मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सार्वजनिक जीवन की भाषा और आचरण जिस स्तर तक गिरते दिख रहे हैं, वह केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चेतावनी भी है। शिवपुरी जिले की पिछोर विधानसभा सीट से विधायक प्रीतम लोधी का हालिया व्यवहार इसी गिरावट का ताजा और बेहद चिंताजनक उदाहरण बनकर सामने आया है।
एक जनप्रतिनिधि द्वारा खुले मंच से एक पुलिस अधिकारी, वह भी आईपीएस अधिकारी-को धमकाना, अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और भीड़ के दम पर दबाव बनाने की चेतावनी देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता। यह प्रकरण केवल एक बयान या व्यक्तिगत टकराव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक मानसिकता की ओर इशारा करता है जिसमें सत्ता को कानून से ऊपर मान लिया जाता है। एसडीओपी आयुष जाखड़ के संदर्भ में की गई अपमानजनक टिप्पणियां और 'गोबर से बंगला भर देने' जैसी भाषा न केवल असभ्य और निंदनीय है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की गरिमा को खुलेआम चुनौती देने जैसा है।
स्थिति की गंभीरता इस बात से और बढ़ जाती है कि यह विवाद एक सड़क हादसे से जुड़ा हुआ है, जिसमें विधायक के पुत्र दिनेश लोधी पर लोगों को टक्कर मारने और बाद में दबंगई दिखाने के आरोप लगे हैं। यह पहला अवसर नहीं है, जब पिता-पुत्र का नाम विवादों में आया हो; पूर्व में भी दोनों के खिलाफ कई आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आ चुकी है। ऐसे में अपेक्षा यही थी कि एक जनप्रतिनिधि कानून के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचय देते, न कि जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते।
भारतीय पुलिस सेवा संघ का इस मामले में खुलकर सामने आना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब यह मुद्दा व्यक्तिगत दायरे से आगे बढ़कर संस्थागत सम्मान और
सुरक्षा से जुड़ चुका है। यदि कानून लागू करने वाले अधिकारी ही खुद को असुरक्षित महसूस करने लगें, तो यह किसी भी राज्य की प्रशासनिक सेहत के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल अब भारतीय जनता पार्टी के सामने खड़ा होता है। पार्टी पहले भी प्रीतम लोधी को अनुशासनहीनता के मामलों में चेतावनी दे चुकी है, लेकिन पुनः इस तरह के आचरण सामने आना यह दर्शाता है कि केवल चेतावनी पर्याप्त नहीं है। हालांकि, इस पूरे प्रकरण को लेकर पार्टी संगठन भोपाल से लेकर दिल्ली तक खासा चिंतित और असहज है। संगठन के भीतर इस बात पर गंभीर मंथन चल रहा है कि इस तरह की घटनाएं पार्टी की छवि और साख को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचा सकती हैं।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का दायित्व केवल सत्ता का उपभोग करना नहीं, बल्कि कानून के प्रति आस्था और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना होता है। यदि जनप्रतिनिधि ही भय, दबाव और असम्मान की राजनीति को बढ़ावा देंगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक प्रवृत्ति का रूप ले सकता है। अब समय आ गया है कि राजनीति में मर्यादा, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों को केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें ठोस और निर्णायक कार्रवाई के माध्यम से स्थापित किया जाए। तभी लोकतंत्र की गरिमा सुरक्षित रह पाएगी।