भारत में जाति, आरक्षण और सामाजिक समरसता पर बढ़ते विमर्श के बीच संतुलन की जरूरत पर विश्लेषण। ऐतिहासिक असमानता और आधुनिक राजनीति के प्रभाव को समझने की कोशिश।
प्रो. आनन्द पाटिल
समूचे वर्तमान परिदृश्य को देखकर यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक जाति (समुदाय), संगठन या किसी एक नीति तक सीमित नहीं है। यह भारतीय समाज के अन्तर्गत विद्यमान उन ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं से जुड़ी है, जो समय-समय पर नवीन रूपों में उभरती रहती हैं। सामाजिक माध्यमों ने इस प्रक्रिया को और तीख कर दिया है, क्योंकि वहां विचारों का प्रवाह तर्क और संयम की अपेक्षा भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के रूप में अधिक दिखाई देता है। परिणामस्वरूप जाति, प्रतिनिधित्व और आरक्षण जैसे जटिल प्रश्न कई बार अतिशयोक्ति, आरोप और प्रत्यारोप के रूप में सामने आते ऐसी स्थिति में इस विमर्श की केवलं प्रतिक्रियात्मक दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं होगा। उसके पीछे सक्रिय मानसिकताओं और ऐतिहासिक अनुभवों को जानना समझना भी आवश्यक है। यदि एक ओर श्रेशता-बोध से प्रेरित आख्यान सामाजिक असन्तुलन को जन्म देते हैं, तो दूसरी ओर प्रतिक्रियात्मक अस्मिता-विमर्श भी समाज को नए प्रकार के विभाजनों की ओर ले जाता है।
'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे तर्क भी इसी पृभूमि में उभरते और गुंजायमान होते हैं। इन परिस्थितियों में सन्तुलन स्थापित करना हो सामाजिक समख्सता की वास्तविक कसौटी है। यह भी सर्वोवदित है कि आयातित भारत विखण्डनकारी वैचारिक प्रवृत्तियां इस असन्तुलन को और गहरा करने के लिए निरन्तर नए-नए आख्यान गढ़ती साती है। इन आख्यानों के प्रभाव में समाज के कुछ वर्ग असामाजिक प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख हो उठते हैं, जिससे समाज में निरन्तर तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती 12 2014 में संगठन समर्थित भाजपा को पुनः सत्ता प्राप्त होने पर राष्ट्रवाद की एक नई ऊर्जा दिखयों दी थी, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ऐतिहासिक असमानताओं के समाधान के प्रश्न पर वह भी धीर-धरि पूर्ववर्तियों के बरें से भिन्न मार्ग निर्मित नहीं कर सकी है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान एक नई दिशा का संकेत अवश्य था. किन्तु उसका अगला चरण अभी तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाया। गतांक में इस सन्दर्भ में एक सुझावात्मक प्रविधि का उल्लेख किया गया था। आरक्षण के भीतर बने 'पॉकेट्स' तथा उसके पीड़ी-दर-पीछे हो रहे दोहन से मुक्ति का मार्ग देर-सवेर समझना और लागू करना होगा, तभी उसका लाभबृहत्तर वंचित समाज तक पहुंच सकेगा और वास्तविक सामाजिक न्याय की दिशा में सार्थक प्रगति सम्भव हो सकेगी।
इधर, आलोचना समर्पणवादी हो गई है, किन्तु इस तथ्य को रेखांकित किया जाना चाहिए कि भाजपा के तीसरे कार्यकाल के लगभग मध्य तक आते-आते यह भी अनुभव होने लगा है कि राष्ट्रवाद के व्यापक विमर्श पर धीरे-धीरे जातिवादी प्रवृत्तियां हाची होती जा रही हैं। ऐसी दृष्टि भारत की एकात्म (समरस) चेतना के निर्माण में सहायक नहीं हो सकती। गतीक में संकेत किया है कि कुछ लोग यह प्रचारित प्रसारित करते नहीं थकते कि उन्हों के कारण भाजपा अस्तित्व में है, जबकि यह सर्वविदित है कि बारह से पन्द्रह प्रतिशत संख्या किसी भी दाल को सत्ता तक नहीं पहुंचा सकती। सत्ता तक पहुंचने के लिए व्यापक सामाजिक समर्थन आवश्यक है। इसलिए तथाकथित श्रेष्ठता के दावों से बचना ही उचित है, क्योंकि ऐसे दावे सामाजिक विभाजन को ही गति देते हैं। ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्कता का संकेत है और इससे संगठन व भाजपा दोनों अधिक सुइड़ हो सकते हैं।
