चुनाव हारने के मामले में कांग्रेस पार्टी सेंचुरी लगाने की ओर अग्रसर है। बिहार चुनाव में कांग्रेस न केवल खुद डूबी बल्कि पूरे महागठबंधन को भी कमजोर किया। राहुल गांधी के नेतृत्व में यह कांग्रेस की 95वीं हार है।
कांग्रेस ने तेजस्वी पर दबाव डालकर 61 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत केवल 6 सीटों पर ही मिली। स्ट्राइक रेट 10 प्रतिशत से भी कम रहा, जबकि पिछली बार कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 19 सीटों पर जीत हासिल की थी। उस समय स्ट्राइक रेट करीब 30 प्रतिशत था।
इस खराब प्रदर्शन के लिए कांग्रेस एक बार फिर चुनाव आयोग पर दोषारोपण कर रही है, जबकि उसे अपनी कमियों और कमजोरियों पर मंथन करने की जरूरत है। यानी इतनी बड़ी पराजय के बाद भी कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया।
राहुल गांधी ने चुनाव परिणाम पर जो प्रतिक्रिया दी, वह अपने आप में हास्यास्पद है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह परिणाम वाकई चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि हम एक ऐसे चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सके जो शुरू से ही निष्पक्ष नहीं था। अब सवाल यह है कि अगर चुनाव निष्पक्ष नहीं था, तो वह चौकाने वाला कैसे हो सकता है।
राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी चुनाव आयोग को निशाना बनाया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से लेकर भूपेंद्र बघेल तक सभी ने यही दावा किया कि एनडीए जनता के समर्थन से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के समर्थन से जीता। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो बिहार चुनाव की तुलना उत्तर कोरिया, चीन और रूस जैसे देशों के चुनाव से कर दी, जहां सारे वोट एक ही पार्टी को जाते हैं।
राहुल गांधी सहित कांग्रेस के नेता अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए भले ही चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हों, लेकिन नतीजों ने एक बार फिर साफ संदेश दिया है कि जनता अब झूठे आरोप और नकारात्मक राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी।
बिहार चुनाव में महागठबंधन की हार, खासकर कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन को सीधे तौर पर राहुल गांधी के प्रचार अभियान से जोड़ा जा रहा है। राहुल गांधी का प्रचार अभियान वोट चोरी, संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास और सांस्कृतिक विवाद पर केंद्रित था, जबकि बिहार के मतदाताओं के लिए असली मुद्दे विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे रोजमर्रा के सवाल थे।
संभवतः इन्हीं मुद्दों पर मतदान के जरिए बिहार की जनता ने साफ संदेश दिया है कि उन्हें आरोप नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। उन्हें नकारात्मक राजनीति नहीं, बल्कि प्रगति चाहिए। इस चुनाव में राहुल गांधी की नकारात्मक राजनीति के कारण कांग्रेस का सफाया हो गया और पार्टी केवल 6 सीटों तक सिमट गई। यह बिहार के चुनावी इतिहास में कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है।
खास बात यह है कि राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी को लेकर बिहार में निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा जिन विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी, उनमें से अधिकांश में महागठबंधन का सफाया हो गया। इसके अलावा, राहुल गांधी ने जिन क्षेत्रों में जनसभाएं और रैलियां की, वहां भी महागठबंधन को सफलता नहीं मिली, क्योंकि उनका चुनाव प्रचार ज्यादातर झूठे आरोपों और गैर-जरूरी मुद्दों पर केंद्रित था।
वोट चोरी, एसआइआर और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल यही उनकी प्राथमिकता में थे। लेकिन बिहार के ग्रामीण और युवा मतदाता रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन आदि स्थानीय समस्याओं पर ध्यान देना चाहते थे। इसलिए राहुल गांधी की नकारात्मक राजनीति ने मतदाताओं को जोड़ने के बजाय महागठबंधन से दूर कर दिया।
कुल मिलाकर, सच्चाई यही है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति, वोट बैंक के लिए जातिवाद, सत्ता के लिए भ्रम और झूठ की राजनीति अब जनता स्वीकार नहीं करेगी। बिहार की जनता द्वारा दिया गया जनादेश यही संदेश देता है। इसलिए कांग्रेस को अपनी कमजोरियों को स्वीकारते हुए गंभीर मंथन करने की आवश्यकता है।