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RSS Centenary Film Shatak: A Journey of Silent Sad

संघ शताब्दी वर्ष: मौन साधना का दृश्यांकन है शतक

संघ के शताब्दी वर्ष पर बनी फिल्म ‘शतक’ मौन साधना, राष्ट्र निर्माण और आलोचनाओं के बीच संघ की यात्रा को परदे पर उतारती है. तथ्य देखिए, सोचिए और निष्कर्ष तय कीजिए.


संघ शताब्दी वर्ष मौन साधना का दृश्यांकन है शतक

विवेक कुमार पाठक

जो संगठन समाज को जोड़ने का, देशव्यापी सामाजिक समरसता का विचार देता हो; जो 31 दिसंबर की न्यू ईयर लेट पार्टियों को विदा देकर उदयाचल सूरज को अर्घ्य देने का संस्कार नवसंवत्सर की भोर को देता हो; जो ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ का शाखाओं में जयगान करते हुए भगवा ध्वज को गुरु मानता हो; जिसके स्वयंसेवक हालिया कोरोना की वैश्विक महामारी में मृत्यु की परवाह न करते हुए देशभर में स्वास्थ्य शिविरों और सेवा कार्यों में प्रशंसनीय रूप से जुटे रहते हों उस संगठन का जन्म प्रसंग और ध्येय की कथा भला कौन न जानना चाहेगा।

भारत में आज जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम और काम से कतई नहीं जानता, वह संभवतः आज के भारत को नहीं जानता। संघ को और अधिक जानने की जिज्ञासा का समाधान देती है हाल ही में आई फिल्म शतक. शतक सौ वर्षों की यात्रा होती है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में विजयादशमी पर नागपुर में स्थापना के बाद 2025 में पहुंचकर यह मील का पत्थर तय कर लिया है। ऐसे में संघ को दृश्य माध्यम से देखने का अवसर है शतक। आकाश हमारी दृष्टि तक सीमित नहीं है, वैसे ही संघ के बारे में सीमित समझ से संघ की महान यात्रा कम नहीं हो जाती।

इतिहास में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और गुरु माधव सदाशिव गोलवलकर भारत के वे महान सपूत रहे हैं, जो आजीवन मौन साधना करते रहे। शतक फिल्म में हम देखते हैं कि डॉ. हेडगेवार ने परतंत्र भारत में ऐसा क्या-क्या कमतर देखा कि उन्होंने भारत के लिए नागरिक निर्माण की इस महान संस्था की स्थापना की और संघ शक्ति कलियुग का विचार समाज को दिया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े कालखंड में एक संस्थागत विचार-कार्य आगे बढ़ा, मगर उस समय गरम दल से लेकर सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और वीर सावरकर सहित अनेक नायक भी रहे। शतक फिल्म में आप बालक से युवा और प्रौढ़ अवस्था तक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का हिंदू समाज की दशा पर चिंता, चिंतन और कर्म कौशल देखते हैं। कैसे पहले कांग्रेस में रहकर और आगे जाकर अपनी मौलिक दृष्टि से संघ की स्थापना के माध्यम से समाज को एकजुट कर सेवा कार्य किए जाते हैं।

उस दौर में अधिकांशतः ब्रिटेन में पढ़कर आए महापुरुषों ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, लेकिन इसी बीच भारतीयता की कमी को पूरा करते हुए डॉ. हेडगेवार का योगदान सामने आता है। अंग्रेजी नीतियों और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व के कारण जब हिंदू समाज संकट में आया, तब संघ के कार्यकर्ता बंगाल और देश के अन्य अशांत क्षेत्रों में डटे रहे।

