परिवार ही पहली पाठशाला है, जहाँ बच्चा मातृभाषा के माध्यम से संस्कार, संबंध और ‘स्व’ का बोध प्राप्त करता है। मातृभाषा व्यक्ति को अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक सरोकारों से जोड़ती है
परिवार को व्यक्ति की प्रथम पाठशाला के रूप में स्वीकार किया गया है.. क्योंकि यहीं से अबोध बालक शुरुआती दौर में मातृभाषा में ही अपनी जन्मदात्री मां को मां, आई आदि संबोधन देने का तुतलाती भाषा में प्रयास करता है... यही मातृभाषा की सबसे बड़ी ताकत भी है... लोकमाता देवी अहिल्याबाई की नगरी इंदौर में रविवार को मातृभाषा को लेकर दो विशिष्ट आयोजन हुए... जिसमें पहला भारतीय भाषा पर्व में सामाजिक विविधता का अनूठा संगम देखने को मिला.. तो दूसरी तरफ मातृभाषा हिंदी गौरव अलंकरण समारोह में सुधी वक्ताओं ने साहित्य-कला-संस्कृति और मातृभाषा से ही समाज-परिवार के अटूट संरक्षण का जो भाव निरंतर परिष्कृत होकर 'स्व' का बोध जागरण करता है... इस पर वक्ताओं ने बेबाक राय रखी... निश्चित रूप से मातृभाषा ही वह पहली सीढ़ी या कड़ी है.. जो व्यक्ति को न केवल अपने परिवार, समाज और देश से जोड़कर रखती है.. बल्कि उसके उत्तरोत्तर विकास एवं संस्कृति के संरक्षण में भी इसी मातृभाषा की महनीय भूमिका होती है...
विगत 21 फरवरी को हमने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया... राष्ट्रीय स्तर पर मातृभाषा को लेकर अनेक तरह के चिंताजनक आंकड़े और तथ्य सामने रखे गए... मातृभाषा से ही हमारी भारतीय भाषा, राजकीय भाषा, यहां तक कि स्थानीय स्तर पर दैनंदिनी कार्य-व्यवहार में उपयोग होने वाली बोली का भी हमारी भाषा व संस्कृति के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि यही घर-परिवार की मातृभाषा और बोलियां हमारे पर्व-संस्कृति, उत्सवधर्मिता, सामाजिक सरोकार और मनुष्य के सर्वांगीण विकास का एक तंत्र विकसित करती है...
जब तक व्यक्ति इनके संपर्क में रहकर इनसे संवाद की प्रक्रिया में रत रहता है, तब तक वह अपनी संस्कृति एवं सभ्यतागत संस्कारों-मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन में संवेदनशील और सतर्क बना रहता है, लेकिन जब मातृभाषा और बोली के साथ ही हमारे संपर्क-संवाद के उपयोग में आने वाली भाषा पर विदेशी या अंग्रेजी भाषाओं का शिकंजा कसता है.. तो इससे पारिवारिक विघटन का दायरा बढ़ता चला जाता है... इतिहास से सबक लेकर उन भूलों में सुधार जरूरी है, जिनके कारण हमने बहुत कुछ खोया, क्योंकि मुगलों और अंग्रेजों ने हम पर विदेशी भाषाएं थोपी... उसी की दुष्परिणिति रही कि हम शनैः-शनैः अपनी भाषा, वेशभूषा और संस्कार से दूर होते चले गए...
इसमें कोई दो राय नहीं है कि 'मदर' शब्द में वह संवेदना दूर-दूर तक नहीं जो 'मां' कहने में आती है... दैनिक जीवन में मातृभाषा के उपयोग जैसे घर-परिवार में अपनी मातृभाषा या बोल-चाल की भाषा में ही संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने, हस्ताक्षर मातृभाषा में ही करना और कुटुंब प्रबोधन की दृष्टि से हर तरह के व्यवहारगत संवाद प्रक्रिया में अपनी निज भाषा को अनिवार्य प्राथमिकता देना सही मायने में उस मातृभाषा का सम्मान बढ़ाकर समाज-परिवार और राष्ट्रीय सरोकार को भी सशक्त करने का आधार बन सकता है...
बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा अनिवार्य है... वे घर-परिवार और कुटुंब में जब मिलते-जुलते हैं तो अपने पारिवारिक संबंधों, उनके महत्व एवं उनसे जुड़े सामाजिक सरोकार को आत्मसात करने को मानसिक रूप से तैयार होते हैं... मातृभाषा की सबसे बड़ी विशेषता तो यही है कि उसे सीखने के लिए किसी विद्यालय या कोचिंग की आवश्यकता नहीं होती.. यह परिवार से मिलती है और इसी से परिवार, समाज और संपूर्ण कुटुंब के विचार-कार्य-संस्कृति का संवर्धन होता है...
जब व्यक्ति मातृभाषा से दूर होने लगता है तो उसी के साथ वह परिवार से भी दूरी बढ़ाने का कदम बढ़ा देता है... अतः भारतीय भाषा पर्व का संकल्प और संदेश तो यही है कि हम अपनी मातृभाषा को सतत् सशक्त बनाकर सांस्कृतिक भाव को अक्षुण्ण बनाए रखें...