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Mamata Banerjee's protest: Voter list controversy

ममता बनर्जी की नौटंकी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर धरना दिया। चुनाव आयोग ने 58 लाख से अधिक नाम हटाए। विवाद प्रशासन और राजनीति का केंद्र बन गया।


ममता बनर्जी की नौटंकी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के धरने का वही हश्र हुआ जिसका अंदेशा पहले से ही था। इसे केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ महज नौटकी ही कहा जा सकता है। जब बिना किसी परिणाम के ही इस धरने को समाप्त करना था, तो आखिरकार पांच दिन तक यह नौटकी रची क्यों गई।

दरअसल, ममता बनर्जी को इस बात का डर है कि कहीं चुनाव आयोग उनके पाले-पोसे अवैध घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से न हटा दे, जो कि पश्चिम बंगाल में उनकी जीत का बड़ा कारण है। चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच टकराव का मुख्य कारण मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) है।हालांकि इसके पीछे चुनाव आयोग का मकसद मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाना है, ताकि मृत, स्थानांतरित या फर्जी नामों को हटाया जा सके। लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार ये अनावश्यक आरोप लगाए कि इस प्रक्रिया के माध्यम से लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है। जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि यह केवल मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाने की नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है।

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनावी लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदान का अधिकार केवल उन्हीं नागरिकों को मिले जो वास्तव में इसके पात्र हैं। पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान व्यापक स्तर पर सत्यापन किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी ने राजनीतिक विवाद खड़ा किया, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से यह चुनावी पारदर्शिता की दिशा में एक बेहद जरूरी कदम माना जाता है।चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक करीब 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची से हटाए गए। इनमें लगभग 24 लाख मृत मतदाता, 19 लाख स्थानांतरित लोग, 12 लाख लंबे समय से अनुपस्थित या अज्ञात पाए गए मतदाता, और लगभग 1.3 लाख डुप्लीकेट नाम शामिल हैं। इस प्रक्रिया के बाद राज्य के मतदाताओं की संख्या करीब 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 7.08 करोड़ रह गई। हालांकि बाद की समीक्षा में यह संख्या और बढ़ने की संभावना जताई गई और कुछ रिपोर्टों में कुल हटाए गए नामों का आंकड़ा 60 लाख से अधिक बताया गया।

इसी मुद्दे को लेकर ममता बनर्जी ने धरना शुरू किया था। पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक देती है। चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि राजनीतिक दल इस प्रक्रिया को अनावश्यक विवाद का विषय न बनाएं।यदि मतदाता सूची में त्रुटियां हैं, तो उन्हें सुधारना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया को राजनीतिक टकराव का हथियार बना दिया जाए, तो लोकतंत्र की साख पर सवाल उठ सकते हैं।जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग- इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है।

बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर एसआईआर जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।


 

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