महासमाधि दिवस पर जानिए स्वामी श्रीयुक्तेश्वर और परमहंस योगानंद के दिव्य गुरु-शिष्य संबंध और क्रियायोग के वैश्विक प्रसार की कहानी।
सच्चिदानंद वर्मा
भारत के दो महान संत स्वामी श्रीयुक्तेश्वर और परमहंस योगानंद क्रमशः 9 और 7 मार्च को महासमाधि में लीन हुए थे। परमहंस योगानंद, स्वामी श्रीयुक्तेश्वर के शिष्य थे। श्रीयुक्तेश्वर अपने शिष्य योगानंद से निःशर्त प्रेम करते थे। वे कहा करते थे कि साधारण प्रेम स्वार्थी होता है, जिसका मूल अज्ञानतापूर्ण इच्छाओं और संतुष्टियों में होता है। दिव्य प्रेम में कोई शर्त, कोई सीमा और कोई परिवर्तन नहीं होता।इसी प्रेम के साथ-साथ कठोर अनुशासन में उन्होंने कोलकाता के निकट श्रीरामपुर स्थित अपने आश्रम में योगानंद को प्रशिक्षित किया और उन्हें विश्व प्रसिद्ध गुरु के रूप में ढाला तथा परिष्कृत किया। अधिकांश गुरु अपने शिष्य को समाधि लेने से पूर्व अपनी विद्या सौंपकर देह त्याग करते हैं, लेकिन स्वामी श्रीयुक्तेश्वर ने अपने जीवनकाल में ही अपने सारे ज्ञान से योगानंद को दीक्षित कर दिया था। समाधि से पूर्व उन्होंने अपने शिष्य को स्वामी से उन्नत उपाधि ‘परमहंस’ से भी नवाजा था।
अपने शिष्य के प्रति उनका ऐसा प्रेम था कि प्रशिक्षण के दौरान ही उन्होंने योगानंद को न सिर्फ कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया, बल्कि परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिए मार्गदर्शन भी किया। गुरु के आदेश से योगानंद अमेरिका गए और अंततः पाश्चात्य जगत में योग के जनक के रूप में प्रसिद्ध हुए।योगानंद ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘योगी कथामृत’ में अपने गुरु के साथ घनिष्ठ संबंधों का वर्णन किया है। सर्वप्रथम योगानंद की भेंट स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से वाराणसी में हुई थी। वे ऐसे सच्चे गुरु की खोज में थे, जो उन्हें ईश्वर प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन दे सके।अपने गुरु के प्रशिक्षण ने योगानंद के व्यक्तित्व और आंतरिक गुणों को इस सीमा तक रूपांतरित कर दिया कि वे विश्व स्तर पर क्रियायोग विज्ञान के प्रमुख प्रतिपादक बने और उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनुपम आध्यात्मिक विरासत का निर्माण किया। योगानंद ने अपने दूरदर्शी गुरु द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को अत्यंत गौरवमय ढंग से पूर्ण किया।
उनके गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर को उनके गुरु श्री लाहिड़ी महाशय और अद्वितीय महावतार बाबाजी से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था, ताकि वे युवा संन्यासी को महासागरों की यात्रा करने और पाश्चात्य जगत में क्रियायोग मार्ग के ज्ञान का प्रसार करने के लिए एक प्रकाशस्तंभ के रूप में तैयार कर सकें।अपने गुरु के आदेश के अनुरूप योगानंद ने सन् 1917 में योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ इंडिया (वाईएसएस) की स्थापना की और बाद में अमेरिका में वैश्विक स्तर पर इसकी सहयोगी संस्था सेल्फ रियलाइजेशन फैलोशिप (एसआरएफ) की स्थापना की। ये दोनों संस्थाएं योगानंद की योग-ध्यान की शिक्षाओं के प्रसार का कार्य आज भी कर रही हैं और विश्व की सभी सच्ची आध्यात्मिक शिक्षाओं की एकता के साथ ईश्वर के साथ आत्मसाक्षात्कार का मार्ग सिखाती हैं।
स्वामी श्रीयुक्तेश्वर ने अमेरिका में क्रियायोग का प्रचार-प्रसार कर रहे योगानंद को सन 1935 में टेलीपैथी के माध्यम से संदेश दिया कि वे भारत लौट आएं। इस संदेश में उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि पंद्रह वर्षों तक मैंने धैर्य के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा की है। शीघ्र ही मैं शरीर त्याग कर अनंत धाम चला जाऊंगा।यह आंतरिक संदेश सुनकर योगानंद अमेरिका से भारत के लिए रवाना हो गए। जब वे भारत पहुंचे तो स्वामी श्रीयुक्तेश्वर ने उन्हें अपने आश्रमों का दायित्व सौंपा और संन्यास की उच्चतर पदवी ‘परमहंस’ प्रदान करते हुए कहा कि अब यह नई उपाधि तुम्हारी पुरानी उपाधि ‘स्वामी’ का स्थान लेगी।उन्होंने कहा कि इस संसार में अब मेरा कार्य पूरा हो गया है, अब तुम्हें ही इसे आगे बढ़ाना है। सब कुछ सौंपकर स्वामी श्रीयुक्तेश्वर ने योगानंद को जीवन और संगठन की नौका को ईश्वर के किनारे सफलतापूर्वक पहुंचाने का आशीर्वाद दिया और 9 मार्च 1936 को ब्रह्मलीन हो गए।
परमहंस योगानंद ने भी सोलह वर्ष बाद 7 मार्च 1952 को महासमाधि ले ली। वे अक्सर कहा करते थे कि “मैं चाहता हूं कि मेरी मृत्यु बिस्तर पर नहीं, बल्कि कार्य करते हुए, ईश्वर और भारत के बारे में बोलते हुए हो।” और हुआ भी ठीक वैसा ही।7 मार्च 1952 को लॉस एंजिलिस (अमेरिका) में भारत के प्रथम राजदूत बिनय रंजन सेन के सम्मान में आयोजित समारोह में बोलते हुए, ईश्वर और भारत के विषय में अपने अंतिम शब्दों के साथ योगानंद वहीं मंच पर सचेतन महासमाधि में लीन हो गए।दोनों संतों ने ईश्वर से प्रेम करने के महान लक्ष्य के साथ अपना जीवन जिया और संसार के समक्ष आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर अमर हो गए। गुरु और शिष्य का आदर्श संबंध स्वामी श्रीयुक्तेश्वर और योगानंद के रूप में अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त हुआ।