संघ कार्य के 100 वर्ष पूरे होने पर सीहोर की ऐतिहासिक भूमिका। 1943 में छह स्वयंसेवकों से शुरू हुई पहली शाखा, प्रतिबंध, आपातकाल और गांव-गांव तक फैले सामाजिक परिवर्तन की कहानी
भोपाल के समीप सीहोर केवान एक जिला मुख्यालय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और संगठनात्मक ऊर्जा का सशक्त केंद्र रहा है। रियासत काल से लेकर गणराज्य भारत तक इसकी यात्रा अनेक ऐतिहासिक पड़ावों से गुजरी है। कोई आठ दशक पहले सीहोर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य की नींव पड़ी। संघ की पाली शाखा से लेकर प्रतिबंध, आपातकाल और गांव-गांव तक विस्तार की प्रक्रिया ने यहां समर्पण, साहस और सामाजिक परिवर्तन की अनूठी मिसालें गढ़ीं। विठ्ठलगुरु जैसे स्वयंसेवकों की त्यागमयी जीवन शैली, कठिन परिस्थितियों में भी अडिग शाने चाले कार्यकर्ताओं का धैर्य और गांवों में समरसता स्थापित करने के प्रयासों ने सीहोर को विशिष्ट पहचान दी। यह कहानी केवल संस्थागत विस्तार की नहीं बल्कि छोटे-छोटे प्रयासों से समाज में बड़े बदलाव की सतत साधना की है।
1943 में पड़ी संघ कार्य की नींव : सन् 1943 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊर्जावान स्वयंसेवक शंकर लाल शर्मा (दहा) ने सीहोर में संघ की पाहली शाखा लगाई। यहा भोपाल के थे। उनका सीहोर में पहले से कुछ परिचय और मेलजोल था। उसी के सहारे छावनी क्षेत्र में लाल मस्जिद के पास सुनारों के मंदिर में एक बैठक करके उन्होंने कुछ लोगों को संघ के बारे में बताया और शाम से संघ की शाखा शुरू कर दी गई। इस दौरान कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने वालों में चंपालाल सोनी, भगवान दास अग्रवाल, मंगली प्रसाद चौरसिक, बिरदीचंद जोशी और गोपाल राठौर जैसे स्वयंसेवक शामिल थे। दड़ा 1946 तक संघ कार्य के लिए भोपाल से सीहोर आते-जाते रहे। 1947 आते-आते संघ कार्य गांवों और तहसीलों तक पहुंच गया। इसके बाद सीहोर मेंनेमीचंद कक्कड़ की पहले प्रचारक के रूप में नियुक्ति हुई। उनके मार्गदर्शन में संघ कार्य और बढ़ने लगा।
कार्यालयों की यात्रा विस्तार से स्थायित्व तकः सीहोर में पहला संच कार्यालय नमक चौराहे पर मोदी भवन में था। पहले प्रतिबंध तक कार्यालय यहीं रहा। इसके बाद विभिन्न स्थानों से गुजरता हुआ सीवन नदी के तट पर कार्यालय शुरू हुआ। वर्तमान में पार्वती कॉलोनी में संघ का कार्यालय संचालित है.स्वयंसेवकों के त्याग समर्पण से आगे बढ़ा संघ का कार्य सीहोर में अनेक स्वयंसेवक ऐसे हुए जिनके त्याग समर्पण के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। इनमें एक थे विठ्ठलगुरु। उन्होंने प्रवास खर्च जुटाने के लिए हाथ ठेले पर मंगौड़े तक बेचे। आष्टा के शीत शिविर में जाने के लिए साधियों के साथ श्रम कर पारिश्रमिक अर्जित करना उनके संकल्प का अनूठा उदाहरण है। 78 वर्षीय डॉक्टर बनवारीलाल सुलोदिया ने अंतिम समय से पूर्व अपनी संकल्पित गुरु दक्षिणा समर्पित कर दी। उनका जीवन अंत तक समर्पण का संदेश देता रहा।
ऐतिहासिक संचलनः 1994 में सीहोर की आष्ठ तहसील में 54 नए स्थानों पर शांखाएं प्रारंभ करने के लक्ष्य के साथ ऐतिहासिक पथ संचलन निकाला गया। 98 गांवों के 1082 स्वयंसेवक और 1500 नागरिक इसमें शामिल हुए। हरनावदा में संघ द्वारा प्रेरित युवाओं द्वारा पहरेदारी से चोरी की घटनाएं थमों, जबकि कजलास में 200 स्वयंसेवक तैयार हुए और गांव सामाजिक समरसता की मिसाल बना।
आपातकाल में 57 स्वयंसेवक जेल गए
1948 के प्रतिबंध काल में गोपाल राठौर के नेतृत्व में नरेंद्र चौरसिया, हीरालाल भावसार, जगन्नाथ वशिष्ठ, मदनलाल दर्जी, पूरनचंद्र बारोलिया, बैनीप्रसाद भोई, शिवदयाल शिब्बा पहलवान) ने सत्याग्रह किया। संयोग से इसी दौर में भोपाल राज्य के भारत में विलीनीकरण करने को लेकर आंदोलन शुरू हुआ। संघ के स्वयंसेवकों ने इस आदोलन में भी भागीदारी की और वे जेल भी गए। 1975 में जब आपातकाल थोपा गया, तब भी सीहोर के स्वयंसेवक पीछे नहीं रहे। आपातकाल में सीहोर के 57 कार्यकर्ता मीसा के अंतर्गत जेल में डाल दिए गए। दमन और जेल यात्रा के बाद भी संगठन का कार्य न थमा न रुका। यह कालखण्ड साहस और अनुशासन का प्रतीक बन गया।
कई तपोनिष्ठ प्रचारक भी निकले
सीहोर से संघ कार्य के लिए अनेक प्रचारक निकले हैं। इनमें प्रभाकर वडनेरकर, नारायण प्रसाद गुप्ता, नर्मदा प्रसाद किवार, प्रकाश वर्मा, दीनदयाल सिसोदिया, हरिशंकर चौहान, साहब सिंह चौहान, बाबू सिंह ठाकुर, मान सिंह वाकर के नाम प्रमुख है। सीहोर र में में सबसे पहले मंगली प्रसाद चौरसिया व विस्दीवंद्र जोशी ने 1944 में हरदा के संघ शिक्षा वर्ग से प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया। सीहोर की यह यात्रा केवल संगठन विस्तार की कहानी नहीं बतिक समाज परिवर्तन की सतत प्रक्रिया है। संघ के स्वयंसेवका यहां सामाजिक परिवर्तन के लिए आज भी जी जान से जुटे हैं।