दिनेश पाठक: जून 1940 में विनायक दामोदर सावरकर, जब जेल से रिहा होने के बाद मुंबई के दादर में अपने निवास पर रुके, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उनसे एक ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नवीन जीवनी शक्ति फूंकी।
गांधीजी से वैचारिक मतभेद के चलते सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद त्याग संपूर्ण देश का प्रवास कर अपने विचार आम जनता तक पहुंचाने का फैसला किया। इसी दौरान 22 जून 1940 को उनकी भेंट विनायक दामोदर सावरकर से हुई। सुभाष बाबू ने उन्हें बताया कि वह कोलकाता के एक प्रमुख चौराहे पर स्थित अंग्रेज ऑलवेल की मूर्ति हटाने के लिए एक आंदोलन करने वाले हैं। सावरकर जी ने उनसे कहा, "जीवित अंग्रेज गवर्नर जनरल भारत पर राज कर रहा है एक निष्प्राण मूर्ती को हटाकर विरोध प्रदर्शन करने के स्थान पर अंग्रेज़ी राज हटाने के लिए प्रयास करना अधिक आवश्यक है। विश्वयुद्ध के कारणअंग्रेज सरकार इस समय संकट में है।
हालात देखकर लगता है कि जल्दी ही जापान भी युद्ध में कूदेगा, अगर ऐसा होता है तो जर्मनी और जापान की सहायता से तमाम हिंदुस्तानी सैनिकों को एकत्र कर बाहर से हिंदुस्तान पर आक्रमण कर अंग्रेजी दासता से मुक्त होने का यह सुनहरी मौका है। रासबिहारी बोस जैसे सशस्त्र क्रांति के पक्षधर नेता पहले से ही देश से बाहर हैं, उनके मार्गदर्शन में इटली और जर्मनी में फंसे भारतीय सैनिकों की सहायता से आप यह काम कर सकते हैं।"
सावरकर और बोस के बीच हुई इस चर्चा के बारे में, ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ समाचार पत्र ने ख़बर प्रकाशित करते हुए लिखा,'सुभाष चंद्र बोस 22 जून को बॉम्बे पहुंचे और वी. डी. सावरकर के साथ फॉरवर्ड ब्लॉक और हिंदू महासभा के बीच सहयोग की संभावनाओं की खोज करने के लिए चर्चा की। इस मुलाकात में, सावरकर ने सुभाष को सुझाव दिया कि वे देश से बाहर द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ खड़ी शक्तियों तक पहुंचें और प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी में बंद कैदियों की मुक्ति करवाकर युद्ध के लिए एक भारतीय सेना का गठन करें।'
जापानी लेखक एंव प्रकाशक युकिकाज़ु सकुरासावा ने भी अपनी किताब ‘द टू ग्रेट इंडियंस इन जापान’ में इस पूरी घटना को विस्तार से वर्णित करते हुए लिखा है, 'सावरकर सदन बॉम्बे में नेताजी सुभाष बाबू और सावरकर के बीच यह एक निजी और व्यक्तिगत बैठक थी। सावरकर द्वारा सुभाष बाबू को सुझाव दिया गया कि उन्हें भारत छोड़ने और जर्मनी जाने का जोखिम उठाना चाहिए और वहाँ युद्ध बंदी के रूप में मौजूद हिंदुस्तानी सैनिकों तथा जर्मन सरकार से सहायता लेकर क्रांतिकारी श्री रास बिहारी बोस के साथ जापान से हाथ मिलाना चाहिए।सावरकर ने सुभाष बाबू को इस संदर्भ में रासबिहारी बोस का सावरकर को लिखा एक पत्र भी दिखाया।
वीर सावरकर द्वारा भारतीय युवाओं को ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित करने को लेकर उनकी बड़ी आलोचना की गई थी क्योंकि इसके पीछे उनकी दूरदर्शी रणनीति लोगों को समझ नहीं आई थी,लेकिन उनकी इस दूरदर्शी योजना के बारे में 25 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर एक प्रसारण में नेताजी ने कहा, “जब गुमराह राजनीतिक सनक और दूरदृष्टि की कमी के कारण, कांग्रेस पार्टी के लगभग सभी नेता ब्रिटिश सेना में भाड़े के हिंदुस्तानियों की सैनिकों के रूप में निंदा कर रहे हैं, तब यह जानकर मुझे खुशी हो रही है कि दूरदर्शी विनायक सावरकर निडर होकर भारत के युवाओं को सशस्त्र बलों में भर्ती होने का आह्वान कर रहे हैं। वास्तव में ये सूचीबद्ध युवा हमारी इंडियन नेशनल आर्मी के लिए प्रशिक्षित सैनिकों की भूमिका निभायेंगे।”
बाद की बातें इतिहास में दर्ज़ हैं लेकिन यह स्पष्टत: स्थापित है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इस नए क्षितिज का उदय स्वातंत्रय वीर सावरकर की प्रेरणा से हुआ था और इसे क्रियान्वयन करने का उत्तरदायित्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वीकार किया था।