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Nitish Kumar Exit Raises Questions

सवालों के घेरे में नीतीश की विदाई ​​​​​​​

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की संभावित विदाई पर कई सवाल उठ रहे हैं। गठबंधन की राजनीति, जदयू का भविष्य और बिहार की आर्थिक चुनौतियों पर नई बहस शुरू।


सवालों के घेरे में नीतीश की विदाई
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उमेश चतुर्वेदी

दो दशकों से बिहार की सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार की विदाई को लेकर सियासी गलियारों में जितनी हैरत जताई जा रही है, सवाल भी उतने ही उठ रहे हैं। बीस साल से कुछ ज्यादा वक्त से लगातार बिहार की सत्ता में बने रहे नीतीश का सियासी स्वभाव ही सवालों और आश्चर्य की वजह बना है। नीतीश ने जब से सत्ता संभाली है, उन्होंने कभी ऐसा जाहिर नहीं किया कि वे सत्ता से दूर हो सकते हैं। बीच में जीतन राम मांझी को नौ महीने के लिए सत्ता सौंपकर संन्यासी और बीतरागी जैसा दिखने की कोशिश उन्होंने जरूर की, लेकिन वह सिर्फ दिखावा था। सत्ता का असल सूत्र उनके ही हाथ था। जब लगा कि मांझी उस सूत्र को काटकर स्वाधीन पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उस धागे को काटकर सत्ता खुद थाम ली थी।

नीतीश सत्ता को इतनी आसानी से छोड़ देंगे, इस पर आसानी से भरोसा न करने की वजह उनका अतीत रहा है। कभी जीन्स विवाद तो कभी किसी दूसरी वजह से उन्होंने अपनी पुरानी सहयोगी बीजेपी को छोड़ उस लालू का हाथ दो-दो बार थाम लिया, जिनके विरोध की बुनियाद पर ही उनकी राजनीति परवान चढ़ी। फिर जब उन्हें लगा कि लालू का साथ उनकी सियासी नैया को डुबो देगा, तो फिर बीजेपी की ओर लौटने में भी उन्होंने देर नहीं लगाई। यह सियासी आवाजाही हर हाल में सत्ता पर पकड़ बनाए रखने की उनकी चाहत का ही प्रतीक लगती है। इसी वजह से उनकी विदाई को सहजता से स्वीकार करना कठिन हो रहा है।

राजनीति का एक चरित्र है। अपने कदमों को लिए वह जिन कारणों को गिनाती है, हकीकत में वे कारण होते ही नहीं। नीतीश ने भी कहा है कि वे चाहते थे कि संसद के दोनों सदनों और विधानमंडल के दोनों सदनों के सदस्य बनें। विधानमंडल और लोकसभा के वे सदस्य रह लिए हैं, लेकिन राज्यसभा के वे सदस्य कभी रहे नहीं। इसलिए वे बिहार की राजनीति छोड़ राज्यसभा का सदस्य बनने जा रहे हैं। हो सकता है कि नीतीश की यह चाहत रही हो, लेकिन उनके बिहार को छोड़ने के पीछे का यह सच अधूरा है।विगत दो साल में नीतीश कुमार की जुबान कई बार फिसली है। उनकी हरकतें भी कई बार हास्यास्पद रही हैं। नीतीश की छवि ऐसे गंभीर शख्सियत की रही है, जो नाप-तोलकर बोलता है। इसी छवि ने गाहे-बगाहे फिसलती रही जुबान और उल-जलूल हरकतों के बावजूद उनके प्रति लोगों का सम्मान कम नहीं होने दिया है। इसी छवि के चलते विगत के बिहार चुनाव में एनडीए को भारी जीत भी मिली। लेकिन इसके साथ ही यह भी मान लिया गया कि इन चुनावों के बाद नीतीश की विदाई भी हो सकती है।

यह कहना मुश्किल है कि बीजेपी और जनता दल (यू) ने तय किया हो कि चुनाव बाद नीतीश हट जाएंगे या हटा दिए जाएंगे। लेकिन जिस तरह से नीतीश ने खुद को बिहार से दूर किया है, उससे लगता है कि दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच ऐसी समझ विकसित हो चुकी थी। चूंकि इसकी भनक बाहर नहीं लग पाई थी, इसलिए यह बदलाव लोगों को आसानी से पच नहीं रहा।नीतीश ने जिस जनता दल (यू) को सींचकर खड़ा किया है, उसका भी चरित्र कुछ-कुछ कांग्रेस की तरह हो गया है। जिस तरह नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस को एक रखने का चुंबक है, नीतीश ही जनता दल (यू) के लिए उसी तरह के चुंबक हैं। बेशक राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन, संजय झा, विजय चौधरी और अशोक चौधरी नीतीश के बेहद करीब हैं, लेकिन इन चारों की समूचे जनता दल (यू) में स्वीकार्यता नहीं है।

