शिया मस्जिदों पर हमले पाकिस्तान की वैचारिक बीमारी उजागर करते हैं। यह सिर्फ आतंकी समस्या नहीं, पहचान और सोच का गहरा संकट है
बलबीर पुंज
बीते दिनों 6 फरवरी 2026 को इस्लामाबाद की खादिजा-तुल-कुबरा शिया मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान आत्मघाती विस्फोट हुआ। इसमें 36 लोगों की जान चली गई और 160 से अधिक घायल हो गए। यह केवल एक आतंकी घटना नहीं थी, बल्कि उस गंभीर बीमारी का लक्षण थी, जो लंबे समय से पाकिस्तान और मजहब-आधारित विचारधारा के भीतर पल रही है, जहां गैर-मुस्लिमों के साथ मुसलमान भी मुसलमानों के निशाने पर हैं।
यह सिलसिला नया नहीं है। नवंबर 2024 में पराचिनार में शिया जुलूस पर हमला हुआ, जिसमें 44 लोग मारे गए। यह हमला उस समय हुआ, जब पैगंबर मोहम्मद साहब की बेटी हजरत फातिमा की याद में जुलूस निकाला जा रहा था। मार्च 2022 में पेशावर की कुचा रिसालदार शिया मस्जिद में विस्फोट हुआ, जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए। 2015 में शिकारपुर की शिया मस्जिद पर हुए हमले में जुमे की नमाज पढ़ रहे 61 लोगों की मौत हुई थी। 2013 में क्वेटा दो बड़े धमाकों से दहल उठा था, जिनमें 200 से अधिक लोग, जिनमें अधिकांश शिया थे, मारे गए। ऐसी हृदयविदारक घटनाओं की एक लंबी सूची है।
पाकिस्तान में लगभग चार करोड़ शिया मुसलमान रहते हैं। पिछले दो दशकों में इस्लाम के नाम पर किए गए जिहादी हमलों में 4,000 से अधिक शिया मुसलमान मारे जा चुके हैं। ये दर्दनाक मौतें केवल प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि उस जहरीली सोच का स्वाभाविक नतीजा हैं, जिसका आधार ही असहिष्णुता और घृणा है।
हर बड़ी आतंकी घटना के बाद पाकिस्तान की सत्ता का एक परिचित तरीका सामने आता है दोष बाहर ढूंढो। इस्लामाबाद की शिया मस्जिद पर हुए हालिया जिहादी हमले के बाद भी बिना ठोस प्रमाण के भारत और अफगानिस्तान पर आरोप मढ़ दिए गए। जबकि यह समस्या आयातित नहीं है। वास्तव में, यह हिंसा उस वैचारिक अधिष्ठान से प्रेरित है, जिसकी नींव पर पाकिस्तान नाम के कृत्रिम देश का जन्म हुआ और उसी से खुराक लेकर वह एक राष्ट्र के रूप में जीवित रहने की कोशिश कर रहा है।
‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ और ‘अहल-ए-सुन्नत वॉल जमात’ जैसे समूह खुले मंचों से लगातार शिया-विरोधी भाषण देते रहे हैं। सितंबर 2020 में कराची में हजारों सुन्नी कट्टरपंथियों ने रैली निकाली थी, जिसमें शिया मुसलमानों के खिलाफ नारे लगाए गए और उन्हें ‘ईशनिंदक’ बताते हुए गला काटने की मांग की गई। ऐसे खुलेआम प्रदर्शन इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में हुए। पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान ने वैचारिक बाध्यता के अनुरूप जिहादियों से सीधे टकराने के बजाय उनसे बचने या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग करने का रास्ता चुना।
2020 में पाकिस्तानी पंजाब में पारित ‘तहफ्फुज-ए-बुनियाद-ए-इस्लाम कानून’ इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसमें इस्लामी मामलों में केवल सुन्नी दृष्टिकोण को एकमात्र सत्य माना गया और अन्य मुस्लिम विचारधाराओं, शिया सहित, को ईशनिंदा के समकक्ष ठहरा दिया गया। इस चिंतन का एक वीभत्स रूप 2022 में सामने आया, जब डेरा इस्माइल खान में तीन महिला शिक्षकों ने ईशनिंदा के आरोप में अपनी ही एक सहयोगी शिक्षिका की गला रेतकर हत्या कर दी, सिर्फ इसलिए क्योंकि एक छात्रा ने बताया था कि उसने सपने में उस शिक्षिका को ईशनिंदा करते देखा है।
आखिर पाकिस्तान में ऐसा क्यों हो रहा है? इसका उत्तर उस चिंतन में छिपा है, जिसमें आतंकवादियों को ‘अच्छे और बुरे’ में वर्गीकृत किया जाता है। जब जिहादी भारत या इजरायल को निशाना बनाते हैं, तो वे पाकिस्तान में ‘नायक’ कहलाते हैं। लेकिन जब वही आतंकी अपनों को डसने लगते हैं, तो पाकिस्तान स्वयं को ‘आतंकवाद का पीड़ित’ बताने लगता है। क्या यह सच नहीं है कि दोनों ही स्थितियों में हमलावर एक ही विषाक्त मानसिकता से प्रेरित होते हैं?
