राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना, डॉ. हेडगेवार के विचार और शाखा की भूमिका पर विस्तृत लेख। जानें संघ को समझने का दृष्टिकोण- डाॅ. विनोद मिश्रा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसकी स्थापना 1925 में दशहरा के दिन माननीय परमपूज्य केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाला राष्ट्रीयता से ओतप्रोत संगठन है। जो हिन्दुओं का संगठन करता है। बिना किसी भेदभाव के जाति, पंथ व्यवस्था से हटकर सेवा करने वाला विश्वस्तरीय संगठन है।
संघ की तुलना किसी से नहीं ?
यदि संघ की बात की जाये तो ऐसा देश एवं विश्व में कोई संगठन नहीं है। जिससे इसकी तुलना की जाये। अतः संघ की तुलना संघ से ही की जा सकती है। इस संबंध में एक श्लोक दिया जाता है
गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः।
रामरावणयोयुद्धिं रामरावणयोरिव।।
अर्थात आकाश कितना बड़ा ? उत्तर है गगनाकारम् याने आकाश इतना ही है। सागर (समुद्र) कितना गहरा है? इसका उत्तर है सागरोपम अर्थात सागर की तुलना सागर से की जा सकती है। वैसे ही रामरावण का युद्ध। इस संबंध में कहा जा सकता है कि यह राम-रावण के युद्ध के समान ही है। इसी प्रकार संघ की तुलना संघ से ही हो सकती है।
संघ हिन्दुओं का संगठन है?
संघ के संबंध में प्रश्न किया जाता है कि संघ क्या है? इसका अर्थ क्या है? तो यह कहाॅं जायेगा कि संघ हिन्दुओं का संगठन है जो हिन्दुओं का संगठन करता है। अब प्रश्न है कि ’’हिन्दु‘‘ क्या है? तो हम निश्चिन्तता से यह कह सकते हैं कि हिन्दु धर्म है किंतु धर्म को पंथ या मजहब (Religion) नहीं कहा जा सकता है। यह अत्याधिक संकुचित एवं अंग्रेजों द्वारा किया गया अनुवाद था। वे भारत मंे आये तो विभिन्न मजहबों, पंथों के मानने वालों को देखा एवं उसे धर्म मान लिया। जबकि धर्म व्यापक अवधारणा है। महाभारत में कहा गया है ’’धर्मो धारयति प्रजाः’’ अर्थात जिसे आम व्यक्ति धारण करे। इसे कर्तव्य भी कहा जा सकता है। धर्म की व्यापक व्याख्या है। अग्नि का धर्म, वायु का धर्म, जल का धर्म, आकाश का धर्म, माता का धर्म, पिता का धर्म, भाई का धर्म, बहिन का धर्म, पुत्र का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, गुरू का धर्म, शिष्य का धर्म, व्यापारी का धर्म, ग्राहक का धर्म, बायें चलने का भी धर्म है। हमारे हिन्दु धर्म में कहा गया है कि व्यक्ति अपने अपने धर्म का पालन करता रहे तो दूसरे का धर्म (कर्तव्य) स्वयं सुरक्षित हो जाता है। हिन्दु धर्म केवल मानव तक सीमित नहीं है बल्कि इसे जीव जंतुओं, नदी, पहाड़ों समेत सभी से जोड़ा गया है। इसे सृष्टि धर्म कहा गया है। हमारे यहाॅं व्यक्ति धर्म, परिवार धर्म, समाज धर्म, राष्ट्र धर्म, प्रकृति-पर्यावरण धर्म तथा परमेश्वर धर्म की व्याख्या है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ धर्म (कर्तव्य) राष्ट्र धर्म को माना गया है। इस अर्थ में हिन्दू धर्म है। हिन्दू धर्म है।
डाॅ. हेडगेवार जी में बचपन से राष्ट्रभक्ति का भाव था?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं डाॅ. हेडगेवार एक दूसरे के पर्याय थे। बचपन से उनको व्यापक राष्ट्रभक्ति का भाव था। इस संबंध में एक उदाहरण दिया जाता है कि जब वे तीसरी कक्षा में थे, तब रानी विक्टोरिया का राज्यारोहण कार्यक्रम स्कूलों में आयोजित किया जा रहा था। जब डाॅ. साहब की स्कूल में उन्हें मिठाई दी गई तो उन्होंने उसे कूडेदान में फंेक दिया। जब शिक्षक ने पूछा ऐसा क्यों? क्या मिठाई अच्छी नहीं थी। तो डाॅ. साहब ने उस समय जवाब दिया था कि राज्यारोहण की मिठाई हमारे लिये मिठाई कैसे हो सकती है? इस बात से पता चलता है कि हेडगेवार की उस उम्र में सोच कितनी व्यापक एवं श्रेष्ठ थी।
जब माफी मांगने से मना किया?
