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ग्रीनलैंड विवाद और नाटो का मूल संकट

ग्रीनलैंड विवाद और नाटो का मूल संकट

राजू वर्मा


ग्रीनलैंड विवाद और नाटो का मूल संकट

अमेरिका की धमकियों से डेनमार्क परेशान, भारत को भी चिंता करनी होगी

जनवरी 2026 की शुरुआत में जब डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला में घुसकर राष्ट्रपति मादुरों को पकड़ा, तो पूरी दुनिया सोच रही थी कि अगला निशाना अब कौन हो सकता है। जवाब जल्द ही सामने आ गया ग्रीनलैंड। ट्रंप ने अचानक डेनमार्क से मांग की, यो ग्रीनलैंड को अमेरिका को दे दे। यह मांग कोई नई नहीं थी ट्रंप ने अपने पहले राष्ट्रपति के काल में 2019 में भी यही कोशिश की थी और डेनमार्क ने इसे बेतुका कहकर ठुकरा दिया था। लेकिन इस बार ट्रंप अपने दूसरे राष्ट्रपति के काल में कुछ ज्यादा ही आक्रामक नजरिये वाले दिख रहे है। उन्होंने वेनेजुएला में दिखा दिया था कि वो अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह नहीं करते, और अब वो यही तरीका यूरोप में भी अपनाना चाहते है।

जब डेनमार्क ने फिर से मना कर दिया कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है, तो ट्रंप ने रास्ता बदल लिया। उनके उप मुख्य सचिव स्टीफन मिलर ने कह दिया कि 'अमेरिका को ग्रीनलैंड लेने का अधिकार है' और उनकी पत्नी ने सामाजिक मंचों पर अमेरिकी झंडे बाला ग्रीनलैंड का नक्शा डाल दिया जिसपर लिखा था 'जल्द। ट्रंप ने खुद कहा कि सैन्य बल इस्तेमाल करना भी 'एक विकल्प' है।

लेकिन यह सिर्फ धमकी तक सीमित नहीं रहा। जब जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और फिनलैंड ने डेनमार्क की मदद के लिए अपने सैनिक ग्रीनलैंड भेजे जिसे 'आर्कटिक धीरज अभियान कहा गया तो ट्रंप ने इन सभी देशों पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगाने की धमकी दे दी जो जून तक 25 फीसदी तक बढ़ सकता था। यह सिर्फ आर्थिक दबाव नहीं था यह नाटो सहयोगियों को सीधी धमकी थी। ट्रंप ने अपने सामाजिक मंच पर लिखा 'नाटोः डेनमार्क से कहो कि वे अपने सैनिक यहां से हटाएं, अभी। इसका मतलब साफ था या तो डेनमार्क अपने सहयोगियों को हटाए और ग्रीनलैंड दे दे, या फिर अमेरिका नाटो से ही निकल जाएगा.

ग्रीनलैंड की जंग क्यों:ग्रीनलैंड बर्फ से ढका हुआ एक द्वीप है जहां 57,000 लोग रहते हैं। यह डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन अपनी सरकार चलाता है। ट्रंप के लिए यह सदी का सबसे बड़ा इनाम है। यह द्वीप अमेरिका और रूस के बीच में है। यहां से रूस और चीन पर नजर रखना आसान है। सबसे बड़ी बातइसके नीचे खरबों डॉलर की कीमती धातुएं दबी हैं जो मोबाइल, कंप्यूटर और मिसाइल बनाने में काम आती है, जो आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी है। वैश्विक तापमान बढ़ने से चर्फ पिचल रही है, तो नए समुद्री रास्ते का खुल रहे हैं जो एशिया से यूरोप सफर 40 फीसदी कम कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण, 1951 से अमेरिका का एक बड़ा हवाई अड्डा वहां है ब्यूल हवाई अड्ङ्ग जहां से यो रूस और चीन पर नजर रखते हैं।