संघ 2026 में अगर करोड़ों कार्यकर्ताओं की शक्ति का प्रतीक है, तो प्रारंभिक वर्षों का विरोध और अस्वीकार्यता डॉ. हेडगेवार ने कैसे झेली होगी शतक फिल्म उस कालखंड का चित्र खींचती नजर आती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि पहले उपहास होता है, फिर विरोध, और अंत में दृढ़ संकल्प को स्वीकार कर लिया जाता है। शतक फिल्म के पहले उत्तरार्द्ध में हम डॉ. हेडगेवार की उस मौन साधना और उनकी निरंतर सामाजिक स्वीकार्यता को देखते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड में डॉ. हेडगेवार और उनके निधन के बाद गुरु गोलवलकर से गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, स्वामी अरविंद, कश्मीर के राजा हरिसिंह आदि के संवाद उस समय की विभिन्न घटनाओं पर कड़े कटाक्ष और गहरी बातें सामने रखते हैं। जो नेतृत्व करता है, उससे गलतियां होती ही हैं। सौ साल पूरे होने पर आज सर्वाधिक मुखर आलोचना और यहां तक कि घृणा को भी, राजनीति में न होते हुए भी, संघ शांति से सुनते हुए अपने कार्य में लगा हुआ है।

यदि आज की आलोचनाओं को मान्यता दी जाती है, तो तत्कालीन नेतृत्व के फैसलों की भी गुण-दोषों के आधार पर आलोचना स्वीकार करनी होगी। आजादी के समय के असफल निर्णयों की आलोचना को सह न पाना समझ से परे है। गलतियां संभवतः भगवान से ही नहीं होतीं; आजादी के आंदोलन में आगे रहने वाले भी इंसान ही थे, भगवान नहीं। भगवान किसे और किस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बनाया गया इस पर समाज समय-समय पर स्वतः विचार-चिंतन कर सच को सामने लाता रहा है। शतक फिल्म भी यही कहती है आप देखिए, तथ्यों को तौलिये और अपना चिंतन स्वयं तय कीजिए।

अभिव्यक्ति की आजादी आज नहीं थी, या आपातकाल में कब कितनी थी यह चिंतन शतक फिल्म अपने दूसरे हिस्से में दर्शक के सामने रखती है। संघ के सौ वर्षों में गुरु माधव सदाशिव गोलवलकर दूसरे महान नायक रहे हैं। बड़े लक्ष्य महान लोग तय करते हैं, और यह डॉ.जी और संघ का सौभाग्य रहा कि भगवा ध्वज को पूजने के लिए केशव को माधव अपने जीवनकाल में मिले।

डायरेक्ट एक्शन डे के नाम पर हिंदुओं पर बर्बरता, भारत विभाजन जैसे संकट काल में उनकी शांतचित्त तपस्या और स्वयंसेवकों का नेतृत्व शतक फिल्म में दिखाई देता है। गांधीजी की हत्या के बाद प्रतिबंध का सामना करते हुए गुरु गोलवलकर ने भय, हिंसा और बहिष्कार का चौतरफा सामना किया, मगर वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। उन्होंने कारागार में नागरिक निर्माण शुरू किया और समाज में शाखाओं के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण जारी रहा।

इसके चलते विरोध झेलने वाला संघ 1963 में गणतंत्र दिवस परेड के गौरव क्षणों का साक्षी बना। गोवा और दमन-दीव की आजादी के लिए संघ के प्रयास, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे की हानि को समय रहते समझना, युद्धकाल में सरकार के साथ खड़े रहना ये सभी प्रयास गुरु गोलवलकर के नेतृत्व में हुए, जिनके दृश्य शतक फिल्म में दिखाए गए हैं।शतक 100 वर्षों की यात्रा है। फिल्म में ‘भारत मां के बच्चे हम’ और ‘भगवा है अपनी पहचान’ का गौरवगान तीसरे सरसंघचालक रज्जु भैया तक पहुंचता है। इसलिए इस फिल्म में संघ की यात्रा का एक अर्द्धशतक ही देखने को मिलता है।

अजय देवगन की वॉयसओवर आवाज में यह फिल्म संकेत देती है कि भगवा ध्वज की यह यात्रा अगले हिस्से में पूरी होगी। फिलहाल यह फिल्म संघ के मौन तपस्वियों को जानने और समझने का एक सिनेमाई, सफल प्रयास है। संगीतकार सुखविंदर सिंह की आवाज में ‘भगवा है अपनी पहचान’ गीत पर सिनेमा हॉल में खड़े होकर सम्मान प्रकट करने की भावना स्वतः जाग उठती है। यह फिल्म रिलीज से पहले ही एक वैचारिक आह्वान बन चुकी है।

 

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