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Kanker Case: Tribal Identity, Religious Freedom an

कांकेर प्रकरण:जनजातीय अस्मिता और संवैधानिक संतुलन

कांकेर प्रकरण में जनजातीय अस्मिता, धर्म प्रचार और संविधान के संतुलन पर बहस। ग्रामसभा, पेसा कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विश्लेषण


कांकेर प्रकरणजनजातीय अस्मिता और संवैधानिक संतुलन

डॉ. विश्वास कुमार चौहान

अगस्त 2025 की एक तपती दोपहर में, जब छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले की ग्रामसभाओं ने अपनी सीमाओं पर ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध ‘चेतावनी बोर्ड’ स्थापित किए, तो वे केवल लकड़ी और पेंट के ढांचे नहीं थे। वे बोर्ड वस्तुतः सदियों से सोई हुई उस जनजातीय चेतना के उद्घोष थे, जो अब अपनी सांस्कृतिक शुचिता और जनसांख्यिकीय सुरक्षा के लिए विधिक संघर्ष की मुद्रा में है।

छत्तीसगढ़ के कांकेर में कई गांवों में जनजातीय समाज द्वारा लगाए गए इन होर्डिंग्स में प्रसारवादी ईसाई शक्तियों के ‘जबरन और प्रलोभन आधारित कन्वर्जन’ के विरुद्ध वैधानिक चेतावनी दी गई थी। इन होर्डिंग्स ने भारतीय न्यायपालिका के समक्ष एक पुरातन प्रश्न को नवीन कलेवर में प्रस्तुत किया है क्या एक समुदाय की अपनी पहचान बचाने की सामूहिक शक्ति, व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराती है? या यह ‘आत्मरक्षा’ का एक संविधान-सम्मत अधिकार है?

ऐतिहासिक छाया और मजहबी विस्तारवाद का आवरण:भारत में जनजातीय कन्वर्जन का इतिहास केवल धार्मिक परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह दो प्रबल विस्तारवादी शक्तियों रेडिकल इस्लाम और प्रसारवादी ईसाई मिशनरियों द्वारा भारतीय संस्कृति के विरुद्ध निरंतर संघर्ष की गाथा है। विडंबना यह है कि इतिहास के विमर्श में इन ताकतों की वास्तविक मजहबी या रिलिजियस प्रेरणाओं को अक्सर राजनीतिक और वंशवादी नामों के पीछे सुनियोजित ढंग से छुपाया गया।

जहां रेडिकल इस्लाम के विस्तार को ‘मुगल’, ‘अफगान’, ‘तुर्क’ या ‘लोदी’ जैसे नामों की आड़ दी गई, वहीं ईसाई विस्तारवाद को ‘अंग्रेज’, ‘पुर्तगाली’ या ‘फ्रांसीसी’ जैसी औपनिवेशिक पहचान के पीछे सुरक्षित रखा गया। इस ‘नामकरण के भ्रम’ ने भारतीय जनमानस में एक गहरा संज्ञानात्मक भ्रम पैदा किया। लोग इन्हें केवल विदेशी आक्रांता मानते रहे, जबकि इनका प्राथमिक एजेंडा जनसांख्यिकीय रूपांतरण था।

जहां तलवार के बल पर और ‘जजिया’ जैसे दमनकारी करों के माध्यम से बड़े पैमाने पर कन्वर्जन किया गया, वहीं 1813 के चार्टर एक्ट के बाद ईसाई मिशनरियों ने ‘सॉफ्ट पावर’, यानी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को ‘प्रसार’ का हथियार बनाया। इतिहासकार डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर ने The Indian Musalmans और Imperial Gazetteer में जनजातीय क्षेत्रों में बढ़ते मिशनरी प्रभाव और उन्हें प्राप्त प्रशासनिक संरक्षण का स्पष्ट उल्लेख किया है।

संविधान सभा का द्वंद्व: ‘धर्म प्रचार’ की मर्यादा:स्वाधीनता के बाद संविधान निर्माण के दौरान 6 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में अनुच्छेद 25 (प्रारूप अनुच्छेद 19) पर हुई बहस इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण विधिक मोड़ है। प्रश्न यह था कि क्या ‘धर्म प्रचार’ (propagate) का अधिकार ‘कन्वर्जन’ के अधिकार को भी समाहित करता है?