सामाजिक माध्यमों पर चत रहे जातिवादी विमर्श के अनेक उदाहरण हैं। यहां एक उदाहरण उल्लेखनीय है एक वरिष्ठ मित्र, जो अच्छे कवि भी हैं, ने लिखा कि 'अब क्या किया जाए! यूपीएससी के 50 टॉपर में 14 ब्राह्मण हैं।' मैंने टिप्पणी की 'आप भी? हाय रे जाति! तो, उत्तर मिला यह आंकड़ा जातिवादियों ने ही दिया है। इसी चर्चा में एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि उत्तरप्रदेश और बिहार की जातीय राजनीति को महाराष्ट्र का व्यक्ति समझ ही नहीं सकता महाराष्ट्र उनसे कहीं अधिक पुरोगामी है। इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामाजिक माध्यमों पर प्रचुरता में मिल जाती हैं। पुरोगामिता व प्रतिगामिता पर पृधक चर्चा हो सकती है, यहां उससे विचलन ही उत्पन्न होगा। किन्तु, ऐतिहासिक तथ्य यह है कि भारतीय समाज में जाति आधारित भेदभाव दीर्घावधि तका विद्यमान रहा है। ज्ञानकर्म और शिक्षा के अवसर लम्बे समय तक सीमित वर्गों के पास रहे इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता। साथ ही, यह भी उतना ही सत्य है कि समय के साथ ही स्थिति में परिवर्तन और सुधार भी हुए हैं। जी समुदाय स्वयं को पीढ़ियों से उपेक्षित मानते हैं, शिक्षा और ज्ञानकर्म में पहली या दूसरी पीढ़ी हैं, उनको अनुभूतियों को पूर्णतः नकारकर आगे नहीं चढ़ जा सकता।
दूसरी ओर, यह भी देखने को मिलता है कि आरक्षण के विरोध में खड़ा वर्ग इसे अपने साथ अन्याय मानता है और न्यूनतम अंकों पर अवसर प्राप्त करने बालों का उपहास करता है। इसके प्रत्युत्तर में ऐतिहासिक असमानताओं का अनुभव करने वाले समुदाय अपने शोषण व अवसरों की दीघांवधि तक अनुपलब्धता का उल्लेख करते हैं। किन्तु, आरक्षण की जटिलता में यह तथ्य रेखांकनीय है कि इसके भीतर कुछ समूह 'पॉकेट्स' बनाकर उसका अबाध लाभ उठाते हैं, जिससे उसी श्रेणी के अन्य समुदाय अपेक्षाकृत बंचित रह जाते हैं। इससे सामाजिक खाइयों को पाटना कठिन प्रतीत होता है। भारतीय परम्परा में त्याग को महत्व है, किन्तु व्यवहार में संग्रा की प्रवृत्ति चरम पर है, अधिकाधिक पाने और उसे सुरक्षित रखने की इच्छा बलवती है। इसी मानसिकता का एक रूप व्यापक सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देता है। जैसे ही यह संकेत मिलता है कि किसी वस्तु की कमी हो सकती है, लोग उसे अधिक मात्रा में संग्रहित करने लगते हैं। यही प्रवृत्ति अवसरों और संसाधनों के सन्दर्भ में भी दिखाई देती है, जहां सम्भव हो, उन्हें अपने और अपनी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है।
इसलिए समाधान का मार्ग आरोप और प्रत्यारोप से ऊपर उठकर विचार करने में है। आरक्षण को व्यवस्था को समास करने के बजाय उसे अधिक न्यायसंगत और परिष्कृत बनाने की आवश्यकता है। साथ ही, लोकलुभावन योजनाओं पर भी पुनर्विचार आवश्यक है। यदि उन्हीं संसाधनों को कौशल विकास, रोजगार-सूजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण की दिशा में लगाया जाए, तो समाज को वास्तविक लाभ मिल सकता है।
अन्ततः प्रश्न पुनः उसी मूल बिन्दु पर लौटता है भारतीय समाज अपनी विविधताओं के भीतर किस प्रकार ऐसी साझा दृष्टि विकसित करे, जो न तो किसी एक समूह के वर्चस्व पर आधारित हो और न ही पसमा अविश्वास पर। हमारी चर्चा का केन्द्र यही होना चाहिए कि समरसता, प्रतिनिधित्व और न्याय के बीच सन्तुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए, ताकि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकात्मता दोनों सुदृढ़ हो, साथ ही ऐतिहासिक असमानताओं का समाधान भी सम्भव हो सके। भारत की आत्मनिर्भरता का स्वप्न तभी साकार हो सकेगा, जब समाज के समस्त वर्ग वास्तविक अर्थों में साथ खड़े होंगे। केवल संख्या-गणना के लिए लोकलुभावन योजनाएं लाने से चुनाव अवश्य जोते जा सकते हैं, किन्तु उससे भारत अपनी महानता की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकेगा।