राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों के संदर्भ में शाजापुर जिले में संघ कार्य की शुरुआत, वीर अम्बाराम का बलिदान और स्वयंसेवकों के समर्पण की ऐतिहासिक यात्रा।
शाजापुर। मालवा के शाजापुर जिले में संघ की नींव सन् 1938 में रखी गई थी। शाजापुर जिले की पहली शाखा सन् 1944 में दिगम्बररावजी तिजारे द्वारा मक्सी में प्रारंभ की गई तथा दूसरी शाखा तिजारेजी एवं कमलाकरजी शुक्ल द्वारा हाथी बाड़ा झौंकर में प्रारंभ की गई। संघ के 100 वर्षों की यात्रा में बलिदानों की अनेक यश गाथाएं शामिल हैं लेकिन शाजापुर जिले की दूसरी शाखा प्रारंभकरने वाले मक्सी के समीपस्थ ग्राम झोंकर के वीर अम्बाराम की संघगाथा अनूठी, अद्भुत, अकल्पनीय, प्रेरक और संघ समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है।
सन् 1946 के संघ शिक्षा वर्ग में जाने के लिए ग्राम झोंकर जिला शाजापुर की सायं शाखा पर चर्चा हुई। स्वयंसेवकों के मध्य श्री अम्बाराम परिहार ने भी अपने जाने की स्वीकृति दी। नियत तिथि पर अपना सामान व बिस्तर पिठ बांधकर अम्बाराम घर से निकलने ही वाले थे कि पिताजी ने जाने से रोका और चेतावनी दी कि यदि तुम संघ शिक्षा वर्ग में गए तो मैं तुम्हारा सिर काट दूंगा। पिता की चेतावनी के बाद भी अम्बाराम संकल्पित होकर सामान उठाकर घर से जाने लगे तो पिता ने भी क्रोध में तलवार से वार किया और अम्बाराम वहीं ढेर हो गए। स्व. अम्बाराम परिहार का देश व धर्म पर बलिदान झौंकर के स्वयंसेवकों को धर्म व संस्कृति की रक्षा का अंतिम लक्ष्य समझा गया। द्वितीय सरसंघचालक मा. श्रीगुरुजी ने 1947 में उज्जैन के हनुमत बाग प्रवास पर झौंकर ग्राम को बलिदानी ग्राम की संज्ञा दी। उस समय संघ के गीतों में बलिदानी वीर अम्बाराम के नाम पर पंक्तियां गाई जाने लगीं। 'धर्म पर हुआ बलिदान वीर अम्बाराम ने भारत का डंका बजाया रे....'
सन् 1938 में शाजापुर में संघ की नींव रखने वाले बाबा साहेब मुल्ये (मुळे), जो कि इंदौर के रहने वाले थे, सरकारी नौकरी के निमित्त शाजापुर में पदस्थ थे। उन्होंने ही यहां संघ कार्य प्रारंभ किया था जो सोमवारिया बाजार स्थित तब के पोस्ट ऑफिस के पीछे वाले मैदान (जो कि वर्तमान में स्वर्णकार धर्मशाला वजीपुरा के पास) में एक सामन्य शाखा के रूप में शुरू हुआ था। बाद में श्री मुल्येजी यहां प्रचारक भी रहे। स्थानीय युवाओं को राष्ट्र रक्षा, धर्म रक्षा के लिए भी प्रेरित कर संगठित किया और संघ कार्य की नींव के लिए सुदृढ़ आधार तैयार करने में अपनी महती भूमिका निभाई। आज संघ की राष्ट्र साधना को शाजापुर जिले में 88 वर्ष बीत चुके हैं।
इस बीच शाजापुर में संघ को दिगंबरराव तिजारे के रूप में संघ समर्पित तपस्वी कार्यकर्ता का साथ मिला और उनके प्रयासों से संघ शाजापुर में उदित होकर भव्य संगठित स्वरूप लेने लगा। तिजारेजी प्रातः उज्जैन की शाखा में जाते, वहां से मक्सी में स्वयंसेवकों की बैठक लेते एवं वहीं से शाजापुर पहुंचकर पोस्ट आफिस मैदान की शाखा में आकर प्रार्थना में सम्मिलित होते और स्वयंसेवकों के साथ संघकार्य की योजना बनाते। शाजापुर में शाखा प्रारंभ होने के बाद आसपास के क्षेत्रों में भी संघकार्य का विस्तार होने लगा।
