पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवालों पर विश्लेषण। हिंसा, चुनावी माहौल और राजनीतिक बयानबाजी के बीच राज्य की स्थिति पर चर्चा।
गोपाल सामंतो
दे श आज एक नया अध्याय को देख रहा है, दुर्भाग्यवश यह अध्याय भी उसी पुण्य भूमि से शुरू हो रही है जहां से स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ था। इस वाक्य मात्र से यह स्थापित हो जाता है कि हम पश्चिम बंगाल के बारे में बात कर रहे है। यहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज मंच पर खड़ी होकर यह चीख चीखकर कह रही है कि 'केवल 15 मिनट के लिए अगर प्रशासन बंगालियों के सर से हाथ उठा ले तो पूरा समाज समाप्त हो जाएगा।'
इतिहास ने बंगाल को 'श्रयरेक्ट एक्शन डे' दिखाया था, क्या ममता बनर्जी का आशय ऐसे ही कत्ले आम से है? इसीलिए वो अपने भाषण के द्वारा बंगाल को डायरेक्ट एक्शन डे का फ्लैशबैक दिखा रही है। जब यह वाक्य उन्होंने अपने श्रीमुख से कहा, तो क्या वो चुनाव से पहले बंगालियों को डराना चाहती थी? यह प्रश्न केवल प्रश्न नहीं है अपितु देश के संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात है। ऐसे तो अगर स्पष्ट रूप से समझा जाए तो देश के संविधान के आधीन कार्य करने वाली चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का इस कुत्सित तरीके से विरोध ही अपने आप में संघवाद का विरोध माना जाना चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से वी कोर्ट भी जा चुकी हैं। वहां अपनी बात को स्वयं रखा भी था। इसके बाद शायद सर्वोच्च न्यायालय से भी वो नाखुश है क्योंकि फैसला उनके मन माफिक नहीं हुआ, इसलिए वो धरना दे रही थीं। अलग-अलग प्रदेशों में भी एसआईआर की प्रक्रिया हुई और किसी को पता भी नहीं चला कि कैसे और कब यह चुनावी प्रक्रिया संपत हो गई। इसी भ्रामक वातावरण के चलते अगर वर्तमान की खबरों और घटनाक्रमों को देखें तो लगता है जैसे केवल बंगाल में ही एसआईआर हो रहा है और यह कोई विदेशी प्रक्रिया है जिसको अंग्रेजों ने बंगाल की जनता पर थोप दिया है। ममता बनर्जी के मुताबिक हर बंगाली को इसका विरोध करना पड़ेगा।
इस साधारण सी प्रक्रिया को नेस्तानाबूद करने में टीएमसी का हर कार्यकर्ता दिन-रात लगा हुआ है। शायद इस प्रक्रिया को ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेता कार्यकर्ता अपने अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रहे है, हो भी क्यों ना? जिस प्रकार से बंगाल की सड़कों पर प्रजातंत्र की गुंडातंत्र के आगे नतमस्तक कर दिया गया है। पिछले 50 सालों से, ऐसा अंगाली समाज का वो निर्णायक वर्ग केवल अभिभावक के रूप में अपने बच्चे को होना बहुत ही आम बात है। विचारणीय यह है कि वो बंगाली समाज कहा गुम हो गया है, जिसने अंग्रेजों का खिलाफत उनके तोपों की नाल पर चढ़कर किया था? बंगाल की भूमि में ही पहले सशस्त्र बल 'आजाद हिन्द फौज' का निर्माण हुआ था। आज वो बंगाली शायद अपने दैनंदिनी आवश्यकताओं की पूजा अर्चना करने में इतना व्यस्त हो गया है की उन्हें समाज से कोई विशेष लेना देना नहीं है।आईआईटीयन और डॉक्टर चनाने में लगा हुआ है, बाद के समय में उन्हीं बच्चों द्वारा प्रताड़ित परित्यक्ता जिंदगी गुजारने को मजबूर है। यह बंगाल के हर गली की कहानी है, घरों में अकेले बूढ़े मां-बाप बचे हुए है और बच्चे विदेशों में सेटल साल में एक बार विजिट पर आने वाले बन गए है। यही मौका टीएमसी के हाथ लग गया है। मनमानी करने का और भ्रामक अराजकता उत्पन कर सत्ता पर काचिज रहने का और समाज के बीच अपने झूठे नैरेटिव को सेट करने का।
टीएमसी के इसी मंच से उनकी एक सांसद श्रीमती महुआ मोइत्रा अपने उच्चतम आवाज में यह कहती हैं कि आज जो टीएमसी के साथ नहीं है वो बंगाली ही नहीं है।' क्या बंगाली होने का सर्टिफिकेट टीएमसी की एक ऐसी महिला से बंगाली समाज को लेना पड़ेगा जो खुले आम कहती है कि 'मां काली मंदिरापान और धूम्रपान करती है।' ऐसी कूटरचना और राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिए गए बयान केवल टीएमसी की नहीं अपितु समस्त बंगाली समाज और असंख्य वैभव-गाथा वाले बंगाल को कलंकित करने का काम कर रही है। 90 के दशक में जिस प्रकार चुनावी हिंसा और बैलेट बॉक्स लूट के कारण बिहार कलकित था ममता बनजों को कार्यकाल में बंगाल उससे कहीं आगे निकल गया है। बंगाल आज रोज नए रिकॉर्ड बना रहा है। राजनीतिक हिंसा और द्वेष का होना कोई बड़ी बात नहीं जिस प्रकार पूर्वी बंगाल ने 'हिंदू जेनोसाइड' को बार-बार झेला है। अगर हालात ऐसे रहे तो आशंका है कि उसी प्रकार पश्चिम बंगाल में भी आने वाले वर्षों में बंगालियों के ऐसे कत्ले आम को अंजाम दिया जा सकता है। बंगाल और बंगालियों के बीच होम्योपैथी दवाई बहुप्रचलित है। क्योंकि उसमें ना सर्जरी दिखती है और न ही कड़वी दवाई, ठीक उसी प्रकार बंगालियों के मन में धीमा मीठा जहर घोल कर उनके देश के संघीय ढांचे से अलग करने का कुत्सित प्रयास सत्ताधारी टीएमसी पार्टी हर दिन कर रही है।