पश्चिम बंगाल में प राजनीतिक लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को और दूसरे एवं अंतिम चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। 4 मई को मतगणना के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य में अगली सरकार किसकी बनेगी। इस बार चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल बेहद गरम है और मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच है।
भाजपा इस बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने को लेकर काफी आशान्वित नजर आ रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह लगातार यह दावा कर रहे हैं कि राज्य में इस बार परिवर्तन तय है। उन्होंने 170 सीटों का लक्ष्य सामने रखते हुए संगठन और चुनावी रणनीति को उसी दिशा में केंद्रित किया है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर और लगभग 38 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस बार पार्टी उसी आधार को और विस्तार देने की कोशिश में है।
दूसरी ओर, टीएमसी सरकार अपने 15 वर्षों के शासन के आधार पर जनता के बीच जा रही है। तृणमूल कांग्रेस 'बंगाल की अस्मिता' और क्षेत्रीय पहचान को प्रमुख मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा बाहरी नेताओं के सहारे राज्य की राजनीति को प्रभावित करना चाहती है, जबकि भाजपा ने इस नैरेटिव का जवाब देते हुए यह स्पष्ट किया है कि राज्य का नेतृत्व स्थानीय चेहरों के हाथ में ही होगा।
इस चुनाव में कई बड़े मुद्दे केंद्र में हैं। भाजपा ने राज्य में अवैध घुसपैठ को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। पार्टी का कहना है कि सीमा पार से होने वाली घुसपैठ न
केवल सुरक्षा के लिए चुनौती है, बल्कि इससे संसाधनों पर भी दबाव बढ़ता है। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं का समर्थन करते हुए भाजपा ने बादा किया है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान कर संवैधानिक तरीके से कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, सीमा पर बाड़ लगाने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की बात भी कही गई है।
भाजपा ने समान नागरिक संहिता को भी एक प्रमुख वादा बनाया है। पार्टी का तर्क है कि इससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में समानता आएगी और एक समान कानूनी ढांचा तैयार होगा। वहीं, तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल इसे सामाजिक विविधता के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध करते रहे हैं।
महिला सुरक्षा का मुद्दा भी इस चुनाव में प्रमुखता से उभरकर सामने आया है। विभिन्न घटनाओं को लेकर विपक्ष राज्य सरकार पर सवाल उठा रहा है और कानून व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जता रहा है। अमित शाह ने वादा किया है कि सत्ता में आने पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे, साथ ही सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण और विशेष सुरक्षा इकाइयों के गठन की बात कही गई है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि राज्य में कानून अपना काम कर रहा है और अपराधों पर कार्रवाई की जा रही है।
भ्रष्टाचार के आरोप भी चुनावी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं। शिक्षक भर्ती सहित कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और अदालत के निर्देशों ने इस मुद्दे को और प्रमुख बना दिया है। भाजपा इन मामलों को सरकार की विफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताती है।
सामाजिक समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पिछड़े वर्गों, दलितों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के वोट को निर्णायक माना जा रहा है। विभिन्न सर्वेक्षण अलग-अलग संकेत देते हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति का पता मतदान के बाद ही चलेगा। राजनीतिक दल इन वर्गों को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
चुनाव से पहले भाजपा के भीतर कुछ मतभेदों की खबरें भी सामने आई थी। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने हस्तक्षेप करते हुए संगठन को एकजुट करने की कोशिश की है। अमित शाह ने राज्य के नेताओं, जिनमें दिलीप घोष और एस. अधिकारी शामिल हैं, के साथ संवाद स्थापित कर चुनाव में एकजुट होकर लड़ने का संदेश दिया है।
तृणमूल कांग्रेस की ओर से 'बाहरी बनाम स्थानीय' का मुद्दा लगातार उठाया जा रहा है, जबकि भाजपा स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। यह वैचारिक टकराव चुनावी माहौल को और अधिक रोचक बना रहा है।
कुलमिलाकर, पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह नीतियों, पहचान, विकास और सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर जनता के फैसले का प्रतीक भी है। एक ओर भाजपा परिवर्तन के वादे के साथ चुनाव मैदान में है, तो दूसरी और तृणमूल कांग्रेस अपने शासन के कामकाज और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर जनता का समर्थन मांग रही है। अब सबकी निगाहें 4 मई पर टिकी हैं, जब मतगणना के बाद यह तय होगा कि पश्चिम बंगाल की जनता किसे शासन की जिम्मेदारी सौंपती है।
(लेखक विवेक शुक्ला यूएई एंबेसी में पूर्व सूचना अधिकारी रहे हैं)