उस समय वंदेमातरम् आंदालन सम्पूर्ण देश में चल रहा था। डाॅ. हेडगेवार जी ने बाल्यावस्था में इस आंदोलन में अग्रणी भूमिका अदा की। इस आंदोलन से डरकर अंग्रेजों ने सभी स्कूल, काॅलेजों को बंद कर दिया। बाद में अधिकारियों एवं अभिभावकों की सहमती बनी एवं स्कूलों को खोला गया। शर्त यह थी कि सभी बच्चे माफी ’’नाम मात्र की‘‘(Normal Apology) मांगें। सभी बच्चों ने माफी मांगी लेकिन बालक केशव ने तथा उनके एक मित्र ने माफी मांगने से इंकार किया और परिणाम जैसा अपेक्षित था। स्कूल से निष्कासित किया गया। ऐसी देशभक्ति का जज्बा था।
जब डाॅ. साहब ने कोर्ट में स्वयं का पक्ष रखा ?
चूंकि सुबह शाम मात्र एक भाव माॅं भारती का उद्धार। गुलामी की बेड़ियाॅं कटें सो असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सो गिरफ्तारी तय। उस समय क्रांतिकारी सजा को स्वीकार कर लेते थे तो जेल जाना पड़ता था। वे अपना बचाव का पक्ष नहीं रखते थे। परंतु हेडगेवार जी ने जेल जाने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने अपना स्वयं का पक्ष रखा तथा कहा कि वे निर्दोष हैं। इस संबंध में उन्होंने अनेक तर्क दिये। तब तत्कालीन जज ने उनके बयान के संबंध में लिखा था कि ’’इनका बचाव का पक्ष ज्वालामुखी एवं भडकाऊ है। उन्हें इस आधार पर जेल भेजा गया। जब वे छूटे तो उनका नागरिक अभिनंदन किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता स्वयं स्व. मोतीलाल नेहरू ने की थी।
डाॅ. साहब के सभी दलों में मित्र थे?
डाॅ. साहब की मिलनसारिता के कारण, उनके उत्साह एवं देशभक्ति की सभी सराहना करते थे तथा लगभग सभी दलों एवं समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियांे से उनकी मित्रता थी। उनके कम्युनिष्ट पार्टी के एक बडे नेता मित्र थे। बेरिस्टर रूईकर। उनकी विभिन्न विषयों पर चर्चा एवं तार्किक बहस होती थी। बैरिस्टर रूईकर अत्यन्त रहीस थे तथा डाॅ. हेडगेवार गरीब। तो उन्होंने मजाक में रूईकर जी से कहा था कि
मैं गरीब पूंजीवादी हूॅं और आप धनवान श्रमिक हैं (I am a poor capitalist and your are rich labourer)।
संघ में शाखा में आकर ही जाना जा सकता है?
जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात आती है तो इस संबंध में प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने ज्ञान के आधार पर, सोच के आधार पर अभिव्यक्ति देता है। उसके गुणदोषों की व्याख्या करता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि संघ को आप सुनकर, पढ़कर जान तो सकते हैं। लेकिन वास्तव में जानना है तो शाखा में जाना ही पडे़गा और शाखा में सामान्य चर्चाएंे, कुछ खेल और प्रार्थना। इसके अलावा शायद और कुछ नहीं? यहीं से व्यक्तित्व एवं राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ। अतः संघ को जानना है, पूर्णतः समझना है तो शाखा आना अनिवार्यं। इस संबंध में एक उदाहरण दिया जाता है कि यदि आप शाखा नहीं गये तो क्या दृष्टिकोण होगा। एक नेत्रहीन व्यक्ति बैठा था? उसी समय उसका मित्र आया। नेत्रहीन व्यक्ति ने पूछा कहाॅं गये थे? मित्र ने जवाब दिया भोजन करने। नेत्रहीन व्यक्ति ने पूछा क्या खाया? मित्र ने जवाब दिया ’’खीर‘‘ खाई। नेत्रहीन व्यक्ति ने पूछा खीर माने? मित्र ने कहा दूध याने सफेद। नेत्रहीन व्यक्ति ने पूछा सफेद क्या? मित्र बोला बगुले जैसा? नेत्रहीन ने फिर से पूछा बगुला याने क्या? मित्र ने सोचा बगुला कैसे समझाया जाये तो उसने हाथ को टेडा करके बतलाया बगुला ऐसा होता है? तब नेत्रहीन व्यक्ति ने कहा तब तो खीर खाते समय तुम्हारे गले में अटकी होगी। इसका मतलब है कि आप जब तक शाखा नहीं जायें। ऐसे अनुमान लगायेंगे तो वास्तविकता से कोसो दूर होंगे।
अतः संघ को समझना है। भ्रमों से दूर रहना है तो शाखा आइयेगा।
