लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और राहुल गांधी पर सब्सटेंसिव मोशन की सियासत ने संसद को नए विवाद में डाल दिया है
अवधेश कुमार
भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंच गई है, जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है, जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है, तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन (स्वतंत्र और मूल प्रस्ताव) की तैयारी है। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है।
भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी, किंतु लगता है कि गंभीर विमर्श के बाद सब्सटेंसिव मोशन की पहल की गई है। सब्सटेंसिव मोशन, विशेषाधिकार हनन से अधिक गंभीर हो सकता है। यह एक स्वतंत्र और मूल प्रस्ताव होता है, जिसमें किसी सांसद के विरुद्ध उसके स्पष्ट आचरण या निर्णय को आधार बनाया जाता है। इस पर चर्चा और मतदान होता है, तथा पारित होने पर सदन का आधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है।अर्थात संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद पद के अनुकूल है या नहीं, उसे सांसद बने रहना चाहिए या नहीं, भविष्य में उसे चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहींजैसे प्रश्नों पर निर्णय संभव होता है। इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है। यहां तक कि चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा भी की जा सकती है।
तो इसे कैसे देखा जाए? राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि वे डरने वाले नहीं हैं। 24 दिसंबर 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी, यह याद किया जाना चाहिए। एक टेलीविजन चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का अवसर तक नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी।अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है। अविश्वास प्रस्ताव लंबित रहने और उसके निपटारे तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया। यही बाध्यता किसी सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते हैं और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जा सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर मार्च में बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग के पास बहुमत है, इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। लेकिन यही स्थिति सब्सटेंसिव मोशन पर लागू नहीं होती। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है।कांग्रेस के भीतर और उनके समर्थकों में इससे कोई विशेष चिंता दिखाई नहीं देती। उलटे वे यह कहते हुए प्रफुल्लित हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और सब्सटेंसिव मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द होगी। यदि सोच ऐसी है, तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं।
बजट सत्र के पहले दिन को छोड़कर, आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के भीतर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस का विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा तय करना कहा जाएगा? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से क्या इसे पूरी तरह जायज माना जा सकता है? क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?यदि किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होती है, तो जनता में उसके प्रति सहानुभूति भी पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न खड़े हो सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है कि जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चलाया गया, उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सेवा परीक्षा पास करने तक पर सवाल उठाए गए। कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उन्हें लिखा गया पत्र देखिए वह चरित्रहनन से कम नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेरकर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लेकर खड़ी थीं। माहौल को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया, क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था। पापिस्टन फाइल को लेकर लगाए गए निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं हैं? किसी फाइल में किसी का नाम आना यह सिद्ध नहीं करता कि वह किसी अपराध में सहभागी है। पापिस्टन फाइल का मुख्य विषय अवयस्क बालक-बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार है। यह जानते हुए भी यदि कोई उनके संपर्क में है, तो उसे दोषी माना जा सकता है।जिस तरह राहुल गांधी और उनके सहयोगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं, उसे चरित्रहनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। संकेतों में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में हैं क्योंकि फाइल में अभी बहुत कुछ है, अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि आखिर क्या दर्शाता है? यही संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि प्रधानमंत्री दबाव में हैं और इसलिए देश का सौदा कर रहे हैं।
लोकसभा अध्यक्ष को ऐसी कठिन स्थिति में डालने की कोशिश की जा रही है कि उनके लिए निर्णय लेना ही मुश्किल हो जाए। ओम बिरला यहां एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमामय पद पर आसीन हैं। व्यक्तिगत रूप से उनसे मतभेद हो सकते हैं, नापसंदगी भी हो सकती है, लेकिन पद का सम्मान और उस पर विश्वास करना नेताओं और संसद का प्राथमिक दायित्व है। यदि यह भी नहीं निभाया जाएगा, तो इसे क्या कहा जाए? यह सब शर्मनाक है।हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए। यह भी एक रणनीति हो सकती है, ताकि वे यह कह सकें कि उन्होंने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए हस्ताक्षर नहीं किए। रणनीति यह भी हो सकती है कि किसी तरह अध्यक्ष को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखा जाए और अपना एजेंडा सदन के माध्यम से प्रचारित व स्थापित किया जाए।
जब एक पक्ष लगातार सीमा का उल्लंघन करता रहेगा, तो दूसरे पक्ष से भी वैसी ही प्रतिक्रिया आ सकती है। सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तकें, जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न उठाए गए हैं, उसी की प्रतिक्रिया मानी जा सकती हैं। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा पर दुष्प्रचार किया, और अंततः ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण तक नहीं हो सका। परिणामस्वरूप आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया।राष्ट्रीय राजनीति का स्तर यहां तक नहीं गिरना चाहिए था, जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?यदि राहुल गांधी के समर्थकों को यह गलतफहमी है कि बहस और चर्चा का एजेंडा सेट करना ही बड़ी उपलब्धि है, तो एसआईआर और चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार का मुद्दा उठाया परिणाम सामने हैं। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था, परिणाम देख लीजिए।
लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया, जब वे वेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, किसी आदेश या नियमन का पालन नहीं कर रहे थे। सामान्य सभा की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला-चिल्लाकर कागज फेंके जाएंगे, तो स्वाभाविक रूप से रोष उत्पन्न होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता.सदन संचालन के नियम और परंपराएं होती हैं। जो लोग इन्हें हर हाल में रौंदने पर उतारू हों, उनके विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला लेना ही पड़ता है।