जदयू को एक नीतीश रख सकते हैं या उनके बेटे निशांत। जदयू को एक रखने के लिए निशांत का राजनीति में आना जरूरी है। राजनीति में उनके प्रवेश की अटकलें करीब दो वर्षों से लगाई जा रही हैं। नीतीश की छवि परिवारवाद विरोधी नेता की भी है। बिहार की राजनीति के केंद्र में उन्हें लाने के पीछे लालू के परिवारवाद पर उनका तीखा हमला भी रहा है। ऐसे में नीतीश के बाद सीधे निशांत की ताजपोशी उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती थी। लिहाजा निशांत को उत्तराधिकार सौंपने के लिए ऐसी राह चुनी गई है, जिससे नीतीश को कम से कम नुकसान हो।इसलिए वे दिल्ली में राज्यसभा की शोभा बढ़ाने जा रहे हैं, जबकि बिहार की सत्ता में नंबर दो की पोजिशन संभालने की बात सामने आ रही है। इस कदम से निशांत को सीधे बिहार की सत्ता मिल भी नहीं रही और जदयू पर पकड़ के लिए मजबूत रस्सी भी थमाई जा रही है।बिहार इन दिनों आर्थिक संकट से गुजर रहा है। जीविका दीदियों के खाते में अब तक 18 हजार 100 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। दो साल में करीब दो लाख कर्मचारियों की भर्ती के बाद राज्य का वेतन खर्च 70 हजार करोड़ से ज्यादा हो चुका है। पेंशन खर्च 35 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है। राज्य का बजट तीन लाख 67 हजार करोड़ का है। इसमें से 65 फीसदी खर्च प्रतिबद्ध खर्च है, यानी विकास और योजनाओं पर सीमित गुंजाइश बचती है।

राज्य की आर्थिक स्थिति की गड़बड़ी के चलते लालू राज के बाद पहली बार वित्त विभाग को आदेश देना पड़ा है कि कर्मचारियों के वेतन खर्च के अलावा कोई भुगतान न किया जाए। नीतीश को यह कठिनाई पता है। माना जा रहा है कि बीजेपी को सत्ता सौंपने के पीछे उनका मकसद यह भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में राज्य के इस आर्थिक संकट का बोझ सत्ता में रहने वालों को उठाना पड़ेगा।हो सकता है कि अपने सहयोगियों के हाथ में सत्ता होने के चलते बिहार को मोदी सरकार की ओर से केंद्रीय मदद भी मिल जाए। 1967 में आठ राज्यों में बनी संविद सरकारों में बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ ने समाजवादी दलों का साथ दिया था। मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल को छोड़ दें तो हर राज्य में वह समाजवादी दलों की सहयोगी रही। समाजवाद के साथ शुरू बीजेपी की यात्रा में धीरे-धीरे समाजवादी दलों का जनाधार छीजता चला गया। इस तरह उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया।बीजेपी की इस वर्चस्ववादी यात्रा की राह में नीतीश का जनता दल (यू) और नवीन पटनायक का बीजू जनता दल रोड़ा रहा है। उड़ीसा के पिछले चुनाव में बीजेपी पटनायक को पटखनी दे चुकी है और अब नीतीश कुमार ने खुद ही कुर्सी खाली कर दी है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि बिहार में बीजेपी का अगुआ बनने का सपना पूरा होने जा रहा है।

नीतीश अब बिहार की सत्ता का अतीत हैं। उनकी उपलब्धियां भी कम नहीं हैं। पहले दो कार्यकाल तक यानी 2015 तक उन्होंने बिहार को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया। नीतीश की एक और उपलब्धि यह रही कि लगातार बीजेपी का साथ होने के बावजूद उन्होंने अपनी सरकार का समाजवादी स्वरूप बनाए रखा।सुशासन और सरकार के समाजवादी स्वरूप के चलते नीतीश की राष्ट्रव्यापी छवि बनी। हालांकि उन्होंने बिहार से बाहर अपना संगठन खड़ा करने की गंभीर कोशिश नहीं की। एक बार अरुणाचल में जदयू के 11 विधायक चुने गए थे, लेकिन उन्हें सहेजने में नीतीश की दिलचस्पी नहीं रही। इससे दुखी होकर विधायक एक-एक कर पार्टी छोड़ते गए।2023 में इसी छवि के चलते उन्होंने इंडिया गठबंधन बनाने की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस का अहं उनकी राह में आड़े आ गया। अगर कांग्रेस ने अपने नेतृत्व को आगे रखने की चाहत का बलिदान किया होता और नीतीश को संयोजक बना दिया होता, तो शायद इतिहास कुछ अलग होता।

 

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