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RSS 100 Years: Dhar’s First Shakha in 1936

संघ कार्य के 100 वर्ष:धार नगरी में पहली शाखा 1936 में चिटनिस चौक में मुंबई के स्वयंसेवक मधुकर आगरकर ने लगाई

संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर धार में 1936 में शुरू हुई पहली शाखा का इतिहास चर्चा में। संगठन के विस्तार और प्रमुख कार्यकर्ताओं की भूमिका पर विशेष रिपोर्ट।


संघ कार्य के 100 वर्षधार नगरी में पहली शाखा 1936 में चिटनिस चौक में मुंबई के स्वयंसेवक मधुकर आगरकर ने लगाई

दीपक सिंह रघुवंशी

धार। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी 27 सितंबर सन् 1925 को की। इसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना था। तब से लेकर आज तक विजयादशमी पर 100 वर्ष की यात्रा संघ ने पूरी की। शाखा, सहयोग और संगठन के बल पर संघ का कार्य निरंतर बढ़ रहा है। इसी के साथ समाज में संघ की शक्ति और स्वीकारोक्ति बढ़ रही है। संघ की 100 वर्ष की यात्रा में धार नगर में संघ का प्रादुर्भाव सन् 1936 में हो गया था।

इतिहास प्रसिद्ध राजा भोज और उनकी भोजशाला के नाम से धार नगरी पहचानी जाती है। इसका मूल नाम धारा नगरी रहा है। धार जिले में संघ का कार्य सबसे पहले धार नगर से ही प्रारंभ हुआ। बाम्बे (अब मुंबई) से मधुकर आगरकर का धार नगर में अपने मामा के यहां आना हुआ। वे मुंबई में संघ के अच्छे कार्यकर्ता थे। यहां आने पर उनका परिचय वसंत रायते से हुआ और इसके कुछ दिन बाद ही सन 1936 में चिटनिस चौक में संघ की प्रथम शाखा लगना शुरू हुई।

उस समय धार की आबादी 25 हजार के आसपास थी और धार शाखा ने डॉक्टरजी द्वारा प्रस्तुत उक्त लक्ष्य को 1945 में ही प्राप्त कर लिया था। उस समय संपूर्ण धार नगर ही संघमय हो गया था। नगर में 20 शाखाएं लगा करती थीं। ये शाखा मुकाती चौक की मछली गली, चिटनिस चौक, धान मंडी में बांडे के बाड़े में, धारेश्वर मंदिर, हरिजन कॉलोनी, नौगांव, मल्लिकार्जुन, नयापुरा व बस स्टैंड के पीछे के मैदान आदि स्थानों पर लगा करती थीं। इनमें प्रभात, सायं व रात्रि शाखाएं थी। इनमें से 2-4 शाखाओं को छोड़कर शेष सभी शाखाओं की उपस्थिति 100 से अधिक होती थी। कार्यकर्ताओं पर संघ का काम करने की धुन सवार थी और नित नए लोगों को शाखा पर लाने की होड़-सी लगी रहती थी। लेकिन इस सबके कारण शाखा के कार्यक्रमों व अनुशासन में कोई ढील नहीं बरती जाती थी। स्वयंसेवक कर्तव्य के प्रति कठोर थे। नगर ही नहीं, धार जिले के सभी कस्बों व ग्रामीण क्षेत्रों में भी शाखा का जाल शीघ्रता से फैलने लगा था। तोरनोद, तिरला, देदला, बोधवाड़ा, अमझेरा, कुक्षी, दिग्ठान, बदनावर आदि अनेक स्थान शाखायुक्त हो गए थे।

धार नगर की प्रारंभिक शाखा के स्वयंसेवक : मनोहर निगम, हरिभाऊ वाकणकर, नारायणराव पुराणिक, अरविंद धारकर, वसंत रायते, अमल कुमार बसु, कुशाभाऊ ठाकरे, शांताराम येवतीकर, बालू भैया, श्यामराव पुराणिक, जनार्दन छाया, शशिकांत छाया।

संघ शिक्षा वर्ग: घार से संघ शिक्षा वर्ग करने गए सबसे पहले स्वयंसेवक हैं अमल कुमार बसु, अरविंद धारकर। इन दोनों ने सन् 1936 में संघ शिक्षा वर्ग किया था। संघ विपरीत हालातों और प्रतिबंधों को झेलकर भी 100 वर्ष से सतत शाखा के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण के कार्य में लगा है। उसी का प्रतिफल है कि आज सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संघ की प्रसिद्धि केवल देश में ही नहीं, अपितु विश्वभर में है। संघ आज अपने राष्ट्र निर्माण की इस यात्रा के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है। समाज में आशा-उम्मीद और जाग्रति का अलख जगा रहा है।

