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प्रत्यंचा तन गई: समरसता बनाम राजनीतिक रणनीति

प्रो. आनन्द पाटील


प्रत्यंचा तन गई समरसता बनाम राजनीतिक रणनीति

हमने (गतांक से) गतांक में यह जाना-समझा कि 2014 के बाद भारतीय राजनीति में भाजपा की निरन्तर चुनावी सफलताएं प्रमुखतः उसके बूथ स्तरीय संगठन, कार्यकर्ता व कैडर आधारित सक्रियता, सामाजिक पारिवारिक सम्पर्क, समरसता का विस्तार तथा सुनियोजित चुनावी सामाजिक इंजीनियरिंग का परिणाम हैं। इस निष्कर्ष हेतु पर्याप्त तथ्यात्मक व व्यावहारिक आधार विद्यमान हैं, किन्तु इन्हीं चुनावी सफलताओं के समानान्तर, अब यह तथ्य भी स्पष्ट है कि एक गम्भीर वैचारिक व संगठनात्मक असन्तुलन उभर रहा है। यह संकट आकस्मिक या बाहा न होकर चुनावी राजनीति की निरन्तर सफलता से उत्पन्न उन आन्तरिक दबावों का परिणाम प्रतीत होता है, जिनके कारण समाज के लिए सामाजिक वैचारिक लक्ष्य और व्यावहारिक राजनीतिक रणनीतियों के मध्य सतत दूरी बढ़ती जा रही है।

इधर, इस संकट का केन्द्रीय बिन्दु है 'जाति'। जो जाति कभी 'सामाजिक यथार्थ' के रूप में न केवल भारतीय समाज की संरचना का अंग रही, अपितु ऐतिहासिक रूप से सामाजिक संगठन, आर्थिक आत्मनिर्भरता, आक्रान्ताओं के प्रतिरोध और व्यापक स्तर पर सांस्कृतिक निरन्तरता का भी एक आधार रही, वही आज शनैः शनैः राजनीतिक रणनीति के उपकरण में परिवर्तित होती जा रही है। चुनावी आवश्यकता (उपयोगिता) के दबाव में विकसित होती अवसरानुकूल (2) जाति-दृष्टि ने समाज के लिए घोषित सामाजिक समरसता के आदर्श और उसके वास्तविक राजनीतिक व्यवहार के मध्य एक गहरा द्वैत उत्पन्न कर दिया है। परिणामतः जाति अब 'सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ' एवं 'सामाजिक समन्वय की चुनौती' के रूप में नहीं, सत्ता-साधना के संसाधन के रूप में देखी जाने लगी है। इससे धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह टकराव केवल चुनावी विवशताओं और आदर्शवादी घोषणाओं के मध्य का नहीं है, समाज संगठन की मूल आत्मा और उसकी तात्कालिक राजनीतिक रणनीति के मध्य का गम्भीर द्वन्द्व है। यदि जाति को उसके ऐतिहासिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक आयामों को समझे बिना, केवल एक 'रणनीतिक साधन' मान लिया गया, तो चुनावी सफलताएं अन्ततः वैचारिक अपक्षय और संगठनात्मक खोखलेपन को ढंकने का आवरण बनकर रह जाएंगी।

यह सत्य है कि सामाजिक समरसता आत्मालोचन, निरन्तर संवाद और ऐतिहासिक अन्याय की स्वीकारोक्ति के बिना सम्भव नहीं है, और इसी बिन्दु पर वर्तमान राजनीति चूक करती दिखती है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि संगठन के भीतर कार्यकर्ता के बीच वैचारिक विभाजन के लक्षण उभरने लगे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल संगठनात्मकता के लिए, अपितु भाजपा की दीर्घकालिक 'वैचारिक विश्वसनीयता' के लिए भी शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। यहीं से, एक और गम्भीर प्रश्न उभरता है कि क्या संगठन और राजनीति के मध्य यह द्वैत स्थायी रह सकता है? इतिहास साक्षी है कि कोई भी सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन, जो अपने मूल वैचारिकी और व्यावहारिक रणनीति के मध्य सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता, अन्ततः या तो वह वैचारिक कठोरता में
सिमट जाता है या अवसरवादी लचीलेपन में बिखर जाता है। वर्तमान परिदृश्य में यही खतरा विचार के सम्मुख मुंह बाए खड़ा है।

