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बैतूल कारागार में लिखी गई थी संघ संविधान की भूमिका

बैतूल कारागार में लिखी गई थी संघ संविधान की भूमिका

डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

बैतूल कारागार में लिखी गई थी संघ संविधान की भूमिका

द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी (M. S. Golwalkar) बैतूल कारागार में बंद रहे थे। यह काल 1 जनवरी 1949 से 6 जून 1949 तक का था। गांधी जी की 1948 में हुई दुखद हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था।

श्री गुरुजी को पहले कोर कारागार में रखा गया था, तत्पश्चात उन्हें बैतूल जेल लाया गया। बैतूल कारागार की बैरक संख्या 01 में उनका निवास था, जो आज भी रिक्त है। उस कक्ष में उनके चित्र और कारागार प्रवास का संक्षिप्त विवरण अंकित है।श्री गुरुजी को जेल में नाना प्रकार से प्रताड़ित किया गया। उन्हें निम्नस्तरीय भोजन, कपड़े और कंबल दिए गए। इसके बावजूद उन्होंने इन कठिन परिस्थितियों से कोई अंतर नहीं लिया। वे निस्गृह योगी थे और बैतूल जेल को अपनी साधना स्थल मानकर साथी बंदियों के साथ चर्चा और वार्ता करते, उन्हें राष्ट्रीयता के रंग में रंगते।

संघ संविधान का विकास

बैतूल कारागार में रहते हुए श्री गुरुजी ने संघ का लिखित संविधान तैयार करने का कार्य आगे बढ़ाया। यही वह समय और स्थान था, जब संघ संविधान की आत्मा का बीजारोपण हुआ और यह एक पल्लवित और पुष्पित पौधे के रूप में विकसित होना शुरू हुआ।गुरुजी ने जेल से अपने हस्ताक्षर के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अंतिम संविधान राष्ट्र के नाम जारी किया। इस प्रकार, बैतूल कारागार केवल एक कारावास स्थल नहीं था, बल्कि संघ के इतिहास का निर्णायक मोड़ बन गया। इसे संघ संविधान की जन्मस्थली भी कहा जा सकता है।कुछ विवरणों के अनुसार, जेल में उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के प्रयास भी किए गए थे।

राजनीतिक संवाद और मध्यस्थता

बैतूल कारागार में रहते हुए श्री गुरुजी ने संघ की राजनीति में शुचिता, पवित्रता और समाज योगदान के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ व्यापक पत्राचार किया। इन पत्रों में उन्होंने स्पष्ट किया कि गांधी जी की हत्या के संदर्भ में संघ पर लगे आरोप केवल राजनीतिक विद्वेष और कटुता का परिणाम हैं।

उन्होंने कहा कि संघ का हत्या से कोई लेना-देना नहीं है और संगठन पर लगा प्रतिबंध अन्यायपूर्ण है। गुरुजी ने आग्रह किया कि यदि संघ के विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य है तो उसे सार्वजनिक किया जाए और अन्यथा प्रतिबंध हटाकर स्वयंसेवकों को राष्ट्र निर्माण में योगदान देने दिया जाए।गुरुजी इस दौरान उदारवादी नेता टी.आर.वी. शास्त्री से भी सतत् संपर्क में थे, जिन्होंने नेहरू-गांधी सरकार और गुरुजी के बीच मध्यस्थता की।

प्रतिबंध का हटना और सम्मान

12 जुलाई 1949 को संघ पर लगे प्रतिबंध हटा दिए गए और श्री गुरुजी को मुक्त किया गया। उस समय के तत्कालीन गृह सचिव आर.एन. बनर्जी ने स्पष्ट किया कि संघ का गांधी जी हत्या में कोई हिस्सा नहीं था।आज बैतूल जिले की यह ऐतिहासिक जेल निजी क्षेत्र में आवंटित होकर टूटने की कगार पर है। आवश्यकता इस बात की है कि जेल परिसर में स्थित 'गुरुजी कक्ष' और संघ संविधान से संबंधित इतिहास को स्मारक के रूप में संरक्षित किया जाए।