नोएडा और दिल्ली हादसों ने तंत्र की सोच उजागर की। क्यों लोक से पहले वीआईपी को तरजीह मिलती है, और बदलाव अब क्यों ज़रूरी है
उमेश चतुर्वेदी
हमने जिस प्रशासनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है, उसमें तंत्र की जवाबदेही लोक के प्रति होनी चाहिए। हम चाहे जितना भी गर्व करें, लेकिन तंत्र की जवाबदेही के केंद्र में लोक के बजाय अभिजात्य है। यही वजह है कि संकट के क्षणों में हमारे तंत्र की लोक के प्रति जैसी त्वरित भूमिका होनी चाहिए, वह निभाता नहीं दिखता।लेकिन यदि इसी तंत्र को पता चले कि लोक के बीच कोई अभिजात्य पहचान, कोई महत्वपूर्ण नेता, उद्योगपति या सेलिब्रिटी भी संकटग्रस्त है, तो उसकी प्रतिक्रिया त्वरित और गहन हो जाती है। तंत्र की सोच की यही खोट है कि संकटग्रस्त आम आदमी के लिए त्वरित प्रतिक्रिया अपवादस्वरूप ही दिखाई देती है।
‘आर्ट ऑफ द स्टेट सिटी’ के रूप में विकसित हो रहे नोएडा में इंजीनियर युवराज की लापरवाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मेल से खोदे गए गहरे गड्ढे में डूबने से हुई मौत हो या फिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ठीक बीच में जल निगम के गड्ढे में गिरने से हुई कमल की मौत, ये घटनाएं सिर्फ भ्रष्टाचार और लापरवाही ही नहीं, बल्कि तंत्र की सोच को भी उजागर करती हैं।एक मिनट के लिए कल्पना कीजिए कि नोएडा में गड्ढे में गिरे युवराज की जगह, आधुनिक शब्दावली में कहें तो किसी वीआईपी का बेटा होता, कोई सेलिब्रिटी होता या किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्ती का परिजन होता, तो क्या तंत्र उसी तरह खड़ा रहता, जिस तरह वह खड़ा रहा और युवराज डूबता रहा।
इसी तरह यह भी सोचिए कि क्या दिल्ली के बीचों-बीच जल निगम के लिए खोदे गए गड्ढे में गिरे कमल की जगह किसी नेता का बेटा, किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी का बच्चा या किसी बड़े कारोबारी का बेटा होता, तो क्या पुलिस की प्रतिक्रिया वही होती, जैसी इस मामले में रही।कमल के घरवालों ने देर रात ही पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन पुलिस का जवाब आम दिनों की तरह था सुबह आना। दिल्ली पुलिस का ध्येय वाक्य है, ‘सदैव आपके साथ’। लेकिन उसका यह ‘सदैव’ सिर्फ वीआईपी के लिए होता है, आम लोगों के लिए नहीं। अगर पुलिस उसी समय सक्रिय होती, अगर उसने सीसीटीवी फुटेज देखे होते, तो क्या कमल की तलाश उस वक्त तक नहीं पहुंच जाती?
कमल के गड्ढे में गिरने की जानकारी एक राहगीर ने पास ही स्थित एक कैफे के सुरक्षा गार्ड को दी थी। सुरक्षा गार्ड ने जल बोर्ड के कर्मी योगेश को जानकारी दी। योगेश ने ठेकेदार राजेश प्रजापति को फोन किया। राजेश घटनास्थल पर आया, लेकिन पुलिस को किसी ने सूचना नहीं दी।कैफे का गार्ड हो, जल बोर्ड का कर्मी हो या ठेकेदार सभी ने इस घटना को सामान्य तौर पर लिया। किसी ने संजीदगी नहीं दिखाई। सिर्फ इसलिए कि उनके चेतन-अवचेतन में कहीं न कहीं यह बात बैठी हुई थी कि गिरने वाला कोई वीआईपी थोड़े ही है, कि कुछ बड़ा होगा। सबने सोचा, देर रात हो गई है, चलो सो जाते हैं।
नागरिक हों या कर्मचारी, या फिर तंत्र का जिम्मेदार तबका इस तरह की सोच हमारी सामाजिक और शासन व्यवस्था का कड़वा सच है। सवाल यह है कि क्या हमने लोकतंत्र की जो कल्पना की थी, उसके तहत ऐसी घटनाओं और ऐसी सोच की परिणति की कल्पना की थी?उदारीकरण के बाद हमने आर्थिक चमक-दमक बढ़ाने के साथ शहरीकरण पर जोर दिया है। शहरीकरण ने आर्थिक लाभ-हानि की बुनियाद पर आगे बढ़ने वाली हमारी सोच को विकसित किया है। ग्रामीण सभ्यता वाले अपने देश को हम पूरी तरह शहरीकृत करने की कोशिश में जुटे हैं। शहर यानी सभ्यता का पाठ हमने पढ़ लिया है और उसी को हकीकत बनाने पर तुले हुए हैं।
