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Journalism and Rashtradharma in India

पत्रकारिता का राष्ट्रधर्म

लेख में पत्रकारिता और राष्ट्रधर्म के संबंध पर विचार किया गया है। इसमें बताया गया है कि भारतीय संदर्भ में राष्ट्र केवल भूगोल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक कर्तव्य का व्यापक भाव है।


पत्रकारिता का राष्ट्रधर्म

जयराम शुक्ल

राष्ट्रवाद इन दिनों विमर्श के केंद्र में है। भारत के संदर्भ में और वैश्विक संदर्भ में भी। राजनीतिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष व विपक्ष पर खूब चर्चाएं हुई हैं, हो रही हैं, तो भला पत्रकारिता इससे क्यों अछूती रहे। उसमें भी राष्ट्रवाद के तत्व तलाशे जा रहे हैं।

मैं ‘राष्ट्रवाद’ शब्द का पक्षधर नहीं हूं, क्योंकि जहां वाद है वहीं विवाद स्वतः चला आता है। राष्ट्र न वाद का विषय है और न विवाद का। वह इससे परे और इससे ऊपर है। राष्ट्र एक विचार से भी आगे धर्म है राष्ट्रधर्म। यह धर्म सभी पंथों से ऊपर है।

पंथ की पहचान आराधना पद्धति, आचरण और सामाजिक व्यवहार से होती है। राष्ट्र किसी भी नागरिक का आत्मतत्व है, जो परिवार-समाज के पथ से आगे बढ़ता हुआ एक विशिष्ट सांस्कृतिक परिचय के साथ प्रकट होता है। यह मेरा अपना विवेचन है। लेकिन जिस राष्ट्रवाद पर चर्चा होती है, उसका अर्थ अलग है। वामपंथी या मार्क्सवादी इसे दक्षिणपंथी अवधारणा मानते हैं। राष्ट्रवाद के विचार के साथ धर्मतत्व को जोड़कर इसे उदात्तता से कट्टरता की ओर धकेल देते हैं।

इसलिए पहले यह जान लेना जरूरी है कि राष्ट्र क्या है, राष्ट्रवाद क्या है और इसके आधारभूत तत्व क्या हैं, ताकि हम उन्हें समझ सकें। हमारे देश भारतवर्ष में राष्ट्र की अवधारणा पश्चिम के देशों से अलग है। यूरोपीय देशों का राष्ट्रवाद दो विश्वयुद्धों की कोख से जन्मा है, जबकि हमारा राष्ट्रवाद पुरातन और सनातन है।आज का राजनीतिक शास्त्र कहता है कि राष्ट्र की परिभाषा एक ऐसे जनसमूह के रूप में की जा सकती है, जो भौगोलिक सीमाओं में एक निश्चित देश में रहता हो और जिसमें एकता के सूत्र में बंधने की उत्सुकता तथा समान राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पाई जाती हों। भारत के संदर्भ में राष्ट्र की अवधारणा विस्तृत और व्यापक है।

हम वसुधैव कुटुम्बकम की बात करते हैं। हम सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करते हैं। हमारा धर्म सार्वभौमिक है, उसका कोई नाम नहीं है। वह सनातन है सृष्टि के अस्तित्व में और प्राणियों में चेतना के आने के साथ ही। इसलिए हम प्राणियों में सद्भावना और जगत के कल्याण की बात करते हैं।हम धर्म की जय की कामना करते हैं, क्योंकि धर्म हमारे लिए ‘रिलीजन’ नहीं बल्कि हमारे सामाजिक जीवन में कर्तव्य और आचरण का विषय है। हमारी परिभाषा में धर्म वह तत्व है, जो मनुष्यता को पशुता से अलग पहचान देता है।

युगों से हमारा धर्म ही हमारा राष्ट्रधर्म रहा है। हमारी राष्ट्रीय चेतना वेदकाल से अस्तित्वमान रही है। अथर्ववेद में धरती माता का यशोगान किया गया है-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
अर्थात भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

हम भारतीयों के लिए राष्ट्र कागज में रेखांकित नक्शा कभी नहीं रहा। राष्ट्र हमारे लिए भाव है। लंका विजय के पश्चात जब लक्ष्मण वहीं निवास करने की बात करते हैं, तब श्रीराम उन्हें उपदेश देते हैं
“अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥”

अर्थात सोने की लंका मुझे नहीं भाती। जन्मभूमि हमारी माता है, उसके सामने स्वर्ग भी तुच्छ है।