लोकनाथ मिश्र जैसे सदस्यों ने चेतावनी दी थी कि धर्म प्रचार की स्वतंत्रता भारत को एक ऐसे अखाड़े में बदल देगी, जहां विदेशी प्रभाव देश की सांस्कृतिक एकता को विखंडित कर देंगे। यद्यपि के.एम. मुंशी और एच.सी. मुखर्जी जैसे सदस्यों के तर्कों के बाद ‘प्रोपेगेट’ शब्द को शामिल किया गया, लेकिन इसे ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ की शर्तों के अधीन रखा गया।संविधान की मंशा स्पष्ट थी किसी को भी अपने धर्म के विस्तार के नाम पर दूसरे की ‘अंतःकरण की स्वतंत्रता’ को प्रलोभन या भय से बाधित करने का अधिकार नहीं है।

नियोगी समिति से स्तानिस्लास केस तक: एक विधिक यात्रा:जब वैधानिक व्यवस्था को ताक पर रखकर जनजातीय समाज का बड़े पैमाने पर कन्वर्जन किया जा रहा था, तब 1954 में न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में गठित समिति ने इस तंत्र का भंडाफोड़ किया। 11,000 से अधिक साक्ष्यों के आधार पर समिति ने निष्कर्ष निकाला कि इन कन्वर्जनों के पीछे कोई आध्यात्मिक उत्कंठा नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषित राजनीतिक और सामाजिक एजेंडा था।इसी रिपोर्ट के आधार पर 1968 में मध्य प्रदेश और बाद में छत्तीसगढ़ में ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम’ लागू किया गया।

स्तानिस्लास मामला: न्यायपालिका की स्पष्ट रेखा: Rev. Stanislaus vs State of Madhya Pradesh (1977) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म प्रचार का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को अपने धर्म में परिवर्तित करने का मौलिक अधिकार नहीं है। छल, बल या कपट से किया गया कन्वर्जन ‘अंतःकरण की स्वतंत्रता’ का उल्लंघन है।

छत्तीसगढ़: जनसांख्यिकीय संकट और सांख्यिकीय सत्य:संविधान, धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बावजूद जनजातीय समाज का कन्वर्जन जारी रहा। 2011 की जनगणना में ईसाई जनसंख्या 1.92 प्रतिशत थी, लेकिन हालिया क्षेत्रीय आंकड़े चिंताजनक हैं। बस्तर और जशपुर के कई क्षेत्रों में ईसाई आबादी में 41 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में अवैध कन्वर्जन की 100 से अधिक शिकायतें मिलीं, जिनमें 44 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई। सबसे गंभीर विवाद शव दफनाने को लेकर सामने आए। वर्ष 2025 में देशभर में दर्ज 23 ऐसे मामलों में से 19 अकेले छत्तीसगढ़ में थे।

कांकेर प्रकरण: पेसा और ग्रामसभा की हुंकार:कांकेर का मामला तब चरम पर पहुंचा, जब ग्रामसभाओं ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) की शक्तियों का प्रयोग किया। पेसा की धारा 4(डी) ग्रामसभा को सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं की रक्षा का अधिकार देती है।अगस्त 2025 में कुडाल, परवी, बांसला, घोटा, घोटिया, बोंडानार, मुसुरपुल और सुलंगी गांवों में प्रस्ताव पारित कर सूचना बोर्ड लगाए गए। इन बोर्डों के खिलाफ ईसाई मिशनरियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि ये बोर्ड किसी धर्म पर प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि अवैध गतिविधियों के खिलाफ जन-जागरूकता का माध्यम हैं। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी पर फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।भारतीय संविधान का मूल तत्व संतुलन हैअधिकार और कर्तव्य के बीच, व्यक्ति और समुदाय के बीच। कांकेर का संदेश स्पष्ट है: जनजातीय क्षेत्रों में आस्था का स्वागत है, लेकिन सांस्कृतिक आक्रमण का नहीं।यह भारत के ‘सांस्कृतिक लोकतंत्र’ की दिशा में एक साहसी और विधिक प्रस्थान बिंदु है।

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