आधुनिक लोकतंत्र को अगर शहरीकृत लोकतंत्र कहें तो इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए। शहरीकृत लोकतंत्र की इस अवधारणा को जाने-अनजाने हमारे मीडिया ने भी बढ़ावा दिया है। व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानने की बजाय हमने उसकी पृष्ठभूमि को अहम मान लिया है।मीडिया भी जब शहरों में होने वाली दुर्घटनाओं और घटनाओं को रिपोर्ट करता है, तो वह हैरतअंगेज अंदाज में दिखाने की कोशिश करता है कि अगर शहर में ऐसा हो गया, तो बाकी देश का क्या हाल होगा। लोकतंत्र में वोट चाहे शहर के मतदाता का हो या गांव के मतदाता का, उसकी कीमत बराबर है।लेकिन जब यही लोकतांत्रिक व्यवस्था व्यक्तियों के साथ अलग-अलग तरह से व्यवहार करने लगती है, तो बराबरी की यह अवधारणा टूट जाती है। फिर शहरी नागरिक को ग्रामीण लोक की तुलना में अधिक तरजीह दी जाने लगती है। ऐसा करते वक्त यह भान नहीं रहता कि भारत का समूचा इतिहास चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो या सांस्कृतिक ग्रामीण व्यवस्था केंद्रित रहा है।
ऐसा नहीं है कि गांवों में दुश्मनियां नहीं रहीं, लेकिन गांवों की सोच की बुनियाद आधुनिक शहर-केंद्रित सोच की तुलना में हमेशा ज्यादा उदार रही है। यह उदारता आज भी दिखाई देती है। जब किसी गांव की नहर में कोई कार गिर जाती है, तो पूरा गांव उसे निकालने दौड़ पड़ता है। जब नदी में कोई महिला आत्महत्या के लिए कूद जाती है, तो वहां का लोक उसे बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देता है। कहीं आग लग जाती है, तो लोग फायर ब्रिगेड का इंतजार नहीं करते, अपनी बाल्टी-कटोरे लेकर आग बुझाने में जुट जाते हैं।गांधी भारतीय गांवों की इस गहन सोच को समझते थे। इसीलिए उन्होंने संविधान में व्यक्ति की बजाय गांवों को मूल इकाई बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन चाहे बाबा साहब आंबेडकर हों या पंडित जवाहरलाल नेहरू, उन्होंने इसे दकियानूसी और पिछड़ी सोच बताकर खारिज कर दिया।
दीनदयाल उपाध्याय ने भी जिस लोकतंत्र की कल्पना की, उसके मूल में लोक ही है। उसी के प्रति जवाबदेही है। दीनदयाल जिस अंत्योदय की बात करते हैं, वह अंतिम व्यक्ति लोक ही है। संविधान ने भारतीय नागरिक को व्यवस्था की मूल इकाई माना है, लेकिन इस इकाई का महत्व सिर्फ वोट हासिल करने तक सीमित रह गया है।जब ट्रीटमेंट का सवाल आता है, तो हमेशा लोक और आम पर वीआईपी, ग्रामीण पर शहरी को तरजीह दी जाती है। इसी कारण संकट के क्षणों में तंत्र की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। जैसे ही तंत्र को पता चलता है कि संकट में कोई वीआईपी है, वह बिजली की गति से सक्रिय हो जाता है। सिर्फ राहत के लिए ही नहीं, वीआईपी की सहूलियत के लिए भी।लेकिन जब संकटग्रस्त लोक होता है, तो कई बार उसकी अनदेखी कर दी जाती है और कई बार उस पर मिट्टी डाल दी जाती है।
नोएडा की घटना हो या दिल्ली का हादसा, इन दोनों ने एक बार फिर तंत्र की इसी खामी की ओर इशारा किया है। जांच होगी, भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए कदम उठाए जाएंगे। दोषियों और जवाबदेह लोगों को दंडित करने की बातें भी होंगी, लेकिन यहां भी पृष्ठभूमि का असर दिखेगा। अधिकारी बच जाएंगे और लीपापोती के लिए एकाध निचले तबके के कर्मचारी को दंडित कर दिया जाएगा।फिर इसे भुला दिया जाएगा। फिर तंत्र उसी ढर्रे पर काम करेगा। कुछ समय बाद फिर वैसा ही हादसा होगा और फिर वही पुरानी प्रतिक्रिया। जब तक हम अपने तंत्र की सोच से वीआईपी संस्कृति को खत्म नहीं करेंगे, जब तक लोक को सही मायने में प्रतिष्ठित नहीं करेंगे, और जब तक नौकरशाही को लोक के प्रति जवाबदेह बनाने की सोच के साथ प्रशिक्षित नहीं करेंगे, तब तक बुनियादी बदलाव संभव नहीं है।
आजादी की अस्सीवीं सालगिरह नजदीक आ रही है। इस मौके पर हमें पीछे मुड़कर देखना होगा और अपने तंत्र की सोच में मौजूद खामियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हम सच में सोचने और इन खामियों को दूर कर तंत्र में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार हैं?