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ग्वालियर किले में जौहर: रानी सहित 1400 स्त्री-बच्चों ने किया अग्नि स्नान

ग्वालियर किले में जौहर: रानी सहित 1400 स्त्री-बच्चों ने किया अग्नि स्नान

रमेश शर्मा

ग्वालियर किले में जौहर रानी सहित 1400 स्त्री-बच्चों ने किया अग्नि स्नान

रानी सहित 1400 स्त्री और बच्चों ने अग्नि-स्नान किया। अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए भारतीय नारियों ने जिस प्रकार जीवन का बलिदान दिया, ऐसे उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलते। भारत का ऐसा कोई क्षेत्र या राज्य नहीं है जहाँ रानियों और अन्य स्वाभिमानी नारियों ने जल या अग्निकुंड में प्रवेश न किया हो। ऐसा ही जौहर ग्वालियर किले में हुआ, जहाँ महारानी तंवरी देवी के नेतृत्व में 1400 स्वाभिमानी स्त्री और बच्चों ने अग्नि में प्रवेश किया था।

तंवरी देवी दिल्ली के प्रसिद्ध शासक महाराजा अनंगपाल की वंशज थीं। तंवरी देवी का विवाह ग्वालियर के शासक महाराज मलयवर्मन से हुआ था। प्रतिहार वंशीय मलयवर्मन अपने प्रजावत्सल और स्वाभिमानी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। दिल्ली के सुल्तान अल्तमस ने उन पर आधीनता स्वीकार करने का दबाव बनाया। मलयवर्मन ने अस्वीकार कर दिया, तो अल्तमस ने विशाल सेना लेकर ग्वालियर पर आक्रमण किया।

अल्तमस का ग्वालियर पर यह हमला दिसंबर 1231 में हुआ। आरंभ में मलयवर्मन ने वीरता से आक्रमण का सामना किया, लेकिन अल्तमस की सैन्य शक्ति अधिक थी। ग्वालियर की सेना को पीछे हटना पड़ा और राजा अपने सुरक्षा सैनिकों सहित किले में चले गए। अल्तमस ने किले पर घेरा डाला और राजा से रानीवास सहित पूर्ण समर्पण की शर्त रखी, जिसमें बेटी को डोला सहित समर्पित करना शामिल था। अल्तमस ने अपने दूत हैबत खां के माध्यम से यह संदेश भेजा।

स्वाभिमानी शासक मलयवर्मन वार्षिक राजस्व देने के लिए तो सहमत थे, लेकिन बेटी के डोला सहित रानीवास के समर्पण से इंकार कर दिया। अंततः अपना दबाव बनाने के लिए अल्तमस ने किले के भीतर जाने के सारे मार्ग बंद कर दिए और आसपास के गांवों में लूट और नरसंहार करने लगा। यह घेरा ग्यारह महीने तक चला, जिससे किले के भीतर भोजन और पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। यह ग्वालियर के इतिहास में सबसे लंबी अवधि का घेरा था। यह अल्तमस के जीवन का भी सबसे बड़ा घेरा था।

लेकिन एक ओर राजा मलयवर्मन अपने स्वाभिमान पर अडिग रहे, तो अल्तमस भी अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंततः किले की समस्याओं से विवश रानी तंवरी देवी ने जौहर करने और राजा मलयवर्मन ने निर्णायक युद्ध करने का निर्णय लिया। जौहर की तैयारी आरंभ हुई। किले के भीतर अग्निकुंड तैयार किया गया, जिसमें राजपरिवार और सभी स्त्री और बच्चों ने, साथ ही किले के भीतर सैनिकों की स्त्रियां और बच्चे भी, अग्नि में प्रवेश किया। यह जौहर तीन दिन चला और 20 नवंबर 1232 को पूरा हुआ।

जो स्त्री और बच्चे अग्नि में प्रवेश न कर पाए, उनका तलवार से वध कर दिया गया। अगले दिन, 21 नवंबर को, राजा मलयवर्मन अपने सभी सैनिकों के साथ केशरिया पगड़ी बाँधकर अंतिम युद्ध के लिए किले से मैदान में निकले।