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महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती: राष्ट्र और सुधार का स

जयंती आज: स्वराष्ट्र, स्वभाषा के प्रबलतम पक्षधर थे महर्षि दयानंद सरस्वती

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती पर जानिए उनके विचार, आर्य समाज की स्थापना और स्वराष्ट्र-स्वभाषा के उनके प्रखर संदेश।

जयंती आज स्वराष्ट्र स्वभाषा के प्रबलतम पक्षधर थे महर्षि दयानंद सरस्वती

सुधांशु टाक

महान समाज सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन, स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन और सामाजिक समरसता के लिए कार्य कर समाज सुधार की नई क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने देश में स्वराज्य तथा आज़ादी की भावना को सुदृढ़ किया। महर्षि दयानंद का आदर्श था. ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ अर्थात हम पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाएं, पूरे विश्व में श्रेष्ठ विचारों और मानवीय आदर्शों का संचार करें।

इसलिए 21वीं सदी में, जब आज विश्व अनेक विवादों में फंसा है, हिंसा और अस्थिरता से घिरा हुआ है, तब महर्षि दयानंद सरस्वती जी का दिखाया मार्ग करोड़ों लोगों में आशा का संचार करता है। उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम मूलशंकर तिवारी था। उनके माता-पिता यशोदाबाई और लालजी तिवारी समर्पित हिंदू थे। छोटी उम्र में ही उनमें आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई और उन्होंने मूर्ति पूजा, अनुष्ठानों तथा अंधविश्वासों पर प्रश्न उठाए।

19 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन त्यागकर वे सत्य की खोज में लगभग 15 वर्षों (1845–1860) तक एक तपस्वी के रूप में भ्रमण करते रहे। उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानंद से शिक्षा प्राप्त की, जिन्होंने उन्हें हिंदू धर्म में व्याप्त भ्रष्ट प्रथाओं को समाप्त करने तथा वेदों के सच्चे अर्थ को पुनर्स्थापित करने के लिए कार्य करने का आग्रह किया।जब महर्षि दयानंद जी का जन्म हुआ था, तब देश सदियों की गुलामी से कमजोर पड़कर अपनी आभा, अपना तेज और आत्मविश्वास, सब कुछ खोता चला जा रहा था। प्रतिपल हमारे संस्कारों, आदर्शों और मूल्यों को चूर-चूर करने की असंख्य कोशिशें होती रहती थीं। जब किसी समाज में गुलामी की हीन भावना घर कर जाती है, तो आध्यात्म और आस्था की जगह आडंबर आ जाना स्वाभाविक हो जाता है। मनुष्य के जीवन में भी देखा जाता है कि जो आत्मविश्वासहीन होता है, वह आडंबर के सहारे जीने की कोशिश करता है।

ऐसी परिस्थिति में महर्षि दयानंद जी ने आगे आकर वेदों के बोध को समाज जीवन में पुनर्जीवित किया। उन्होंने समाज को दिशा दी और अपने तर्कों से यह सिद्ध किया कि खामी भारत के धर्म और परंपराओं में नहीं है, खामी यह है कि हम उनके वास्तविक स्वरूप को भूल गए हैं और विकृतियों से भर गए हैं।

स्वराष्ट्र, स्वभाषा, स्वभूषा, स्वसंस्कृति और स्वतंत्रता के प्रबलतम पक्षधर महर्षि दयानंद सरस्वती ऐसे दिव्य राष्ट्रपुरुष थे, जिनका संपूर्ण चिंतन और कार्य जहां आध्यात्मिकता से ओतप्रोत था, वहीं राष्ट्र उनके लिए सर्वोपरि था। महर्षि दयानंद मानते थे कि व्यक्ति की सर्वांगीण उन्नति ‘स्व’ से ही प्रारंभ होती है। किसी भी क्षेत्र की पराधीनता व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए अधोगति का कारण बनती है। पराधीन व्यक्ति चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता।

भारतवर्ष की स्वाधीनता के लिए एकदम साफ और बुलंद शब्दों में आवाज उठाने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति महर्षि दयानंद ही थे। इसके लिए कष्ट और अमानवीयता की सीमा तक यातनाएं सहने वाले अधिकांशतः व्यक्ति देव दयानंद के अनुयायी और पथानुगामी ही थे। महर्षि दयानंद ने पुनर्जागरण का नया युग प्रारंभ किया। वे लाखों लोगों के लिए आशा की किरण बन गए।

वे चाहते थे कि उनके द्वारा शुरू किया गया कार्य उनके बाद भी जारी रहे और उनके सपने साकार हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1875 में बंबई में औपचारिक रूप से आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज कोई नया धर्म या संप्रदाय नहीं है, बल्कि यह एक सुधार आंदोलन और सामाजिक-धार्मिक संगठन है। इसका उद्देश्य लोगों को अंधविश्वासों और अवैदिक मान्यताओं से दूर ले जाकर वेदों की ओर वापस लाना है। आर्य समाज मिलावट-रहित मूल मानव धर्म, अर्थात सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटने का आह्वान करता है। आज उनकी जयंती पर उनकी पुनीत आत्मा को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।