पाकिस्तान का अक्सर तर्क रहा है कि भारत मुसलमानों के लिए सुरक्षित नहीं है। सच्चाई इस झूठ से कोसों दूर है। 1947 में भारत में लगभग तीन करोड़ मुसलमान थे, जबकि आज उनकी संख्या 22 से 24 करोड़ के बीच है। वे लोकतंत्र में भाग लेते हैं, चुनाव लड़ते हैं और शासन-प्रशासन, सेना, शिक्षा तथा व्यापार में उनकी सक्रिय भागीदारी है। बहुसंख्यकों की तरह उन्हें समान, और कई मामलों में अधिक, संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।
भारत के खाड़ी देशों, जो अधिकांशतः इस्लामी हैं, से मजबूत संबंध हैं। मोदी सरकार के दौरान ये रिश्ते और अधिक प्रगाढ़ हुए हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों की संख्या लगातार घटती गई है। उनकी महिलाएं मजहबी यातनाओं का शिकार होती हैं। हिंदू, सिख जैसे अल्पसंख्यक सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हैं। अहमदिया समुदाय को संवैधानिक रूप से गैर-मुस्लिम घोषित किया गया है। यह अंतर केवल नीतियों का नहीं, बल्कि वैचारिक दृष्टिकोण का भी है।
पाकिस्तान में पहचान का संकट भी उसकी समस्याओं के केंद्र में है। उसका सत्ता-वैचारिक अधिष्ठान अपनी प्राचीन और बहुलतावादी सनातन विरासत से दूरी बनाता है। जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक निरंतरता के बजाय अपनी जड़ों को ही नकार देता है, तो वह भ्रम और कुंठा से घिर जाता है। एक ओर पाकिस्तान आधिकारिक रूप से गांधार की बौद्ध विरासत को अपनी ऐतिहासिक धरोहर मानता है, वहीं दूसरी ओर उन इस्लामी आक्रांताओं गजनवी, गोरी, बाबर, औरंगजेब, अब्दाली, टीपू सुल्तान को भी अपना नायक बताता है, जिन्होंने मजहबी जुनून में इन्हीं सनातन प्रतीकों को रौंदा था।
दुनियाभर के मुसलमानों, भारत सहित, के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि जिसे अक्सर इस्लामी पहचान का प्रतीक माना जाता है, वह पाकिस्तान अपने जन्म से ही औपनिवेशिक शक्तियों का प्यादा रहा है, जिसका उल्लेख मैं इसी कॉलम में तथ्यों के साथ कर चुका हूं। क्या मस्जिद में नमाज पढ़ते मुसलमानों की मजहब के नाम पर सह-धर्मियों द्वारा हत्या को जायज ठहराया जा सकता है? यह केवल कानून और सुरक्षा का नहीं, बल्कि वैचारिक चिंतन का भी प्रश्न है।
जब नफरत सामान्य हो जाती है, तो हिंसा असामान्य नहीं रह जाती। जम्मू-कश्मीर में कुछ शिया प्रदर्शनकारियों ने यही सवाल उठाया है “मस्जिदों में नमाज पढ़ते मुसलमानों को मारना कैसा जिहाद है?” किसी भी राष्ट्र की स्थिरता उसकी विविधता को संभालने की क्षमता पर निर्भर करती है। सह-अस्तित्व, कानून का समान संरक्षण, अपनी जड़ों और पहचान का सम्मान तथा नफरत के खिलाफ स्पष्ट रुख ये किसी भी आधुनिक और शांतिप्रिय देश की मूल शर्तें हैं। क्या पाकिस्तान इनमें से किसी पर भी खरा उतरता है?