धार में द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी का प्रवास

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी का प्रवास धार नगर में प्रथम बार सन 1944 में हुआ था। उस समय दशहरा मैदान पर प्रकट उत्सव में श्री गुरुजी का बौद्धिक धारवासियों को सुनने को मिला था। कार्यक्रम के पूर्व गणवेशधारी स्वयंसेवकों का संचलन नगर में निकला था। इसके बाद सन् 1952, सन् 1964 में भी पुनः श्री गुरुजी का धार आगमन हुआ था। जब वे पहली बार धार प्रवास पर आए, तब उनके निवास की व्यवस्था राजेंद्रजी धारकर के यहां रखी थी, लेकिन बाद में दोनों समय में द्वारका प्रसादजी खत्री के यहां ठहरे थे।

पढ़ाई छोड़कर संघ प्रचारक निकले ठाकरे

श्री कुशाभाऊ ठाकरे ने सन 1942 में संघ के शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण लिया और अपना पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और संघ को समर्पित कर दिया। उन दिनों संघ के शिक्षा वर्ग को ओटीसी' नाम से जाना जाता था। ओटीसी के बाद ठाकरेजी अपनी पढ़ाई छोड़कर संघ के प्रचारक निकल गए। पढ़ाई छोड़ने, संघ का प्रचारक बनने की अनुमति परिवार से मांगी, जो सहज ही मिल गई और 1942 से उनका संघ जीवन पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में हो गया। हनुमानजी ने कहा था 'रामकाज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम'। संभवतः यही मंत्र ठाकरेजी का था- 'संघ काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम'। सुन्दरलाल पटवा, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और कैलाश जोशी जैसे सुपरिचित व्यक्तित्वों को उनकी युवा आयु में ठाकरेजी ने ही संघ से जोड़ा था। आगे चलकर श्री कुशाभाऊ ठाकरे 1998 से 2000 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

धार से अमलजी ने बंगाल में खड़ा किया काम

श्री अमल कुमार बसु 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन और 1948 के संघ के प्रतिबंध काल में जेल भी गए। संघ से प्रतिबंध हटने के बाद श्री एकनाथ रानडेजी के आग्रह पर श्री गुरुजी ने उन्हें बंगाल भेज दिया। इसके पूर्व वे मध्यप्रदेश के जबलपुर में विभाग प्रचारक थे। बंगाल में दे 1950 में सहप्रांत प्रचारक और फिर प्रांत प्रचारक बनाए गए। श्री बसु बंगाल में संघ कार्य के स्तभ थे।

1985 में बालासाहेब देवरसजी आए

31 जनवरी 1985 को कुक्षी में तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरसजी का आगमन जनजातीय बंधुओं के लिए ही हुआ था। महीनेभर इस कार्यक्रम की तैयारी चली। कुक्षी प्रवास पर स्वयंसेवकों का पथसंचलन भी रखा गया था। 799 गणवेशधारी स्वयंसेवकों ने कुक्षी के मार्गों से संचलन किया। उनके पीछे-पीछे लगभग 1000 की संख्या में जनजातीय बंधु पारंपरिक वेशभूषा में अपने वाद्य बजाते हुए तीर-कमान धारण किए हुए चल रहे थे।

पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर उपाख्य हरिभाऊ वाकणकर

डॉ. वाकणकर जी ने अपना समस्त जीवन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में अर्पित किया। उन्होंने अपने अथक शोध द्वारा भारत की समृद्ध प्राचीन संस्कृति व सभ्यता से सारे विश्व को अवगत कराया। इन्होंने 'सरस्वती नदी भारतवर्ष में बहती थी', इसकी अपने अन्वेषण में पुष्टि करने के साथ-साथ इस अदृश्य हो गई नदी के बहने का मार्ग भी बताया। इनके शोध के परिणाम सम्पूर्ण विश्व को आश्चर्यचकित कर देने

बाले हैं। आर्य-द्रविड़ आक्रमण सिद्धान्त को झुठलाने बाली सच्चाई से सबको अवगत कराने का महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित किया। आप भारत के एक प्रमुख पुरातत्वविद् थे। उन्होंने भोपाल के निकट भीमबेटका के प्राचीन शिलाचित्रों का अन्वेषण किया। अनुमान है कि यह चित्र 1,75,000 वर्ष पुरानें हैं। इन चित्रों का परीक्षण कार्बन डेटिंग पद्धति से किया गया, इसी के परिणामस्वरूप इन चित्रों के काल-खंड का ज्ञान होता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस समय रायसेन जिले में स्थित भीम बैठका गुफाओं में मनुष्य रहता था और वो चित्र बनाता था। सन 1975 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।




 

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