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वंदे मातरम का नवोदय और नई पीढ़ी से संवाद

वंदे मातरम का नवोदयः परंपरा से संवाद करती नई पीढ़ी

वंदे मातरम के गायन को लेकर नए दिशा-निर्देश सांस्कृतिक पुनस्मरण की कोशिश हैं। स्कूलों से नई पीढ़ी को राष्ट्रबोध से जोड़ने की पहल

वंदे मातरम का नवोदयः परंपरा से संवाद करती नई पीढ़ी

केंद्र सरकार द्वारा ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर जारी नए दिशा-निर्देश केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनस्मरण का प्रयास हैं। सरकारी कार्यक्रमों, विद्यालयों और औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत के सम्मानजनक और सामूहिक गायन का प्रावधान, तथा ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम’ गाए जाने की व्यवस्था—इन सबके पीछे एक स्पष्ट संदेश है: राष्ट्र की आत्मा से जुड़ाव केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि उनके सार्थक अनुशीलन से होता है।

‘वंदे मातरम’ का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम की धड़कनों में दर्ज है। 1875 में बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध उठती चेतना का उद्घोष बना। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा कांग्रेस अधिवेशन में इसका गायन और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसका जन-जन तक पहुंचना, इसे राष्ट्रभावना का प्रतीक बनाता है। ऐसे में, इसके 150 वर्ष पूरे होने पर इसे नए सिरे से प्रोटोकॉल में स्थान देना स्वाभाविक और समयोचित प्रतीत होता है।

विशेष रूप से विद्यालयों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत से करने और सभी छह अंतरों के गायन का निर्णय युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। अब तक प्रायः केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाते रहे हैं, जिससे गीत की संपूर्ण भावधारा से छात्र-छात्राएं परिचित नहीं हो पाते थे। पूर्ण पाठ के साथ प्रस्तुति उन्हें इसके काव्यात्मक सौंदर्य, प्रकृति-चित्रण और मातृभूमि के प्रति समर्पण की व्यापक भावना से अवगत कराएगी। यह जुड़ाव केवल औपचारिक नहीं रहेगा, बल्कि भावनात्मक और बौद्धिक दोनों स्तरों पर विकसित हो सकता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने सिनेमाघरों को इस अनिवार्यता से बाहर रखा है। इससे यह संकेत मिलता है कि राष्ट्रगीत के सम्मान और सार्वजनिक जीवन की व्यावहारिकता के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया गया है। जहां औपचारिक और राष्ट्रीय अवसरों पर गरिमा और अनुशासन अपेक्षित है, वहीं मनोरंजन स्थलों पर अनावश्यक बाध्यता से बचना एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है।

निश्चित ही अतीत में ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहसें हुई हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिम विरोध और तुष्टिकरण के चलते इसके चार अंतरों को हटाने का निर्णय लिया। उस समय मुस्लिम लीग ने गीत का विरोध करते हुए कहा था कि इसमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जो मुस्लिम भावनाओं के खिलाफ है। नेहरू और कांग्रेस ने इस दबाव में आकर गीत के चार अंतरे हटा दिए। उन्हें मुस्लिम भावनाओं का तो ख्याल रहा, लेकिन हिंदू भावनाओं का नहीं।

इतिहास की इन घटनाओं को समझना आवश्यक है, परंतु आज का भारत एक परिपक्व लोकतंत्र है, जहां विविधता के बीच एकता की भावना अधिक सुदृढ़ रूप में स्थापित है। ऐसे में राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान का भाव किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रीय पहचान के पक्ष में होना चाहिए।

प्रधानमंत्री द्वारा संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा और गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम’ थीम की झांकी यह दर्शाती है कि इसे केवल औपचारिकता तक सीमित न रखकर सांस्कृतिक उत्सव का रूप देने का प्रयास हो रहा है। जब नई पीढ़ी डिजिटल युग में वैश्विक प्रभावों से घिरी है, तब अपनी ऐतिहासिक विरासत से उसका परिचय और संवाद और भी आवश्यक हो जाता है।

यह निर्णय यदि संवेदनशीलता, समावेशिता और गरिमा के साथ लागू किया जाता है, तो निश्चित ही ‘वंदे मातरम’ का महत्व नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। युवा पीढ़ी इसे केवल एक अनिवार्य गीत नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय आत्मबोध का हिस्सा मानेगी। अंततः राष्ट्र की शक्ति उसके प्रतीकों के प्रति श्रद्धा में नहीं, बल्कि उन प्रतीकों के अर्थ को समझने और जीने में निहित होती है। ‘वंदे मातरम’ का यह नवोदय उसी दिशा में एक सशक्त कदम है।

 

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