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प्राकृतिक चिकित्सा दिवस:स्वस्थ जीवन के लिए अपनाएं प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा दिवस:स्वस्थ जीवन के लिए अपनाएं प्राकृतिक चिकित्सा

श्रीराम माहेश्वरी

प्राकृतिक चिकित्सा दिवसस्वस्थ जीवन के लिए अपनाएं प्राकृतिक चिकित्सा

कृति के साथ जुड़कर प्रचलित होने की प्राचीन विधि है प्राकृतिक चिकित्सा। प्रकृति का उद्भव पांच तत्वों से हुआ है। ये तत्व हैं-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। हम सभी जीवों और प्राणियों में ये पांचों तत्व पाए जाते हैं। मनुष्य इन तत्वों का संतुलन बनाए रखते हुए जीवनशैली अपनाए, यही प्राकृतिक चिकित्सा है। यह सत्य है कि प्रकृति में जब इन पांच महाभूतों का संतुलन बिगड़ता है, तो प्राकृतिक आपदाएं आती हैं और इससे जनधन हानि होती है। इसी तरह शरीर में इन पांच तत्वों का असंतुलन होने पर हम बीमार पड़ जाते हैं।

आदिकाल से ही भारतवर्ष में प्राकृतिक चिकित्सा का प्रचलन रहा है। हमारे ऋषि-मुनि इसे अपनाते रहे हैं। सात्विक भोजन, व्रत, उपवास, सप्ताह में एक दिन लवणहीन भोजन, राम नाम स्मरण—ये उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। वे कल्पवास और तीर्थ स्थलों का भ्रमण करते थे। ध्यान, योग और व्यायाम तथा संयमित जीवनशैली अपनाकर वे दीर्घायु होते थे।

प्राकृतिक चिकित्सा में योग आसनों का विशेष महत्व है। अनेक बीमारियों में अलग-अलग आसन बताए गए हैं। ये आसन प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा किए गए सफल प्रयोग का प्रतिफल हैं। देखा जाए तो योग और प्राकृतिक चिकित्सा एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों का ध्येय है कि बिना किसी तीव्र औषधि के शरीर को स्वस्थ रखा जाए।

योग के आसनों द्वारा शरीर की नाड़ियों में जमा विषैले तत्वों को पिघलाकर मल और मूत्र के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। वहीं प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा इन विजातीय तत्वों को एनिमा और कुंजल क्रिया के माध्यम से बाहर निकालने की विधि अपनाई जाती है। योग आसनों में शरीर में प्राणवायु को बढ़ाने और कार्बन को नियंत्रित करने पर जोर होता है, जबकि प्राकृतिक चिकित्सा में संयमित और संतुलित आहार द्वारा शरीर को स्वस्थ रखा जाता है।

आसन से शरीर में ऊर्जा पैदा होती है और शरीर लचीला बनता है, वहीं प्राकृतिक चिकित्सा से शरीर को पुष्ट बनाया जाता है। इस प्रकार योग और प्राकृतिक चिकित्सा से मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा की कई विधियां हैं, जैसे-आहार चिकित्सा, जल चिकित्सा, मिट्टी चिकित्सा, सूर्यकिरण चिकित्सा तथा मालिश चिकित्सा। इस चिकित्सा के माध्यम से लोगों के रहन-सहन की आदतों में थोड़ा बदलाव लाकर उन्हें स्वस्थ रहना सिखाया जाता है।

आहार चिकित्सा में अंकुरित अनाज, मौसम अनुसार ताजे फल और पत्तेदार सब्जियां शामिल होती हैं। उत्तम स्वास्थ्य के लिए हमारा भोजन 20 प्रतिशत अम्लीय तथा 80 प्रतिशत क्षारीय होना चाहिए।

जल चिकित्सा में स्वच्छ और शीतल जल से स्नान करना, स्वच्छ जल का सेवन करना तथा शरीर और आयु अनुसार जल की निर्धारित मात्रा लेना शामिल है।

मिट्टी चिकित्सा के अंतर्गत शरीर पर मिट्टी का लेप करना और चोट आदि में मिट्टी से उपचार करना शामिल है। योगीजन मिट्टी को शरीर पर लेप करते हैं, जिससे उन्हें सर्दी और गर्मी की अनुभूति न्यूनतम होती है। इसका कारण यह है कि मिट्टी में सर्दी और गर्मी को रोकने की शक्ति होती है। मिट्टी दुर्गंध को रोकती है। मिट्टी से शरीर को साफ करने के बाद स्वच्छ जल से स्नान किया जाता है। महिलाएं बाल धोने में भी मिट्टी का प्रयोग करती हैं। मिट्टी पृथ्वी तत्व है और इसमें सबको आत्मसात कर लेने की शक्ति होती है। इसमें अनेक रोगों को दूर करने की क्षमता भी है। उदाहरण स्वरूप, हिरण जब किसी हिंसक जीव से घायल होता है, तो वह जल के पास कीचड़ में लेट जाता है। कीचड़ चोट स्थान पर लगा रहता है। बाद में वह जल में जाकर उसे धो लेता है। इस प्रकार वह स्वयं शरीर की चिकित्सा करता है। अन्य जीव-जंतु भी इसी तरह प्राकृतिक तरीके अपनाकर स्वस्थ रहते हैं।

वायु चिकित्सा में हम विभिन्न योग आसनों द्वारा श्वास ग्रहण करते हैं। यह प्राणवायु है जो हमें जीवन देती है। शुद्ध और स्वच्छ वायु से मनुष्य स्वस्थ रहता है, जबकि प्रदूषित वायु बीमार करती है।आकाश तत्व चिकित्सा के अंतर्गत उपवास करके शरीर को स्वस्थ रखा जाता है।

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