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Kerala Story 2: Secularism, Progressivism Debate

फिल्म: द केरला स्टोरी 2: धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता के मूल अर्थ पर उठते प्रश्न

फिल्म केरला स्टोरी 2 के बहाने धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशीलता और लव जिहाद पर उठते सवाल। भारतीय दृष्टि से संतुलित विमर्श।


फिल्म द केरला स्टोरी 2 धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता के मूल अर्थ पर उठते प्रश्न

 डॉ. समीक्षा नायक

भारत धर्मनिरपेक्षता में निहित है-परंतु यह धर्मनिरपेक्षता 'धर्म विरोध' नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि में सर्वधर्म समभाव है। भारत की सभ्यता ने सदियों से विविध मतों, पंथों और परंपराओं को स्थान दिया है। यहां सभी धर्मों के प्रति सद्भाव, सहअस्तित्व और सम्मान की भावना रही है। यही सनातन सांस्कृतिक चेतना का मूल है। 27 फरवरी को प्रस्तावित फिल्म 'फेरल स्टोरी 2' चर्चा में है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम 'सेकुलर' और 'प्रोग्रेसिव' और 'लव जिहाद' जैसे शब्दों को समझें।

प्रगतिशीलता का भारतीय अर्थ-सामाजिक समानता, सभी के अधिकारों की रक्षा, सुधारवादी दृष्टिकोण और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर है परंतु यह समझना भी आवश्यक है कि ये विचार किसी बाहरी आयातित अवधारणा से नहीं आए, भारतीय सनातन चिंतन में भी 'वसुधैव कुटुम्बकम्', 'सर्वे भवन्तु सुखिनः और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना निहित रही है। अतः प्रगतिशीलता भारतीय परंपरा से विरोध नहीं, बल्कि उसका ही विस्तार है।

प्रगतिशीलता भारतीयत विचारों में आधुनिकता की तरह ही एक मिलावट है, जो हमारी नहीं पश्चिम की देन है, या लंबे समय तक उपनिवेशवाद का प्रभाव। लेकिन जब लव जिहाद जैसी अवधारणाएं सामने आती है तो सवाल उठता है की स्वतंत्रता और सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए और हर संबंध को केवल व्यक्तिगत चुनाव मान लिया जाए या इसके इतर सामाजिक, सांस्कृतिक आयामों पर भी विचार आवश्यक है, लव जिहाद शब्द सार्वजनिक विमर्श में 2009 के आसपास प्रमुखता से उभरा। वर्ष 2009 के शाहान शाह मामले में, केरल उच्व न्यायालय के न्यायमूर्ति के.टी. शंकरन ने राज्य सरकार को 'जबरन धर्मांतरण रोकने हेतु कानून बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहाः यह स्पष्ट है कि यह कुछ संगठनों के संरक्षण में किया जा रहा है.. यह व्यापक जनसमुदाय और सरकार के लिए अत्यंत चिंता का विषय होना चाहिए। यह टिप्पणी उस समय की जमानत याचिका (संख्या 5288/2009) के संदर्भ में थी, जिसमें कुछ आरोपियों पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगे थे। समय के साथ लव जिहाद शब्द एक राजनैतिक बहस का विषय बन गया, कुछ समूह इसे वास्तविक सामाजिक खतरे के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि अन्य इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का औजार बताते हैं।

'इस्लामोफोबिया' बनाम सत्पता यह इंद्र आज भी जारी है। उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में समय-समय पर धर्मांतरण से जुड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें पुलिस कार्रवाई भी हुई है। यह भी समझना आवश्यक है कि केवल मंदिर न जाना या पूजा न करना किसी व्यक्ति को स्वतः 'सेकुलर' सिद्ध नहीं करता। मनुष्य जिस

जीवन दर्शन, विचारों और जीवनशैली को बिना किसी दवाव समाज, संस्कृति और परिवेश में पला-बढ़ा होता है, उसकी छाप उसके विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप से प्रतिबिंवित होती है। भारतीयता केवल आचरण नहीं, एक सांस्कृतिक चेतना भी है। जब भी स्त्री की स्वतंत्रता और निर्णय लेने के अधिकार पर प्रश्न किया जाता है ये विचार आवश्यक है की भारतीय दर्शन में स्त्री को वर को स्वयं चुनने की स्वतंत्रता और स्वी को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निर्णय लेने की स्वायत्तता और सम्मान का अधिकारी माना गया है। यदि हम स्वी की स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो उसे विवाह का निर्णय लेने की स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए। परंतु स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि वह अपने या प्रलोभन के चुन सकें। यदि किसी भी प्रकार का छल, दबाव या भ्रम उत्पन्न कर धर्म परिवर्तन कराया जाता है, तो यह स्वतंत्र निर्णय नहीं कहा जा सकता। वहीं, यदि परिवर्तन स्वेच्छा से हो, तो भारतीय संविधान उसके अधिकार की रक्षा करता है। इस सूक्ष्म भेद को समझना अत्यंत आवश्यक है।

आगामी फिल्म 'केरल स्टोरी इसी विमर्श को पुनः 2' सार्वजनिक मंच पर ला रही है। फिल्म के एक सीन जिसमें कठोरतापूर्वक बीफ खिलाते दिखाया गया उसको लेकर केरल में राजनीतिक षड्यंत्र जोरों पर है, एसएफआई द्वारा इसके विरोध में बीफ पार्टी आयोजित की गई। फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने फिल्म की आलोचना करते हुए बीफ पराठे को पसंदीदा भोजन बताया, विषय चीफ खाने का नहीं THE KERALA 2 STORY बल्कि वीभत्स तरीके से किसी को खिलाने के प्रयास का है। फिल्म के डायरेक्टर कामाख्या नारायण सिंह का कहना है 'एक फिल्ममेकर के तौर पर, यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम समाज में सच सामने लाएं और लोगों को इस बारे में सेंसिटिव करें कि क्या हो रहा है। वे लड़कियों को फंसाते हैं और उन्हें अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर करते हैं, जो गलत है। वे इस देश की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे समाज स्वीकार नहीं करेगा। फिल्म का सिक्वेंस फिल्म प्रोड्यूसर विपुल अमृतलाल शाह शाह व अमरनाथ झों द्वारा लिखा गया है। सिनेमेटोग्राफी पूर्व की फिल्म की तरह उत्कृष्ट है, फिल्म के दोनों गाने (हर-हर शंभु, ओ मायरी) मनोज मुंतसिर द्वारा लिखे गए व मनन शाह और श्रेया घोषाल द्वारा गाये गए है जो कि मन को छू जाते है और कहानी को गहरा बना देते है।

प्रश्न केवल फिल्म का नहीं है, प्रश्न है क्या हम सामाजिक मुद्दे पर खुली, तथ्यों पर आधारित और संतुलित चर्चा कर पाएंगे? भारत की धमनिरपेक्षता तभी सार्थक होगी जब वह सत्य की खोज से विमुख न हो, और प्रगतिशीलता तभी प्रामाणिक होगी जब वह सभी नागरिकों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करें। भारतीय समाज व्यवस्था को समझे बिना किसी भी विषय को कंवल राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं। धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता भारतीय सभ्यता के विरोधी नहीं, बल्कि उसके अभिन्न अंग हो सकते हैं-यदि वे न्याय, संतुलन और सत्य पर आधारित हों।


 

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