राजनीति में गिरती भाषा पर बहस तेज। खड़गे के बयान पर विवाद, नेताओं की शब्द मर्यादा और लोकतांत्रिक गरिमा को लेकर सवाल उठे।
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी बहसों, असहमतियों और वैचारिक विविधता में निहित है, लेकिन जब यही असहमति व्यक्तिगत हमलों और अमर्यादित भाषा में बदलने लगे, तो यह लोकतंत्र की गरिमा पर सवाल खड़े करती है। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 'आतंकवादी' जैसे शब्द का इस्तेमाल इसी गिरते स्तर की एक चिंताजनक मिसाल है।
सबसे पहला सवाल यही है कि क्या किसी भी विपक्षी नेता चाहे वह कितना ही वरिष्ठ और अनुभवी क्यों न हो, को देश के प्रधानमंत्री के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग करना चाहिए? जवाब स्पष्ट है-नहीं। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है, लेकिन वह तथ्यों और नीतियों तक सीमित रहनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत अपमान तक। प्रधानमंत्री केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पद है, जिनसे देश की संस्थागत गरिमा जुड़ी होती है। ऐसे में इस तरह की भाषा न केवल व्यक्ति विशेष पर, बल्कि उस पद की गरिमा पर भी आघात करती है।
कांग्रेस की राजनीति में यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के कई नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के लिए 'चायवाला', 'मौत का सौदागर', 'जहरीला साप' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह प्रवृत्ति अब एक 'पैटर्न' बन चुकी है, जैसा कि भाजपा नेताओं ने भी आरोप लगाया है। सवाल यह है कि क्या इस तरह की भाषा से कांग्रेस को कोई राजनीतिक लाभ मिला है? इतिहास बताता है कि इसका उल्टा असर ही हुआ है, जनता ने बार-बार ऐसी भाषा को नकारा है और इसे अहंकार व हताशा के रूप में देखा है। किरण रिजिजू और निर्मला सीतारमण द्वारा चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराना भी इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्थागत स्तर तक पहुंच गया है।
भाजपा का यह कहना कि 'प्रधानमंत्री का अपमान पूरे देश का अपमान है, भले ही राजनीतिक प्रतिक्रिया हो, लेकिन इसमें एक व्यापक भावना भी झलकती है कि सार्वजनिक जीवन में शब्दों की एक मर्यादा होनी चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खड़गे ने बाद में अपने बयान से सफाई दी और कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री को 'आतंकवादी' नहीं कहा। लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति ही क्यों पैदा होती है, जहां सफाई देनी पड़े? क्या यह नेताओं की भाषा पर नियंत्रण की कमी नहीं दर्शात्ता? एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों को तौलकर बोलें, क्योंकि उनके बयान का व्यापक प्रभाव पड़ता है।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि केवल आक्रामक भाषा से राजनीतिक जमीन नहीं बनती। अगर पार्टी वास्तव में भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला करना चाहती है, तो उसे ठोस नीतियों, वैकल्पिक दृष्टिकोण और सकारात्मक एजेंडा के साथ सामने आना होगा। व्यक्तिगत हमले न केवल राजनीतिक विमर्श को दूषित करते हैं, बल्कि पार्टी की विश्वसनीयता को भी कमजोर करते हैं। यह मामला केवल कांग्रेस या भाजपा का नहीं है, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र का है।
यदि आज एक नेता इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है, तो कल दूसरा भी उसी राह पर चलेगा। इससे लोकतंत्र की बहसें और अधिक विषाक्त हो जाएंगी। राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है। विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सरकार की आलोचना करें, लेकिन यह आलोचना गरिमापूर्ण और तथ्य आधारित होनी चाहिए। अन्यथा, यह केवल शोर बनकर रह जाती है, जिसका न तो लोकतंत्र को लाभ होता है और न ही जनता को।