ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध लंबा खिंचने से तेल कीमतों में उछाल और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर दिख रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से हालात और गंभीर बने हुए हैं।
अमेरिका और इजराइल से ईरान का युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है। 28 फरवरी से 2026 को शुरू हुआ युद्ध एक अस्थिर संघर्ष बन गया है। भीषण हवाई हमलों के बीच वैश्विक तेल कीमतों में उछाल से दुनिया के देशों पर खासा प्रभाव पड़ा है। दोनों ही ओर से किए जा रहे हमलों फिलहाल युद्ध थमता दिखाई नहीं दे रहा है बल्कि इसके और बढ़ने की आशंका है। युद्ध की विभीषिका से ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल भी कम प्रभावित नहीं हुए हैं। दुनिया पर राज करने का
सपना पाले बैठे अमेरिका ने सोचा भी नहीं था कि ईरान से यह जंग कितनी भारी पड़ेगी। उसे लगा था कि कुछ ही दिनों में ईरान घुटने टेक देगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और वह न सिर्फ युद्ध में टिका हुआ है बल्कि अमेरिका जैसे बड़े देश को नाको चने चबाने को मजबूर कर रहा है। इससे अमेरिका की हेकड़ी धरी रह गई है। इतना ही नहीं अमेरिका चाहता है कि उसे अन्य देश मदद करें ताकि वह ईरान पर हमले के लिए उनकी जमीन का इस्तेमाल कर सके लेकिन लगभग सभी देशों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया है। देशों ऐसे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटी को धमकी दी है कि समय आने पर वह भी किसी की मदद नहीं करेगा। दरअसल स्टेट ऑफ होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से दुनिया के देशों में इंधन की कमी से हा-हाकार मचा हुआ है। यह वह स्थान है जिस पर ईरान आवाजाही रोक दी है। अमेरिका इस जगह को खुलवाने के भरसक प्रयास में है लेकिन सफलता नहीं मिल रही। युद्ध में भले ही ईरान के हजारों ठिकानों को तबाह किया जा चुका है, लेकिन ईरान झुकने को तैयार नहीं है।
ईरान ने युद्ध रोकने के नेने लिए कठोर शर्तें रखी है, जिसमें खाड़ी से अमेरिकी सेना की वापसी शामिल है। इस संघर्ष से तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी और वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट ने दुनिया के देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। वैसे अमेरिका और इजराइल जब ईरान पर हमला करके आयतुल्लाह अली खामेनेई की जान ले ली थी, तब इस युद्ध का मकसद तेहरान से इस्लामिक सत्ता को उखड़ फेंकना बताया गया था लेकिन इस जंग को दो सप्ताह से अधिक होने पर अमेरिका और इजराइल का सपना अब बिखरता दिख रहा है।अमेरिका और इजराइल के लगातार हवाई हमलों के बावजूद ईरान की इस्लामिक सत्ता फिलहाल डगमगाती नहीं दिख रही है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के ताजा आकलन बताते है कि युद्ध ने ईरान की सैन्य क्षमता को जरूर कमजोर किया है, लेकिन वहां की सत्ता संरचना अब भी कायम है। इतना ही नहीं इस संघर्ष के बाद ईरान की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था पहले से ज्यादा कठोर और कट्टर हो सकती है। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के साथ जारी युद्ध में घरेलू स्तर पर गंभीर राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार जीवित अमेरिकी राष्ट्रपतियों में शायद ही किसी को युद्ध शुरू होने के समय इतनी कम जनस्वीकृति मिली हो। तेल की कीमतें बढ़ने से यात्रा से लेकर खाने तक का खर्च बढ़ रहा है। इससे जनता में नाराजगी भी तेज होती जा रही है। ट्रंप ने युद्ध शुरू होने से पहले सार्वजनिक रूप कोई व्यापक राजनीतिक या रणनीतिक तर्क नहीं रखा। फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य जमावड़े को उन्होंने पहले ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाने की रणनीति बताया था, लेकिन से अचानक सैन्य कार्रवाई ने घरेलू राजनीतिक बहस को तेज कर दिया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल के बाजार में उथल-पुथल मची है।ट्रंप की मुश्किल यह है कि कुछ महीने बाद नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं जिसे देखते हुए ट्रंप की पार्टी के ही लोग अर्थव्यवस्था पर उनसे ज्यादा ध्यान देने की माग कर रहे हैं। तेल के दाम बढ़ने से अमेरिका में महंगाई भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। ऐसे में अगर युद्ध और लंबा खिंचता है तो इससे ट्रंप की सियासी मुसीबत बढ़नी तय हैं।