ‘वोक फेमिनिज्म’ जैसे शब्द इस चर्चा को विचारशील संवाद से अधिक वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाते प्रतीत होते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में यह संघर्ष है, या यह असंतुलन की अभिव्यक्ति है? संभवतः वास्तविक चुनौती विरोध में नहीं, बल्कि संतुलन के अभाव में निहित है।नारीत्व को प्रायः बाह्य रूप, कोमलता या निष्क्रियता के संदर्भ में सीमित कर दिया जाता है, जबकि उसका वास्तविक अर्थ कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। नारीत्व एक आंतरिक चेतना है भावनात्मक बुद्धिमत्ता, करुणा, सहज प्रज्ञा, मातृत्व शक्ति और साहस का समन्वित स्वरूप। भारतीय दार्शनिक परंपरा में इसे कभी दुर्बलता का पर्याय नहीं माना गया, बल्कि ‘शक्ति’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है एक ऐसी गतिशील ऊर्जा जो सृजन, संरक्षण और संतुलन का आधार है।
दुर्गा में शक्ति और संरक्षण, सरस्वती में ज्ञान और प्रज्ञा तथा लक्ष्मी में समृद्धि और संतुलन ये प्रतीक केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि नारीत्व के बहुआयामी स्वरूप की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हैं। समस्या नारीत्व में नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब उसे मौन, समर्पण और सीमित भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है।इसी ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में नारीवाद का उद्भव हुआ। अपने मूल स्वरूप में नारीवाद संस्कृति-विरोधी आंदोलन नहीं था; वह संवैधानिक समानता, गरिमा और अवसर की मांग का स्वर था। विश्व स्तर पर महिलाओं ने मताधिकार, समान वेतन, हिंसा से सुरक्षा और शारीरिक स्वायत्तता की कानूनी मान्यता के लिए संघर्ष किया। इस दृष्टि से नारीवाद न्याय की आकांक्षा था ऐसी व्यवस्था का आग्रह जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित हो। यह संवैधानिक मूल्यों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास था, न कि सामाजिक ताने-बाने को विखंडित करने का उद्देश्य।
समय के साथ नारीवाद के स्वरूप में परिवर्तन आया। समकालीन विमर्श में ‘वोक नारीवाद’ शब्द का प्रयोग उस सक्रियता के लिए किया जाता है जो पहचान-आधारित राजनीति, अंतर्विभाजकता (इंटरसेक्शनैलिटी) और संरचनात्मक असमानताओं को केंद्र में रखती है। यह दृष्टि हाशिये पर खड़े समूहों की आवाज को प्रमुखता देती है और स्थापित सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देती है। जागरूकता और संवेदनशीलता की यह प्रवृत्ति अपने आप में महत्वपूर्ण है।तथापि, कुछ परिस्थितियों में यह भी देखा गया है कि जब सक्रियता संवाद की जगह बहिष्कार को स्थान देने लगती है और असहमति को उत्पीड़न की संज्ञा दी जाने लगती है, तब वैचारिक कठोरता जन्म लेती है। परिणामस्वरूप विमर्श की संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं और समाज में ध्रुवीकरण गहरा सकता है।
आज सशक्तिकरण को प्रायः बाहरी उपलब्धियों से मापा जाता है वेतन, कॉर्पोरेट पद, राजनीतिक प्रतिनिधित्व या सोशल मीडिया पर दृश्यता। निःसंदेह ये उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं और ऐतिहासिक असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में इनका महत्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता। परंतु यदि सशक्तिकरण को केवल बाह्य उपलब्धियों तक सीमित कर दिया जाए, तो आंतरिक विकास उपेक्षित रह सकता है।जब उपलब्धि आत्म-सामंजस्य का स्थान ले लेती है, जब दृश्यता आत्म-जागरूकता से बड़ी हो जाती है, और जब प्रतिस्पर्धा समुदाय-बोध को पीछे छोड़ देती है, तब एक प्रकार का आंतरिक शून्य उत्पन्न हो सकता है। भावनात्मक आधार के बिना आर्थिक स्वतंत्रता अधूरी है और आत्म-परिचय के बिना सार्वजनिक शक्ति की सार्थकता सीमित रह जाती है।
वास्तविक सशक्तिकरण बाह्य और आंतरिक आयामों के संतुलन में निहित है। भावनात्मक दृढ़ता, आध्यात्मिक स्पष्टता, सामुदायिक जुड़ाव और नैतिक उत्तरदायित्व ये सभी तत्व उस शक्ति को गहराई प्रदान करते हैं, जो केवल पद या प्रतिष्ठा से प्राप्त नहीं होती।लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकार मौलिक हैं, किंतु अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। जब स्वतंत्रता के साथ दायित्व, अभिव्यक्ति के साथ संवेदनशीलता और स्वायत्तता के साथ सामाजिक कर्तव्य का बोध जुड़ता है, तभी स्थायी प्रगति संभव होती है। सुधार का मार्ग संवाद और विवेक से होकर गुजरता है, न कि अंध अस्वीकृति से।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक समानता परस्पर विरोधी अवधारणाएं नहीं हैं। सांस्कृतिक पहचान व्यक्ति को जड़ें देती है और आत्मिक पोषण प्रदान करती है, जबकि संवैधानिक समानता उसकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा करती है। लक्ष्य किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।