महाभारत का जो युद्ध हुआ, वह वस्तुतः राष्ट्रधर्म के संस्थापनार्थ हुआ। राष्ट्र उच्च नैतिक मानदंडों का भाव है। महाभारत में इसके संकेत बड़े ही खूबसूरत और प्रज्ञा चक्षु खोलने वाले हैं। गीता में जो उपदेश श्रीकृष्ण ने दिया है, उसके निहितार्थ को समझने की जरूरत है। सुप्रसिद्ध श्लोक है
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥”

यहां श्रीकृष्ण जिस धर्म की बात करते हैं, वह वस्तुतः राष्ट्रधर्म है। वे कहते हैं कि जब धर्म के पतन से राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में पड़ता है, तब मनुष्यों के अभ्युत्थान के लिए मैं आता हूं।महाभारत में नैतिक मूल्यों के राष्ट्र की स्थापना के लिए युद्ध हुआ है। यह युद्ध विदेशी ताकतों के खिलाफ सीमा विस्तार या साम्राज्यवाद की पिपासा के लिए नहीं था। राष्ट्रधर्म से पथभ्रष्ट और पतित हुए अपनों के खिलाफ राष्ट्रवादियों का युद्ध था।

देखिए कितने शानदार प्रतीक हैं धर्मराज युधिष्ठिर के नेतृत्व में धृतराष्ट्र की सेना के खिलाफ युद्ध। धृतराष्ट्र यानी दिशा और दृष्टि से रहित राष्ट्र। संदेश साफ है कि देश के भीतर भी यदि कोई राष्ट्र के खिलाफ काम करता है, तो उसे दंड देना अपरिहार्य है।इसलिए मेरा मानना है कि राष्ट्र सीमाओं से परे एक भाव है। आप यह भी कह सकते हैं कि ‘देश’ वस्तुतः देह है और राष्ट्र उसकी आत्मा, उसका प्राण है। राष्ट्रीय तत्व के समाप्त होते ही देश भी पार्थिव शरीर की भांति हो जाएगा।

हमारे यहां राष्ट्र शब्द के समानार्थी शब्दों ने भी बड़ी समस्याएं खड़ी कर रखी हैं। राष्ट्र को अंग्रेजी में ‘नेशन’ और उर्दू में ‘कौम’ कहते हैं। मूलतः यूरोप के ‘नेशन’ की अवधारणा अलग है। इसी तरह ‘कौम’ भी बिल्कुल अलग बात है। यूरोप का ‘नेशन’ भू-राजनीतिक अवधारणा है, जबकि ‘कौम’ एक धार्मिक इकाई है।अक्सर एक शब्द सुनने को मिलता है कि “मैं अपनी कौम के लोगों से अपील करता हूं।” कौम शब्द का आशय सहधर्मी नागरिकों से निकलता है। सत्तर साल से ‘कौमी एकता’ का ढिंढोरा पीटा जाता रहा है हर धर्मावलंबी को अलग-अलग कौमें बताते हुए। एक राष्ट्र में इतनी सारी कौमें, यानी राष्ट्र के भीतर भी कई राष्ट्र।

बौद्धिकों ने ऐसे ही विमर्श दिए, राष्ट्र को खंड-खंड राष्ट्रों में बांटते हुए। जबकि राष्ट्र की अवधारणा बिल्कुल अलग है।आजादी के बाद पत्रकारिता का रूप बदला। वह मिशन से प्रोफेशन में बदलने लगी। मीडिया और बाजार का मेल हुआ और पाठक उपभोक्ता बन गया। पत्रकारिता कई बार ऐसे उद्योग का रूप ले बैठी, जिसका उद्देश्य धन कमाना और सत्ता पर दबाव बनाना रह गया।लेकिन इन सबके बावजूद जब-जब अपने राष्ट्र के हितों की बात उठती है, तो पत्रकारिता का मिजाज बदल जाता है। भारत में राष्ट्रवादी पत्रकारिता को आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अखंड भारत की अभिलाषा के साथ जोड़ा जाने लगा है।

ऐसी व्याख्या रचने वालों का एजेंडा अक्सर राजनीतिक होता है। ऐसे एजेंडाबाजों में ज्यादातर वे बौद्धिक शामिल हैं, जो 1967 के बाद सत्ता के अकादमिक प्रतिष्ठानों में बैठकर 2014 के पहले तक लाभ उठाते रहे सम्मान, अलंकरण और पारितोषिक प्राप्त करते रहे।राष्ट्रवाद की उनकी परिभाषा संकुचित और छिद्रान्वेषी है। जबकि राष्ट्रचेतना भारतीय पत्रकारिता के मूल में ही रही है। उसका उद्भव और विकास ही राष्ट्र और समाज के कुशल-क्षेम के लिए हुआ है।