यही कारण है कि चुनावी राजनीति और सामाजिक संगठन के मध्य मूलभूत भेद को समझना आवश्यक हो जाता है। चुनावी अनिवार्यतः राजनीति 'तात्कालिकता' में काम करती है, वह वर्तमान क्षण की मांगों, तात्कालिक समीकरणों और सत्ता-सन्तुलन की गणनाओं से संचालित होती है। इसके विपरीत, समाज संगठन का उद्देश्य केवल वर्तमान को साधना नहीं, भविष्य के समाज का निर्माण करना होता है। यह निर्माण धैर्य, निरन्तरता और नैतिक साहस की अपेक्षा करता है, क्योंकि सामाजिक विकृतियां एक चुनावी चक्र में उत्पन्न नहीं होती और न ही एक चुनावी सफलता से समाप्त होती हैं। जब संगठन इस भेद को धुंधला कर देता है और सामाजिक समरसता जैसे गहरे मूल्य को चुनावी लाभ की भाषा में परिभाषित करने लगता है, तब वह अनजाने ही अपने ही घोषित उद्देश्यों को क्षति पहुंचाता है। ऐसी स्थिति में समरसता एक दीर्घकालिक सामाजिक प्रक्रिया न रहकर, अवसरानुकूल प्रयुक्त होने वाला प्रतीक बन जाती है। परिणामतः संगठन सामाजिक परिवर्तन वाहक के स्थान पर सामाजिक यथार्थ के प्रबन्धक की भूमिका में सिमट जाता है। यही वह बिन्दु है, जहां नारे और संस्कार के मध्य का अन्तर निर्णायक रूप से स्पष्ट होता है। हम जानते हैं कि नारे क्षणिक उत्साह उत्पन्न कर सकते हैं और भीड़ जुटा सकते हैं, किन्तु वे सुगठित समाज का निर्माण नहीं कर सकते, अन्ततः संस्कार, समन्वय और समरसता ही स्थायी सामाजिक परिवर्तन का आधार बनते हैं।

यदि संगठन संस्कार की कठिन और दीर्घकालिक प्रक्रिया की अपेक्षा नारे की सहजता को वरीयता देता है, तो वह अल्पकालिक राजनीतिक रणनीतिक सफलता तो अवश्य अर्जित कर सकता है, किन्तु दीर्घकाल में सामाजिक समरसता के लक्ष्य से क्रमशः दूर होता चला जाता है। आज 'जाति' को लेकर जो विमर्श उभर रहा है, वह केवल तथाकथित वंचित अस्मिताओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मात्र नहीं है, वह उस राजनीतिक संकेत का परिणाम भी है, जिसमें जाति-आधारित जनगणना को वैध और उपयोगी मान लिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, एक और तथाकथित 'उपेक्षित' वर्गों में नई अपेक्षाएं जन्म लेती हैं, तो दूसरी ओर तथाकथित 'प्रभावशाली' वर्गों में (?) असुरक्षा और प्रतिरोध की भावना पनपती है। यह द्वन्द्व सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने के बजाय उसे नए सिरे से पुनर्गठित करता है, विकारों से उत्पन्न ढांचे टूटते नहीं, राजनीतिक भाषा में ढलकर स्थायी भाव ग्रहण कर लेते हैं, जिससे सामाजिक विभेद की दृष्टि और अधिक प्रखर हो जाती है।

अतएव, आवश्यकता इस बात की है कि संगठन और उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति के मध्य एक स्पष्ट रेखा खींची जाए। जाति को सामाजिक यथार्थ के रूप में स्वीकार करना और उसे राजनीतिक हथियार बनाना ये दोनों भिन्न प्रक्रियाएं हैं। पहली सामाजिक समरसता की ओर ले जा सकती है, दूसरी उसे स्थगित करती है। यदि संगठन वास्तव में समस्त हिन्दुओं को एक सूत्र में बांधना चाहता है, तो उसे सत्ता-सुविधा से परे आत्मालोचनात्मक साहस दिखाना होगा, अन्यथा, चुनावी विजय का यह सिलसिला एक दिन उसी संगठन को यह प्रश्न पूछने पर विवश करेगा कि क्या हमने समाज को संगठित किया, या केवल सत्ता के लिए समाज को वर्गीकृत किया? (क्रमशः) 

(लेखक- प्रो. आनन्द पाटील, अखिल भारतीय राष्ट्रवादी लेखक संघ के संस्थापक)