संघ के शताब्दी वर्ष में महीपत बालकृष्ण चिकटे के जीवन पर विशेष। सादगी, समर्पण और राष्ट्र सेवा का अद्वितीय उदाहरण, जिन्होंने मौन रहकर समाज निर्माण में अहम योगदान दिया।
बरसात के बाद की उस सोंधी सुगंध चारों ओर फैली हुई थी। गाँव की कच्ची पगडंडी पर नंगे पाँव चलते एक दुबले-पतले किशोर की आँखों में अजीब-सी दृढ़ता झलक रही थी। हाथ में कुछ अखबारों के बंडल थे, और हृदय में एक संकल्प राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का। दूर से पुलिस के सायरन की आवाजें आ रही थी, पर उसके कदम नहीं डगमगाए। यह कोई साधारण बालक नहीं था, यह था महीपत बालकृष्ण चिकटे-जो आगे चलकर अपने कर्म, त्याग और निस्वार्थ भाव से एक अद्भुत कर्मयोगी के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
9 अगस्त 1930, रक्षाबंधन के पावन दिन जन्मे चिकटे जी का जीवन प्रारंभ से ही संघों की अग्निपरीक्षा से गुजरा। मात्र एक वर्ष की आयु में मातृछाया छिन गई और किशोरावस्था में ही पितृसाया भी उठ गया। किंतु इन आघातों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि भीतर एक अदम्य संकल्प और आत्मबल का निर्माण किया। विद्यालयीन जीवन में ही उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ और वही उनके जीवन का पथ बन गया एक ऐसा पथ, जिस पर वे अंतिम क्षण तक अडिग और सक्रिय रहे।
1948 का वह समय, जब संघ पर प्रतिबंध लगा था, देश के वैचारिक संघर्ष का कालखंड था। 'सुदर्शन' नामक पत्र के प्रकाशन और उसके वितरण का कार्य किसी चुनौती से कम न था। तब किशोर अवस्था में ही चिकटे जी ने नेतृत्व संभाला। स्वयंसेवकों की टोली के साथ उन्होंने इस दायित्व को निभाया। परिणामस्वरूप उन्हें सत्याग्रह के आरोप में बंदी बनाया गया, पर उनके साहस और प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई। यह उनके व्यक्तित्व की पहली झलक थी जहाँ भय का स्थान केवल कर्तव्य ने ले लिया था।
वर्ष 1955 में उन्हें भिंड जिले के रौन ग्राम भेजा गया, जहाँ उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाज निर्माण का बीड़ा उठाया। लोकमान्य तिलक विद्यालय की स्थापना केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्रचेतना का केंद्र बना। आगे चलकर उसी बीज ने महाविद्यालय का रूप लिया यह उनकी दूरदृष्टि और संगठन क्षमता का प्रमाण था।
चिकटे जी केवल एक शिक्षक नहीं थे, वे ज्ञान के साधक थे। मराठी और हिन्दी के साथ-साथ तमिल, बांग्ला, मणिपुरी, असमी जैसी अनेक भाषाओं पर उनकी पकड़ थी। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें असम भेजा गया, जहाँ उन्होंने जनजातीय भाषा को लिपि देने का कार्य किया यह केवल भाषाई योगदान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का महान प्रयास था।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। राष्ट्रधर्म और 'पांचजन्य' जैसे प्रतिष्ठित पत्रों में उन्होंने अटल जी और दीनदयाल उपाध्याय जी के साथ कार्य किया, किंतु जीवन भर उन्होंने अपने योगदान का कोई उल्लेख नहीं किया। यह उनकी विनम्रता का सर्वोच्च रूप था। महीपत बालकृष्ण चिकटे का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा कर्मयोगी वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के, निष्ठा और समर्पण के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। वे स्वयं में एक संस्था थे एक ऐसी प्रेरणा, जो मौन रहकर भी पीढ़ियों को मार्गदर्शन देती है।
सादगी और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण
चिकटे जी का जीवन सादगी और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण था। वे कार्यकर्ताओं के बीच रहते, उनके सुख-दुख में सहभागी बनते और बिना किसी आडंबर के सेवा करते। प्रसिद्धि, मंच और सम्मान से उन्होंने सदैव दूरी बनाए रखी। ग्वालियर में नागरिक सहकारी बैंक की परिकल्पना को साकार करने के बाद वे चुपचाप पीछे हट गए जैसे कोई दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश दे और फिर मौन हो जाए।