नाटो की मुसीबत:इस विवाद ने नाटो की नींव हिला दी है। नाटो का मूल सिद्धांत है-एक पर हमला मतलब सबके ऊपर हमला। अगर रूस ने पोलैंड पर हमला किया तो सभी नाटो देश पोलैंड की रक्षा करेंगे। लेकिन अब सवाल है अगर एक नाटो देश (अमेरिका) दूसरे नाटी देश (डेनमार्क) को ही धमकाए तो क्या होगा? क्या फ्रांस और जर्मनी अमेरिका के खिलाफ डेनमार्क की रक्षा करेंगे? 75 साल में नाटो के सामने ऐसा सवाल कभी नहीं आया। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने खुलकर चेतावनी दीः 'अगर अमेरिका ने किसी नाटो देश पर हमला किया, तो सब खाम हो जाएगा-नाटो भी और वो सुरक्षा भी जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से बनी है। पोलैंड के प्रधानमंत्री ने भी कहाः 'कोई सदस्य दूसरे पर हमला नहीं कर सकता। बरना नाटो का कोई मतलब नहीं रहेगा।'

एक पैटर्न दिख रहा है:ग्रीनलैंड के मामले को अकेला नहीं देखना चाहिए। कुछ हफ्ते पहले ही ट्रंप ने के वेनेजुएला पर हमला करके वहां राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ लिया था। बहाना था नशीली दवाओं की तस्करी, लेकिन असली वजह दूसरी थी। वेनेजुएला ने बीन से 62 अरब डॉलर कर्ज लिया था, उन्हें तेल बेचा, बीन की बेल्ट-रोड परियोजना में शामिल हुआ, और रूसी लड़ाकू विमानों को आने दिया। ट्रंप के लिए यह बर्दाश्त के बाहर था अमेरिका के इलाके में चीन-रूस का दखल।

वेनेजुएला और ग्रीनलैंड दोनों एक ही कहानी कह रहे हैं। ट्रंप 200 साल पुराने 'मोनरो सिद्धांत' को फिर से लागू कर रहे हैं-वह सिद्धांत जो कहता था कि अमेरिकी महाद्वीप पर अमेरिका का राज है, किसी और का नहीं। बहाने बदल सकते हैं-कभी नशीली दवाएं, कभी सुरक्षा, कभी खनिज-लेकिन तर्फ यही है अपने इलाके में कोई प्रतिद्वंद्वी बदर्दाश्त नहीं होगा, चाहे अंतरराष्ट्रीय कानून कानून कुछ कु भी कहे। जब डेनमार्क ने विरोध किया तो ट्रंप का जवाब वही था जो वेनेजुएला में था जब अमेरिकी हित दांव पर हों तो सम्प्रभुता पर सौदा हो सकता है।

पुरानी व्यवस्था टूट रही है:यह सिर्फ ट्रंप का व्यक्तिगत व्यवहार नहीं है यह अन्तराष्ट्रीय व्यवस्था में एक मौलिक बदलाव है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जी व्यवस्था बनी, वह कुछ सिद्धांतों पर टिकी मी-सभी देश बराबर हैं, अंतरराष्ट्रीय कानून सबके लिए है, और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं सबकी रक्षा करेंगी। ये सिर्फ अच्छी बातें नहीं थी यही पश्चिम का जवाब था हिटलर जैसे तानाशाहों को। 70 सालों तक इन सिद्धांतों ने एक डांबा दिया जो बड़ी ताकतों को काबू में रखता था।

ट्रंप इस ढांचे को तेजी से तोड़ रहे हैं। 'मुझे अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह नहीं, उन्होंने कहा-और साबित भी किया। उन्होंने बिना संयुक्त राष्ट्र की इजाजत के वेनेजुएला पर हमला किया, एक देश के राष्ट्रपति को पकड़ा, और कोई सजा नहीं मिली सिर्फ संयुक्त राष्ट्र की निंदा, जिसका कोई असर नहीं। अब वे एक नाटो सहयोगी को सेना और आर्थिक दबाव से धमका रहे हैं। संदेश साफ है-ताकत कानून से बड़ी है। प्राचीन यूनानी इतिहासकार ने कहा थाः 'ताकतवर जो चाहे करते हैं, कमजोर वह सहते है जो उन्हें सहना पड़ता है।' हम उसी दुनिया में लौट रहे हैं।

भारत के लिए क्या मायने रखता है:भारत के लिए ये घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण है। भारत एक उभरती हुई ताकत है जो अमेरिका के साथ दोस्ती और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति में संतुलन बनाती है। भारत को हमेशा फायव हुआ है उस व्यवस्था से जो छोटे देशों को बड़े देशों की धौंस से बचाती है। अगर अब 'प्रभाष क्षेत्र' का नियम लागू होने लगा, तो भारत का पड़ोस खतरे में पड़ सकता है। क्या चीन ट्रंप की तर्ज पर दक्षिण एशिया में दखल देने लगेगा? अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर पूरा अधिकार मांग सकता है, तो क्या चीन हिंद महासागर में वैसी ही मांग करेगा?