परिणामस्वरूप मक्सी, झोंकर, मंगलाज, किलोदा व शुजालपुर में संघ की शाखाएं लगने लगीं। शाजापुर जिले की पहली शाखा सन् 1944 में दिगम्बररावजी तिजारे द्वारा मक्सी में प्रारंभ की गई तथा दूसरी शाखा तिजारेजी एवं कमलाकरजी शुक्ल द्वारा हाथीबाड़ा झौंकर में प्रारंभ की गई।
गुरुजी का 1962 में आगमन
संघ के द्वितीय सरसंघचालक मा. माधव सदाशिव गोलवलकर श्रीगुरुजी का शाजापुर में प्रथम आगमन सन 1962 में हुआ। यहां उनका बौद्धिक कार्यक्रम जयस्तंभ (वर्तमान में शहीद पार्क) के खुले मैदान पर हुआ था, जिसमें मक्सी, बड़ोदिया, बैरछा, अकोदिया, शुजालपुर, आगर, नलखेड़ा, सुसनेर आदि आसपास के अनेक स्थानों से भी स्वंयसेवक पैदल चलकर आए और श्रीगुरुजी का प्रेरक मार्गदर्शन प्राप्त किया।
2008 में सुदर्शनजी का आगमन
तृतीय अवसर पर सन् 2008 में संघ के सरसंघचालक मा. कुप्प. सी. सुदर्शनजी का प्रांत कार्यकर्ता शिविर में आगमन हुआ। गिरवर समीप दुपाड़ा मार्ग स्थित वरिष्ठ स्वयंसेवक चिमनलालजी जैन के खेत पर यह आयोजन किया गया, जिसमें दो दिनों तक स्वयंसेवकों को पूज्य सरसंघचालकजी का सान्निध्य और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उक्त शिविर के आयोजन की तैयारियां तत्कालीन जिला संघचालक लोकेन्द्रसिंहजी सिसोदिया एवं नगर संघचालक हीरालालजी कसेरा सहित दायित्ववान स्वयंसेवकों द्वारा की गई। शाजापुर में संघ की 100 वर्षों की यात्रा में अनेक अमिट स्मृतियां और अविस्मरणीय किस्से हैं जिन्हें पीढ़ियां गर्व से दोहराती है। आज भी संघ का व्यापक कार्य शाजापुर जिले में खड़ा हो चुका है।
2 हजार स्वयंसेवक अपेक्षित थे, 2400 पहुंचे
शाजापुर जिले में 17, 18 व 19 नवंबर 1967 को मध्य भारत प्रांत का संघ का शीत शिविर पूर्ण गणवेश में आयोजित किया गया था। इस शिविर में प्रांत प्रचारक मा. सुदर्शनजी थे। शिविर में 2000 स्वयंसेवकों की अपेक्षा थी किन्तु यह संख्या बढ़कर 2400 हो गई। इस शिविर में लगभग 100 से अधिक स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में सम्मिलित हुए, वहीं श्रीसत्यमित्रानंदगिरिजी, राजमाता सिंधिया, तात्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्रकुमार सखलेचा की भी उपस्थिति रही। शिविर की तैयारी में एक पखवाडे से अधिक समय लगा, जिसमें जिला कार्यवाह मदनलालजी पांडे, नगर कार्यवाह कन्हैयालालजी भावसार के मागदर्शन में स्वयंसेवकों ने तैयारियां की। शिविर के दौरान जब स्वयंसेवकों का पथ संचलन निकल रहा था, उसका मार्ग बांध के ऊपर से था। स्वयंसेवकों की चलती हुई कतारों का दृश्य ऐसा था, मानों रामजी लंका पर चढ़ाई हेतु समुद्र के पुल को पार कर रहे हों।
तिजारेजी का कहना था- गांव-गांव तक संघ पहुंच गया है, लेकिन जब चड़स (कुएं से पानी निकालना) चलाता हुआ किसान संघ के गीत गाए तब मैं मानूंगा कि संघ कार्य सफल हुआ... वरिष्ठ स्वयंसेवक बताते हैं कि तिजारेजी अपने साथ सिर्फ कुछ चने लाते थे और चुपके से खाते थे। एक बार स्वयंसेवकों ने उन्हें देख लिया फिर उनके प्रवास के समय भोजन का प्रबंध किया गया। इसी क्रम में शाजापुर के प्रचारक रहे श्री संतोषजी त्रिवेदी एवं श्री दत्ताजी उननगांवकर जैसे समर्पित संघ अधिकारियों का अनुभवी मार्गदर्शन भी शाजापुर को मिला। पहले प्रतिबंध के समय जिले में स्वयंसेवकों ने भी सत्याग्रह किया, जिसमें करीब 40 स्वयंसेवक शामिल हुए। देश में जब आपातकाल लगा तब भी शाजापुर जिले के 50 से अधिक स्वयंसेवकों को मीसा के काले-कानून में बंदी बनाकर जेल में ठूंस दिया गया।