पुण्यस्मरण दिवस पर वीर सावरकर के विचार, संघर्ष और राष्ट्र चेतना का पुनर्पाठ। क्रांतिकारी जीवन से सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तक, एक समग्र दृष्टि
कैलाश विजयवर्गीय
इतिहास प्रायः विजेताओं के गुणगान के लिए लिखा जाता है। उसमें वही व्यक्ति प्रमुखता से उभरते हैं, जिन्हें सत्ता ने स्वीकार किया हो और व्यवस्था ने सराहा हो। परंतु कुछ नाम ऐसे भी होते हैं, जो सत्ता की स्वीकृति से नहीं, अपने विचारों की प्रखरता से इतिहास में स्थान बनाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर ऐसे ही एक व्यक्तित्व हैंजिन्हें लेकर मतभेद भले ही तीखे हों, पर उनके प्रभाव की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
सत्ता के दौर में, जब भारतीय समाज राजनीतिक ही नहीं, मानसिक पराधीनता से भी जकड़ा हुआ था, सावरकर ने स्वतंत्रता को केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं माना। उनके लिए यह राष्ट्रीय आत्मा के पुनर्जागरण का विषय था ऐसा पुनर्जागरण, जो इतिहास, समाज और सांस्कृतिक चेतनातीनों को एक साथ स्पर्श करे। वे मानते थे कि यदि राष्ट्र की आत्मा जागृत नहीं होगी, तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी अधूरी रहेगी।सावरकर का क्रांतिकारी जीवन बहुत कम आयु में प्रारंभ हो गया था। मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने 1899 में ‘मित्र मेला’ नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, जो 1904 में ‘अभिनव भारत’ के नाम से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन बना.ब्रिटिश सत्ता सावरकर को अत्यंत खतरनाक मानती थी। अंडमान की सेल्युलर जेल में दिया गया उनका कारावास (लगभग 10 वर्ष 11 महीने) भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे कठोर अध्यायों में गिना जाता है। कोल्हू में श्रम, एकांत कारावास और अमानवीय दंड इन सबके बीच भी उनकी वैचारिक धार कुंद नहीं हुई।
उनकी दया याचिकाओं को लेकर विवाद रहे हैं, पर यह जानना भी आवश्यक है कि उन्होंने लगभग 27 वर्षों तक ब्रिटिश जेल (काला पानी और नजरबंदी) में अपना जीवन व्यतीत किया। उन्होंने हर प्रकार की शारीरिक और मानसिक यातनाओं को झेलने के बावजूद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वातंत्र्य चेतना को फीका नहीं पड़ने दिया.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सर्वाधिक समय तक जेल में रहने वाले प्रमुख नेता जवाहरलाल नेहरू थे, लेकिन यह समय केवल नौ वर्ष था, जो वीर सावरकर की तुलना में एक तिहाई था। शायद यही एक प्रमुख कारण था कि कांग्रेस ने कभी भी वीर सावरकर के त्याग और बलिदान को महत्व नहीं दिया। नेहरू जिस ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग कर रहे थे, उसमें राष्ट्रीय संस्कृति, सनातन सभ्यता और हिंदू मूल्यों को वरीयता नहीं थी, जबकि वीर सावरकर इन मूल्यों से समझौता करने के लिए किसी भी शर्त पर तैयार नहीं थे।
सावरकर का ‘अखंड भारत’ केवल भौगोलिक अवधारणा नहीं था। उनके लिए यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता से निर्मित राष्ट्र था एक ऐसा राष्ट्र, जो आत्मनिर्भर हो और अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वासी हो। वे सीमाओं की सुरक्षा को जितना महत्वपूर्ण मानते थे, उतना ही संस्कृति और एकता की भावना को भी.आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ और आधारभूत संरचना, डिजिटल कनेक्टिविटी तथा सामाजिक सुरक्षा पर दिया जा रहा बल उसी व्यापक राष्ट्र-निर्माण दृष्टि का विस्तार प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री गति शक्ति, मेक इन इंडिया, जन-धन आधार मोबाइल (JAM), स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और पीएम आवास जैसी योजनाएं आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास की दिशा में उठाए गए कदम हैं।
सावरकर का चिंतन केवल अतीत के पुनर्पाठ तक सीमित नहीं था। वे यह भी प्रश्न उठाते थे कि स्वतंत्र भारत की पहचान क्या होगी। इसी वैचारिक खोज का परिणाम था ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा। उनके अनुसार ‘हिंदू धर्म’ एक आस्था प्रणाली है, जबकि ‘हिंदुत्व’ सांस्कृतिक राष्ट्रीय पहचान का बोध है। पितृभूमि और पुण्यभूमि की अवधारणा के माध्यम से उन्होंने राष्ट्र को सांस्कृतिक एकात्मता से जोड़ने का प्रयास किया। वे इसे संकीर्ण धार्मिक आग्रह नहीं, बल्कि साझा सभ्यतागत अनुभव के रूप में देखते थे। उनके ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना में धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का स्थान नहीं था। सामाजिक समानता उनके चिंतन का महत्वपूर्ण आयाम था। इसी सामाजिक दृष्टि का प्रमाण ‘पतित पावन मंदिर’ की स्थापना में मिलता है, जहां सभी जातियों के लिए प्रवेश सुनिश्चित किया गया.सर्व-जातीय सहभोज और दलित बस्तियों में सहभागिता जैसे कार्यक्रमों ने उनके सुधारवादी दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दिया। उस समय के सामाजिक संदर्भ में यह एक साहसिक पहल थी।
आधुनिक हथियारों, रणनीति और सुरक्षा तकनीकों के विकास को वे आवश्यक मानते थे। हाल के वर्षों में रक्षा बजट में वृद्धि 2.53 लाख करोड़ रुपए (2013-14) से बढ़कर 7.84 लाख करोड़ रुपए (2026-27) तक पहुंचना और 2024-25 में रक्षा उत्पादन का 1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हैं। आज भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है, जो सामरिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है।सावरकर अंधविश्वास और खोखली मान्यताओं के विरोधी थे। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कशीलता को राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य मानते थे। आज का डिजिटल भारत, तकनीकी नवाचार और वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी, उस वैज्ञानिक सोच की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है, जिसे उन्होंने महत्व दिया था.समकालीन राजनीति में सावरकर की वैचारिक विरासत को प्रमुख स्थान मिला है। पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद का वीर सावरकर खेल परिसर और दादर स्थित स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक ये सभी स्मृति और प्रतीक के स्तर पर उनकी उपस्थिति को दर्शाते हैं।
अंततः, सावरकर का मूल्यांकन केवल समर्थन या विरोध के द्वैत में सीमित नहीं होना चाहिए। वे एक जटिल, बहुआयामी व्यक्तित्व थे क्रांतिकारी, चिंतक, संगठनकर्ता और सामाजिक सुधारक। उनके विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है, पर यह निर्विवाद है कि उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की बहस को नई दिशा दी. आज जब भारत आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक प्रभाव के नए अध्याय लिख रहा है, तब सावरकर के विचारों का पुनर्पाठ केवल ऐतिहासिक अभ्यास नहीं, बल्कि समकालीन विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है।