इसके अलावा, भारत की अमेरिका के साथ दोस्ती लोकतंत्र और कानून के सम्मान पर आधारित है। अगर वाशिंगटन इन सिद्धांतों को छोड़ देता है- सदस्य देशो को धमकाता है, देशों की सम्प्रभुता की परवाह नहीं करता तो फिर उसमें और बीजिंग में क्या फर्क रहा? भारत की योजना यह मानती है कि कई बड़ी ताकतें आपस में संतुलन बनाएंगी और संस्थाएं उन्हें नियंत्रित करेंगी। लेकिन अगर नाटो जैसी संस्थाएं खोखली हो जाएं, अगर

अंतरराष्ट्रीय कानून बेमानी हो जाए, तो भारत के सामने एक और खतरनाक दुनिया होगी जहां सिर्फ सैन्य और आर्थिक ताकत मायने रखेगी। ग्रीनलैंड संकट भारत की कूटनीति का भी इम्तिहान है। दिल्ली ने वाशिंगटन और यूरोपीय राजधानियों दोनों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए हैं। अगर नाटी टूट गया, अगर यूरोप अपनी अलग सेना बनाने में लग गया, अगर अमेरिका यूरोप का तालमेल खत्म हुआ, तो भारत अपने कई साथी खो देगा। चतुर्भुज सुरक्षा संवाद, ऑकस और हिंद-प्रशांत जैसी सभी योजनाएं मानती हैं कि अमेरिका और यूरोप साथ काम करेंगे। एक कमजोर, बंटा हुआ पश्चिम न तो भारत के हित में है और न ही दुनिया की स्थिरता के लिए अच्छा है।

आगे क्या होगा:फिलहाल तो शायद कोई समझौता हो जाएगा। ट्रंप और डेनमार्क 1951 की पुरानी संधि में बदलाव करेंगे अमेरिका को ग्रीनलैंड में ज्यादा सुविधाएं मिलेगी, लेकिन कागजों पर डेनमार्क की सम्प्रभुता बनी रहेगी। नाटो शायद इस बार बच जाएगा। लेकिन असली नुकसान बहुत गहरा है। ट्रंप ने दिखा दिया कि गठबंधन की प्रतिबद्धताएं और अंतरराष्ट्रीय कानून ये सब अमेरिकी ताकत के आगे कुछ नहीं है। यूरोप के देशों ने समझ लिया कि जो उनकी सुरक्षा करता है, वही सबसे बड़ा खतरा भी बन सकता है। सामूहिक रक्षा की

विश्वसनीयता हिल गई है। आने वाले संकट और मुश्किल होंगे। अगर रूस ने नाटो की पूर्वी सीमा पर दबाव बढ़ाया, तो क्या सदस्य देश एक-दूसरे पर भरोसा करेंगे? अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया, तो क्या एशियाई देश अमेरिकी बादों पर यकीन करेंगे? ग्रीनलैंड का मामला बताता है कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी सशर्त है-तभी भरोसेमंद जब वाशिंगटन के हित में हो।

भारत के लिए सबक साफ है:इस बदलती दुनिया में, आत्मनिर्भरता गठबंधनों से ज्यादा जरूरी है, सैन्य क्षमता कूटनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण है, और ताकत सिद्धांतों से ऊपर है। यह वो दुनिया है जिसे भारत अपने इतिहास से जानता है, लेकिन जिसके बदलने की उम्मीद कर रहा था। ग्रीनलैंड संकट बताता है कि ऐसा नहीं हो रहा। जैसे-जैसे नाटो के अंदरूनी झगड़े बाहर आ रहे है और पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था टूट रही है, भारत को एक और अराजक, कई ध्रुवों वाली दुनिया के लिए तैयार रहना होगा-जहां भूगोल, संसाधन और सैन्य ताकत फैसला करेगी, न कि संधियां, संस्थाएं या साझे मूल्य। ताकतवर फिर से वहीं कर रहे हैं जो वे कर सकते हैं। हमें यह समझाना होगा कि कमजोर को जो सहना पड़ता है, वह कैसे न सहना पड़े।

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