पत्रकार ने पूछा शाखा की क्या आवश्यकता? प्रवास के दौरान एक बार एक पत्रकार ने परम पूजय गुरूजी से पूछा और कहा कि मेरे गांव में एक भी ईसाई और मुसलमान नहीं है? फिर मेरे गांव में शाखा की क्या आवश्यकता है। तब गुरूजी ने जवाब दिया कि प्रदेश, देश एवं विश्व में एक भी मुसलमान ईसाई न हो तो भी हम जोड़ने एवं शाखा का काम करते हैं। हम वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले हैं? हम भारत को एक राष्ट्र मानते हैं। मुसलमान या ईसाई के आधार पर शाखा नहीं चलती है।
तब आप आर.एस.एस. के सदस्य नहीं बन सकते?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मा. गो. वैद्य जी ने ईसाई प्राध्यापक का उदाहरण दिया तथा बतलाया कि नागपुर में हिस्लाॅप काॅलेज जो चर्च आॅफ स्काॅटलैंड द्वारा संचालित था। मैं वहाॅं प्राध्यापक था। बात 1956-57 की है। उन्होंने बतलाया कि मेरी आयु से बडे़ ईसाई प्राध्यापक ने पूछा कि ’’मिस्टर वैद्य‘‘ क्या मैं आर.एस.एस. का सदस्य बन सकता हूॅं? मैने कहा अवश्य बन सकते हैं। उन्होंने प्रति प्रश्न किया ’’मुझे क्या करना होगा’’? वैद्य जी ने कहाॅं आप बाइबिल को पवित्र किताब मान सकते हैं? आप चर्च से जुडे रह सकते हैं? आप ईसा मसीह को भगवान का पुत्र मान सकते हैं? लेकिन आपको यह भी मानना होगा कि अन्य पंथ एवं मजहब भी सही हो सकते हैं। इस पर उन ईसाई प्राध्यापक ने कहाॅं मैं नहीं मानूंगा। यदि ऐसा करूॅंगा तो मैं अपने धर्म का प्रचार कैसे करूंगा।
इसी संबंध में एक बात भी उल्लेख करना चाहूॅंगा मैं द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्री गुरूजी द्वारा लिखित पुस्तक ’’बंच ऑफ थाॅट’’ पढ़ रहा था। देश के प्रथम राष्ट्रपति स्व. श्री राजेन्द्र प्रसाद असम मंे मिशनरी के व्यक्तियों के साथ चर्चा कर रहे थे। उन्होंने कहाकि आप लोग यहाॅं सहयोग शांति का वातावरण बनायें? तो एक पादरी ने जवाब दिया था कि वे 2000 किलोमीटर से यहाॅं समन्वय, सहयोग एवं शांति के लिये नहीं आये हैं। इन बातों से आप स्वयं पता करें कि इनका मूल ध्येय क्या है?
स्वयं सेवक की प्रमाणिकता ?
मैं बतलाना चाहूॅंगा कि शाखाओं से राष्ट्रभक्ति का संदेश एवं श्रेष्ठ चरित्रवान नागरिक बनने की प्रेरणा की जाती है। संघ के स्वयंसेवक की प्रमाणिकता उच्च कोटि की होती है। देश में विभिन्न आपातकालीन परिस्थितियों में स्वयंसेवक तत्काल सेवा कार्य में लग जाता है। चाहे बाढ़ हो? चाहे भूकंप हो? चाहे महामारी अथवा अन्य परिस्थितियाॅं। देश में चीन से 1962 में युद्ध के दौरान स्वयंसेवकों ने अद्वितीय कार्य किया था। मैं यहाॅं कानपुर रेल दुर्घटना का उल्लेख कर रहा हूॅं। मैं परमपूज्य सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी द्वारा लिखित पुस्तक यशस्वी भारत का अध्ययन कर रहा था। उन्होंने बतलाया कि कानपुर में रेल दुर्घटना हुई तो तत्काल स्वयंसेवक पहुॅंच गये अन्य सामाजिक संगठन एवं व्यक्ति पहुॅंचे। बाद में पुलिस पहुॅंची। स्थानीय पुलिस ने उद्घोषणा की इस स्थान पर मात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवक रहे। बाकी लोग स्थान छोड दें। ये है स्वयंसेवकों एवं संघ की प्रमाणिकता एवं स्वीकार्यता।
शाखा में प्रेम से आइये, प्रेम से जानिये ......?
संघ शाखा में जाना है तो जैसा मैने कहा शाखा में आइये। जब इच्छा हो आईये, जब इच्छा हो जाइये। जैसे ईश्वर को प्रेम से जाना जा सकता है। वैसे तो कर्म एवं ज्ञान मार्ग से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन प्रेम सार्वभौमिक उपाय हैं इस संबंध में कुछ पंक्तियाॅं प्रस्तुत कर रहा हूॅं
सेसः गणेश, महेशः, दिनेश, सुरेसहु जाहिं निरंतर गावें।
जाहि अनादि, अनंत, अखंड, अछेद, अभेद, सुवेद बतावे ।।
नारद से सुक व्यास रटे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावे।
ताहि अहीर की छौछरिया, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै।।
अर्थात् ईश्वर प्राप्ति का सबसे सहज सरल मार्ग भक्ति मार्ग है। उसी प्रकार संघ को जानना, समझना केवल और केवल शाखा ही है।
वंदे मातरम्

लेखक - डाॅ. विनोद मिश्रा, आरएएल विवि सागर के कुलगुरू हैं